लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
पृष्ठ 340, कुल 633 में से
संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३२५
उस से (परः) परे वह स्थित होता है। किञ्च वह उसी समुदाय का (अन्तः) अन्त अवयव समझा जाता है¹। भाव—जिस समुदाय को मित् (म् इत् वाला—नुँम् आदि) कहा जाये उस समुदाय में जितने अच् हों, उन में से अन्तिम अच् से परे मित् रखा जाना चाहिये, तथा उस मित् को उस समुदाय का अन्तिम अवयव समझना चाहिये। 'ज्ञान + इ' यहां 'ज्ञान' इस समुदाय को मित्-नुँम् विधान किया गया है। 'ज्ञान' में दो अच् हैं; एक नकारोत्तर आकार और दूसरा नकारोत्तर अकार। तो अन्त्य अच् नकारोत्तर अकार से परे 'नुँम्' रखा जायेगा और यह ज्ञानशब्द का अन्तावयव समझा जायेगा। 'ज्ञाननुँम् + इ' यहां नुँम् के उँम् का लोप हो कर 'ज्ञानन् + इ' हुआ। नुँम् करने से पूर्व 'ज्ञान' अङ्ग था; परन्तु अब नुँम् के अन्तावयव हो जाने से 'ज्ञानन्' यह नान्त अङ्ग हो गया है। नान्त हो जाने पर सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) से उस की उपधा को दीर्घ हो कर—ज्ञानान् + इ = 'ज्ञानानि' प्रयोग सिद्ध होता है। द्वितीया के एकवचन 'ज्ञान + अम्' में अतोऽम् (२३४) से अम् को अम् आदेश हो जाता है। इस का लाभ स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से अम् का लुक् न होना है। पुनः अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप हो कर 'ज्ञानम्' प्रयोग सिद्ध होता है। द्वितीया के द्विवचन में 'ज्ञान + औ' (औट्) इस स्थिति में पूर्ववत् नपुंसकाच्च (२३५) से औ को शी आदेश हो कर अनुबन्धलोप और गुण करने से 'ज्ञाने' प्रयोग सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि यहां भी पूर्ववत् भसञ्ज्ञा, भसञ्ज्ञक अकार के लोप की प्राप्ति तथा उस का वारण कर लेना चाहिये। द्वितीया के बहुवचन 'ज्ञान + शस्' में पूर्ववत् जश्शसोः शिः (२३७) से शि
१. यदि मित् समुदायभक्त = समुदाय का अवयव न माना जाये तो 'वहंलिहः' (कन्धे को चाटने वाला बैल) आदि प्रयोगों में पदमूलक अनुस्वार न हो सकेगा। तथाहि —वहं (स्कन्धं) लेढीति वहंलिहः। 'वह' कर्म उपपद रहते 'लिह्' धातु से वहाभ्रे लिहः (३.२.३२) से खश् प्रत्यय हो कर अनुबन्धलोप करने से 'वहलिह्' होता है। अब अरुद्विषदजन्तस्य मुँम् (७६७) से 'वह' को मुँम् का आगम हो कर 'वहम् + लिह' बनता है। 'वह' पदसञ्ज्ञक था; अब यदि मुँम् को उस का अवयव नहीं मानते तो 'वहम्' यह मान्त पद नहीं हो सकता—जो अनिष्ट है। अब मित् के अन्तावयव स्वीकृत होने से मान्त पद हो जाता है और इस प्रकार मोऽनुस्वारः (७७) से अनुस्वार सिद्ध हो जाता है। इसी तरह 'वारीणि' आदि में नुँम् को अङ्ग का अवयव मानने से नान्त अङ्ग की उपधा को दीर्घ हो जाता है। ध्यान रहे कि सूत्र का यह अंश जहां उपयोगी होगा वहीं प्रवृत्त होगा; 'मुञ्चति' आदि में प्रयोजनाभाव के कारण इस का उपयोग न होगा। [देखें शेखर और चिदस्थि- माला]