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लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

३२४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् संज्ञक नहीं हो सकता था, परन्तु इस की सर्वनामस्थानसंज्ञा करनी इष्ट है । अतः इस सूत्र से उस का विधान किया गया है । 'ज्ञान + इ' यहां शि की सर्वनामस्थान-संज्ञा हो अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२३६) नपुंसकस्य झलचः ।७।१।७२॥ झलन्तस्याजन्तस्य च क्लीवस्य नुम् स्यात् सर्वनामस्थाने ॥ अर्थः—सर्वनामस्थान परे हो तो झलन्त और अजन्त नपुंसक को नुँम् आगम हो । व्याख्या—नपुंसकस्य ।६।१। झलच ।६।१। नुम् ।१।१। (इदितो नुम् धातो से)। सर्वनामस्थाने ।७।१। (उगिदचां सर्वनामस्थाने० से) । समास —झल् च अच् च = झलचौ, समासान्तविधेरनित्यत्वाद् द्वन्द्वाच्चुद० (५८६) इति न टच् । तस्य = झलचः, समाहारद्वन्द्व । 'नपुंसकस्य' का विशेषण होने से 'झलच' से तदन्तविधि हो जाती है । अर्थ —(सर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान परे होने पर (झलच ) झलन्त और अजन्त (नपुंसकस्य) नपुंसकलिङ्ग का अवयव (नुँम्) नुँम् हो जाता है १। 'ज्ञान + इ' यहां 'ज्ञान' यह अजन्तनपुंसक है, इस से परे 'इ' (शि) यह सर्व- नामस्थान विद्यमान है । अतः प्रकृत नपुंसकस्य झलचः से 'ज्ञान' को नुँम् का आगम प्राप्त होता है । परन्तु प्रश्न उत्पन्न होता है कि नुँम् का आगम नपुंसक का कौन सा अवयव हो ? क्या आद्य अवयव हो या अन्त अवयव ? अथवा और ही कुछ ? इस का अग्रिम परिभाषा से निर्णय करते हैं— [लघु०] परिभाषा सूत्रम्—(२४०) मिदचोऽन्त्यात् परः ।१।१।४६॥ अचां मध्ये योऽन्त्य , तस्मात्परस्तस्यैवान्तावयवो मित् स्यात् । उपधा- दीर्घ —ज्ञानानि । पुनस्तद्वत् । शेषं पुंवत् ॥ अर्थ —समुदाय के अचों में जो अन्त्य अच्, उस से परे मित् का आगम होता है । किञ्च वह उस समुदाय का अन्तावयव माना जाता है । व्याख्या—मित् ।१।१। अच ।६।१। अन्त्यात् ।५।१। पर ।१।१। अन्त ।१।१। (आद्यन्तौ टकितौ से) । समास —म् इत् यस्य स मित्, बहुव्रीहिसमास । अच इति निर्धारणे षष्ठी, सौत्रमेकवचन जात्यभिप्रायेण । यस्य समुदायस्य मिद् विहित तस्य समुदायस्य अचांमध्य इत्यर्थः । अर्थ —(मित्) मित् आगम (अच ) जिस समुदाय को विधान किया गया हो उस समुदाय के अचों के मध्य में (अन्त्यात्) जो अन्त्य अच्, १ यहां झलन्तलक्षण नुँम् में यह बात विशेष ज्ञातव्य है कि यदि झल् किसी अच् से परे होगा तो तभी नुँम् का आगम होगा, अन्यथा नहीं । अच परस्यैव झलो नुम्वि- धानम्—इति भाष्ये । अत एव 'मांस + जस्=मास्+इ=मांसि, (प्रजायाम्) गवाञ्च + जस्=गवाञ्च्+इ=गवाञ्चि' इत्यादिप्रयोगों में झलन्तलक्षण नुँम् की प्रवृत्ति नहीं होती ।

अजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३२५

उस से (परः) परे वह स्थित होता है। किञ्च वह उसी समुदाय का (अन्तः) अन्त अवयव समझा जाता है¹। भाव—जिस समुदाय को मित् (म् इत् वाला—नुँम् आदि) कहा जाये उस समुदाय में जितने अच् हों, उन में से अन्तिम अच् से परे मित् रखा जाना चाहिये, तथा उस मित् को उस समुदाय का अन्तिम अवयव समझना चाहिये। 'ज्ञान + इ' यहां 'ज्ञान' इस समुदाय को मित्-नुँम् विधान किया गया है। 'ज्ञान' में दो अच् हैं; एक नकारोत्तर आकार और दूसरा नकारोत्तर अकार। तो अन्त्य अच् नकारोत्तर अकार से परे 'नुँम्' रखा जायेगा और यह ज्ञानशब्द का अन्तावयव समझा जायेगा। 'ज्ञाननुँम् + इ' यहां नुँम् के उँम् का लोप हो कर 'ज्ञानन् + इ' हुआ। नुँम् करने से पूर्व 'ज्ञान' अङ्ग था; परन्तु अब नुँम् के अन्तावयव हो जाने से 'ज्ञानन्' यह नान्त अङ्ग हो गया है। नान्त हो जाने पर सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) से उस की उपधा को दीर्घ हो कर—ज्ञानान् + इ = 'ज्ञानानि' प्रयोग सिद्ध होता है। द्वितीया के एकवचन 'ज्ञान + अम्' में अतोऽम् (२३४) से अम् को अम् आदेश हो जाता है। इस का लाभ स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से अम् का लुक् न होना है। पुनः अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप हो कर 'ज्ञानम्' प्रयोग सिद्ध होता है। द्वितीया के द्विवचन में 'ज्ञान + औ' (औट्) इस स्थिति में पूर्ववत् नपुंसकाच्च (२३५) से औ को शी आदेश हो कर अनुबन्धलोप और गुण करने से 'ज्ञाने' प्रयोग सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि यहां भी पूर्ववत् भसञ्ज्ञा, भसञ्ज्ञक अकार के लोप की प्राप्ति तथा उस का वारण कर लेना चाहिये। द्वितीया के बहुवचन 'ज्ञान + शस्' में पूर्ववत् जश्शसोः शिः (२३७) से शि


१. यदि मित् समुदायभक्त = समुदाय का अवयव न माना जाये तो 'वहंलिहः' (कन्धे को चाटने वाला बैल) आदि प्रयोगों में पदमूलक अनुस्वार न हो सकेगा। तथाहि —वहं (स्कन्धं) लेढीति वहंलिहः। 'वह' कर्म उपपद रहते 'लिह्' धातु से वहाभ्रे लिहः (३.२.३२) से खश् प्रत्यय हो कर अनुबन्धलोप करने से 'वहलिह्' होता है। अब अरुद्विषदजन्तस्य मुँम् (७६७) से 'वह' को मुँम् का आगम हो कर 'वहम् + लिह' बनता है। 'वह' पदसञ्ज्ञक था; अब यदि मुँम् को उस का अवयव नहीं मानते तो 'वहम्' यह मान्त पद नहीं हो सकता—जो अनिष्ट है। अब मित् के अन्तावयव स्वीकृत होने से मान्त पद हो जाता है और इस प्रकार मोऽनुस्वारः (७७) से अनुस्वार सिद्ध हो जाता है। इसी तरह 'वारीणि' आदि में नुँम् को अङ्ग का अवयव मानने से नान्त अङ्ग की उपधा को दीर्घ हो जाता है। ध्यान रहे कि सूत्र का यह अंश जहां उपयोगी होगा वहीं प्रवृत्त होगा; 'मुञ्चति' आदि में प्रयोजनाभाव के कारण इस का उपयोग न होगा। [देखें शेखर और चिदस्थि- माला]

३२६ | भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्

आदेश, अनुबन्धलोप, उस की सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा, नपुंसकस्य झलच (२३६) से नुँम् का आगम तथा नान्त अङ्ग की उपधा को दीर्घ कर 'ज्ञानानि' सिद्ध होता है। नोट—नपुंसकलिङ्ग मे प्राय प्रथमा और द्वितीया विभक्ति के रूप तथा उन की प्रक्रिया एक समान हुआ करती है। अत आगे प्रथमा विभक्ति की ही सिद्धि करेंगे, उस से द्वितीया की भी सिद्धि समझ लेनी चाहिये। नपुंसक मे प्राय तृतीयादि विभक्तियों के रूप पुंल्लिङ्ग के समान होते हैं, अत' वहा उन की भी सिद्धि नही करेंगे। हा जहा कुछ विशेष होगा वहा पूरी २ प्रक्रिया लिखेंगे। ज्ञान शब्द की रूपमाला यथा— प्र० ज्ञानम् ज्ञाने ज्ञानानि | प० ज्ञानात् ज्ञानाभ्याम् ज्ञानेभ्यः द्वि० " " " | ष० ज्ञानस्य ज्ञानयोः ज्ञानानाम् तृ० ज्ञानेन ज्ञानाभ्याम् ज्ञानैः | स० ज्ञाने " ज्ञानेषु च० ज्ञानाय " ज्ञानेभ्य | सं० हे ज्ञान ! हे ज्ञाने ! हे ज्ञानानि ! [लघु०] एवं धन-वन-फलादयः ॥ अर्थः—इसी तरह धन, वन, फल आदि अदन्त नपुंसको के रूप होते हैं। व्याख्या—बालको की ज्ञानवृद्धि के लिये ज्ञानवत् अदन्तनपुंसक शब्दो का कुछ उपयोगी सङ्ग्रह यहा दे रहे हैं। '*' यह चिह्न णत्वप्रक्रिया का परिचायक है।

शब्द—अर्थशब्द—अर्थशब्द—अर्थ
अक्षर* = अकारादि वर्णअहिफेन = अफीमऐक्य = एकता
अगार* = गृहअंशुक = महीन वस्त्रओदन = भात
अग्निहोत्र* = होमआधिक्य = ज्यादतीऔत्सुक्य = उत्कण्ठा
अघ = पापआनन = मुखकङ्कण = कंगन
अङ्ग = अवयवआर्जव = सरलताकज्जल = काजल
अञ्जन = सुरमाआर्द्रक* = अदरककनक = सुवर्ण, धतूरा
अनृत = झूठआसन = आसनकमल = कमल
अन्तरिक्ष* = आकाशआस्य = मुखकाञ्चन = सुवर्ण
अन्त पुर* = रनवासइङ्गित = इशाराकार्य* = काम
अभ्र* = बादलइन्दीवर* = नीला कमलकुण्ड = हौदी
अभ्रक* = अभ्रकइन्द्रजाल = माया वा छलकुमुद = श्वेत कमल
अमृत = जल, अमृतइन्द्रिय* = नेत्र आदिकौटिल्य = कुटिलता
अम्भोज = पद्मइन्धन = लकड़ीक्षीर* = दूध
अम्ल = छाछ, खट्टाउदक = जलक्षेत्र* = खेत
अरण्य = जगलउदर* = पेटख = आकाश
अरविन्द = पद्मउद्यान = बगीचागवेषण = खोज
अवसान = विरामउपवन = ,,गौरव* = गुरुत्व, प्रतिष्ठा
अस्त्र* = बाण आदिऋत = दैवी सत्यचन्दन = चन्दन

अजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३२७ शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ चरण = पैर (पुं० भी) | नेत्र* = आंख | रामठ = हीङ्ग चरित = चालचलन | नैपुण्य = निपुणता | रूप्य* = चान्दी चाञ्चल्य = चञ्चलता | पङ्कज = कमल | लक्षण = भेददर्शक चातुर्य* = निपुणता | पत्र* = पत्ता | ललाट = माथा चामीकर* = सुवर्ण | पाण्डित्य = विद्वत्ता | ललाम = प्रधान, सुन्दर चिबुक = ठोड़्डी | पानीय = पानी | लवङ्ग = लौंग चिह्न = निशान | पार्थक्य = जुदाई | लवण = नमक चौर्य* = चोरी | पुष्प* = फूल | लवित्र* = दरांती जठर* = पेट | पैशुन्य = चुगलखोरी | लशुन = लहसुन जल = पानी | फल = फल | लाङ्गल = हल जाड्य = मूर्खता | बाल्य = लड़कपन | लाङ्गूल = पूंछ जातिफल = जयफल | बीज = कारण | लाघव = हलकापन जाम्बूनद = सोना | भक्त = भात, सेवक | लालन = लाड करना टङ्कण = सुहागा | भय = डर | लालित्य = सौन्दर्य तत्त्व = यथार्थ रूप | भाल = मस्तक | लेख्य = दस्तावेज़ तथ्य = सत्य | भुवन = लोक | वक्त्र* = मुख तन्त्र* = शास्त्र | भोजन = खुराक | वङ्ग = रांगा, कली ताम्बूल = पान | मन्दिर* = घर | वचन = कथन तारुण्य = जवानी | मार्दव = कोमलता | वज्र* = इन्द्र का अस्त्र तिमिर* = अन्धकार | मित्र* = मित्र | वन = जंगल तुत्थ = नीला थोथा | मुख = मुंह | वसन = वस्त्र तृण = तिनका | मूल्य = दाम, कीमत | वाक्य = वाक्य तैल = तेल | मौन = चुप्पी | वाङ्मय = शास्त्र तोक = सन्तान | यन्त्र* = कल वा औज़ार | वाद्य = बाजा तोय = पानी | यवस = घास, तृण | वार्त्त = तन्दुरुस्ती दाक्षिण्य = चतुरता | युद्ध = लड़ाई | वार्धक्य = बुढ़ापा दास्य = दासता | योजन = चार कोस | वासर* = दिन (पुं० भी) दुर्भिक्ष* = अकाल | यौतक = दहेज | वाहन = सवारी दुःख = दुःख | यौतुक = दहेज | वितुन्नक = धनियां देवमन्दिर* = देवालय | यौवत = युवति-समूह | विवर* = छिद्र, बिल दैव = भाग्य | यौवन = जवानी | विश्वभेषज = सोंठ द्वार* = दरवाज़ा | रजत = चान्दी | विष* = जहर धन = धन | रत्न = मणि | वीर्य* = बल, पराक्रम नयन = आंख | रहस्य = गोप्य | वृत्त = चरित्र नवनीत = माखन | राज्य = राज

३२८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् शब्द-अर्थ | शब्द-अर्थ | शब्द-अर्थ वृन्द = समूह | सरसिज = कमल | स्तेय = चोरी वेतन = तनख्वाह | सरसीरुह* = कमल | स्तोत्र* = स्तुतिगीत वैचित्र्य* = विचित्रता | साक्ष्य* = गवाही | स्थान = जगह वैचक्र = हिक्मत | सादृश्य = सदृशता | स्थाविर* = बुढापा वैधव्य = विधवापन | साधन = उपकरण | स्थैर्य* = स्थिरता वैर* = दुश्मनी | साध्वस = डर | स्यन्दन = रथ व्यलीक = अपकार | सान्त्वन = दिलासा | हरिताल = हड़ताल व्यसन = विपत्ति | सामर्थ्यं = ताकत | हर्म्य* = महल व्रण = घाव | साहस = जबरदस्ती | हल = हल शस्त्र* = हथियार | साहाय्य = सहायता | हवन = होम शास्त्र* = धर्मग्रन्थ | सिक्तथ = मोम | हाटक = सुवर्ण शूल = दर्द, एक अस्त्र | सिन्दूर* = सिन्दूर | हालाहल = विषविशेष शैथिल्य = शिथिलता | सिंहासन = राजगद्दी | हास्तिक = हस्तिसमूह शैशव = लडकपन | सुकृत = पुण्य | हास्य = हँसी श्रवण = कान, सुनना | सुख = सुख | हित = भलाई सख्य = मित्रता | सुदर्शन = विष्णु का चक्र | हिम = बर्फ सङ्गीत = गायन आदि | सुवर्ण = सोना | हिरण्य = सुवर्ण सत्य = सच | सोपान = सीढ़ी | हृदय = दिल सत्र* = यज्ञ | सौकर्य* = आसानी | हैयङ्गवीन = ताजामाखन१ सदन = घर | सौभाग्य = अच्छा भाग्य | —०— कतर (दो में कौन) शब्द डतरप्रत्ययान्त बताया जा चुका है। विशेष्यलिङ्ग के आश्रित होने से यह त्रिलिङ्गी है। यहां नपुंसक में इस की प्रक्रिया यथा— कतर + सु (सुँ)। यहां अतोऽम् (२३४) से अम् आदेश प्राप्त होता है, इस पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि सूत्रम्— (२४१) अद्ड्२ डतरादिभ्यः पञ्चभ्यः ।७।१।२५॥ एभ्यः पञ्चेभ्यः स्वमोborderद्ड् आदेशः स्यात् ॥ १ इन के अतिरिक्त गमन, नमन, पठन, स्मरण, हरण आदि भाववाचक ल्युडन्त क्रियाशब्द भी अदन्त नपुंसक होते हैं। इस प्रकार के पौने तीन सौ शब्दो की एक विस्तृत सार्थ सूची इस व्याख्या के तृतीयभाग में ल्युट् च (८७१) सूत्र पर दी गई है। विशेष जिज्ञासु उसे वहीं देखें। २ अद्ड् डतरादिभ्यः। यहां ष्टुना ष्टुः (६४) से दकार को डकार हो कर संयोगा- न्तस्य लोपः (२०) से संयोगान्तलोप करने पर 'अड डतरादिभ्यः' हो जाना चाहिये था, परन्तु ऐसा नहीं किया गया। इस का कारण यह है कि वैसा करने म 'अड्' आदेश है या 'अद्ड्' इस का पता नहीं चल सकता था। अतः स्पष्ट- प्रतिपत्ति के लिये मुनि ने सन्धि नहीं की।

अजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३२६ अर्थः—डतर आदि पञ्च नपुंसक शब्दों से परे सुं और अम् के स्थान पर अद्द् आदेश हो। व्याख्या—डतरादिभ्यः ।५।३। पञ्चभ्यः ।५।३। नपुंसकेभ्यः ।५।३। (स्वमो- र्नपुंसकात् से वचनविपरिणाम द्वारा)। स्वमोः ।६।२। अद्द् ।१।१। समासः—डतर आदिर्येषां ते डतरादयः, तेभ्यः = डतरादिभ्यः, तद्गुणसंविज्ञानबहुव्रीहिसमासः। डतर आदि पञ्च शब्द सर्वादिगण के अन्तर्गत आते हैं। १. डतर, २. डतम, ३. अन्य ४. अन्यतर, ५. इतर—ये पञ्च डतरादि कहाते हैं। इन में डतर और डतम प्रत्यय हैं; अतः प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणम् परिभाषा द्वारा डतरप्रत्ययान्त और डतमप्रत्ययान्त शब्दों का ग्रहण होगा। अर्थः— (डतरादिभ्यः) डतरप्रत्ययान्त, डतमप्रत्ययान्त, अन्य, अन्यतर और इतर (पञ्चभ्यः) इन पञ्च (नपुंसकेभ्यः) नपुंसक शब्दों से परे (स्वमोः) सुँ और अम् को (अद्द्) अद्द् आदेश हो। यह सूत्र अतोऽम् (२३४) सूत्र का अपवाद है। 'कतर + सु' यहां सकार को अद्द् आदेश हो कर—'कतर + अद्द्'। हल- न्त्यम् (१) से अन्त्य हल् = डकार की इत्सञ्ज्ञा होने से लोप हो कर—'कतर + अद्'। अब यहां प्रथमयोः पूर्वसवर्णः (१२६) से पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होता है, परन्तु वह अनिष्ट है; टिलोप ही इष्ट है। अतः इस का अग्रिमसूत्र से विधान करते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२४२) टेः ।६।४।१४३॥ डिति भस्य टेलोपः। कतरत्, कतरद्। कतरे। कतराणि। हे कतरत्। शेषं पुंवत्। एवं कतमत्, इतरत्, अन्यत्, अन्यतरत्। अन्यतमस्य त्वन्यतम- मित्येव॥ अर्थः—डित् परे होने पर भसञ्ज्ञक टि का लोप हो। व्याख्या—डिति ।७।१। (ति विंशतेर्डिति से)। भस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। टेः ।६।१। लोपः ।१।१। (अल्लोपोऽनः से)। अर्थः— (डिति) डित् परे होने पर (भस्य) भसञ्ज्ञक (टेः) टि का (लोपः) लोप होता है। 'कतर + अद्' यहां स्थानिवद्भाव से 'अद्' स्वादि है। अजादि और असर्वनाम- स्थान भी; अतः इस के परे होने से यचि भम् (१६५) द्वारा पूर्व की भसञ्ज्ञा हो जाती है। पुनः 'अद्द्' इस डित् के परे होने पर भसञ्ज्ञक टि= अकार का प्रकृतसूत्र से लोप हो—कतर् + अद् = कतरद्। अब वाऽवसाने (१४६) से दकार को विकल्प कर के चर्=तकार हो कर 'कतरत्, कतरद्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। 'कतर + औ' यहां नपुंसकाच्च (२३) से 'औ' को 'शी' आदेश, अनुबन्धलोप और गुण करने से 'कतरे' प्रयोग सिद्ध होता है। 'कतर + अस्(जस्) यहां जश्शसोः शिः (२३७) से जस् को शि आदेश हो कर शि सर्वनामस्थानम् (२३८) से उस की सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा हो जाती है। पुनः- नपुंसकस्य झलचः (२३६) से नुम् का आगम हो सर्वनामस्थाने चाऽसम्बुद्धौ (१७७) से उपधादीर्घ कर नकार को णकार करने से—'कतराणि' प्रयोग बनता है।

३३० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् 'हे कतर + स्' (सुं) यहां भी पूर्ववत् सकार को अद्द् आदेश होकर भसञ्ज्ञक टि का लोप कर चर्त्व करने से—'हे कतरत्, हे कतरद्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। ध्यान रहे कि यहां एङ्कस्वात् सम्बुद्धे (१३४) से तकार का लोप नहीं होता, क्योंकि 'कतर' यह ह्रस्वान्त होते हुए भी अङ्ग नहीं है, अङ्ग तो 'कतरद्' है। अन्त का अकार प्रत्यय का अवयव है प्रकृति का नहीं। प्रश्न—'अद्द्' की बजाय 'अद्' आदेश ही क्यों नहीं कर देते ? उत्तर—यदि 'अद्' आदेश का विधान करते तो 'अम्' में तो कुछ अन्तर न होता क्योंकि अम् के स्थान पर हुए अद्' को स्थानिवत् मानने से अमि पूर्व (१३५) से पूर्वरूप होकर 'कतरत्' सिद्ध हो जाता। परन्तु 'सुं' में 'अद्' आदेश होने पर अतो गुणे (२७४) का बाध कर पूर्वसवर्णदीर्घ होकर 'हे कतरात्', हे कतराद्' ये अनिष्ट रूप बन जाते। अतः इसे डित् करना ही युक्त है। प्रश्न—यदि पूर्वसवर्णदीर्घ का निवारण ही अभीष्ट है तो केवल 'द्' या 'त्' आदेश ही विधान क्यों नहीं कर देते ? उत्तर—यदि दकार वा तकार आदेश ही विधान करते तो प्रथमा और द्वितीया में तो कोई दोष न आता किन्तु सम्बुद्धि में एङ्कस्वात्सम्बुद्धे (१३४) से लोप हो कर 'हे कतर' यह अनिष्ट रूप बन जाता। अतः 'अड्ड्' आदेश करना ही युक्त है। डित्त्वाभावेऽमि सिद्धेऽपि सावदिष्टं प्रसज्यते । दकारे वा तकारे वा सम्बुद्धौ तत्स्थितिः कुतः ॥ द्वितीया विभक्ति में भी प्रथमाविभक्तिवत् प्रक्रिया होनी है। तृतीयादि विभ- क्तियों में पुँल्लिङ्गवत् प्रक्रिया जाननी चाहिये। रूपमाला यथा— प्र० कतरत्-द् कतरे कतराणि | प० कतरस्मात्* कतराभ्याम् कतरेभ्यः द्वि० ,, ,, ,, ,, | ष० कतरस्य कतरयोः कतरेषाम्‡ तृ० कतरेण कतराभ्याम् कतरैः | स० कतरस्मिन्* ,, कतरेषु च० कतरस्मै✓ ,, कतरेभ्यः | सं० हे कतरत्-द् हे कतरे हे कतराणि ✓ सर्वनाम्नः स्मै (१५३)। * ङसिंङ्योः स्मात्स्मिनौ (१५४)। ‡ आमि सर्वनाम्नः सुट् (१५५), बहुवचने झल्येत् (१४५)। इसी प्रकार—१. यतर (दो में जो) २ यतम (बहुतों में जो) ३ ततर (दो में वह), ४ कतम (बहुतों में कौन), ५ ततम (बहुतों में वह), ६ एकतम (बहुतों में एक), ७ अन्य (दूसरा), ८ अन्यतर (दो में एक), ६ इतर (भिन्न) शब्दों के उच्चारण होते हैं। ध्यान रहे कि ये सब शब्द त्रिलिङ्गी हैं, विशेष्यलिङ्ग के आश्रित रहते हैं। विशेष्य नपुंसक होगा तो ये नपुंसक में प्रयुक्त होंगे। नोट—अन्यतर और अन्यतम ये दोनों शब्द अव्युत्पन्न हैं, डतरान्त या डतमान्त नहीं। इन में प्रथम तो सर्वादिगण में पढ़ा गया है और डतरादि पञ्चों में भी आता है अतः इस का उच्चारण कतरवत् होता है। परन्तु अन्यतम शब्द सर्वादिगण में नहीं आता अतः इस का उच्चारण ज्ञानवत् होता है। अद्द् आदेश नहीं होता। इसी तरह स्मै, स्मात्, सुट् और स्मिन् भी नहीं होते।

अजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३३१ एकतर (दो में एक) शब्द डतरप्रत्ययान्त है; अतः इस की प्रक्रिया ‘कतर’ शब्दवत् प्राप्त होती है; परन्तु यह अनिष्ट है। इस के प्रथमा और द्वितीया विभक्ति में ज्ञानवत् रूप ही इष्ट हैं, अतः अग्रिमवार्त्तिक प्रवृत्त होता है— [लघु०] वा०—(२३) एकतरात् प्रतिषेधो वक्तव्यः ॥ एकतरम् ॥ अर्थः—नपुंसक एकतरशब्द से परे सुँ और अम् को अद्द् आदेश न हो। व्याख्या—एकतरात् ।५।१। प्रतिषेधः ।१।१। यह वार्त्तिक भाष्य में अद्द् आदेश के प्रकरण में पढ़ा है अतः यह उसी का निषेध करता है। अर्थः—(एकतरात्) एकतर शब्द से परे (प्रतिषेधः) सुँ और अम् को अद्द् आदेश न हो। अद्द् आदेश न होने से प्रथमा और द्वितीया में 'ज्ञान'शब्दवत् प्रक्रिया होगी। परन्तु ङे, ङसिँ, ङि और आम् में सर्वनामकार्य निर्बाध होंगे। रूपमाला यथा— प्र० एकतरम् एकतरे एकतराणि प० एकतरस्मात् एकतराभ्याम् एकतरेभ्यः द्वि० " " " प० एकतरस्य एकतरयोः एकतरेषाम् तृ० एकतरेण एकतराभ्याम् एकतरैः स० एकतरस्मिन् " एकतरेषु च० एकतरस्मै " एकतरेभ्यः सं० हे एकतर! हे एकतरे! हे एकतराणि! अभ्यास (३६) (१) नपुंसकलिङ्ग में अम् को पुनः अम् विधान करने का क्या प्रयोजन है ? (२) मिदचोऽन्त्यात्परः सूत्र न होता तो क्या दोष उत्पन्न होता ? (३) ‘अद्द्’ आदेश को डित् करने का क्या प्रयोजन है ? (४) क्या ‘एकतर’ शब्द डतरप्रत्ययान्त है ? यदि है तो किस सूत्र से अद्द् आदेश विधान (?) किया जाता है ? (५) क्या ‘अन्यतम’ शब्द का उच्चारण ‘कतम’ शब्द की तरह होता है ? यदि नहीं तो क्यों ? क्या वह डतमप्रत्ययान्त नहीं ? (६) ‘ज्ञाने’ आदि में औङस्थानिक ‘शी’ को दीर्घ क्यों किया गया है ? (७) ‘शि’ की सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा क्यों विधान की गई है ? क्या जस्स्था- निक होने से उस की वह सञ्ज्ञा स्वतः प्राप्त नहीं हो सकती थी ? (८) सूत्रनिर्देशपूर्वक सिद्धि करें— १. इतरत् । २. अन्यतमम् । ३. ज्ञानानि । ४. ज्ञाने । ५. एकतरम् । ६. अन्यतमात् । ७. ज्ञान । ८. एकतरस्मै । (६) अतोऽम् सूत्र में अम् का छेद करें या म् का ? सहेतुक स्पष्ट करें। (यहां ह्रस्व अकारान्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।) —: : ० : : — श्रियम्पातीति = श्रीपम् (कुलम्) । जो कुल आदि, लक्ष्मी की रक्षा करे उसे ‘श्रीपा’ कहते हैं। यह शब्द विशेष्यलिङ्ग के आश्रित होने से त्रिलिङ्गी है। पुँल्लिङ्ग

३३२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् और स्त्रीलिङ्ग में इस का उच्चारण 'विश्वपा'शब्दवत् होता है। नपुंसक के उच्चा- रण में कुछ विशेष है—यह अग्रिमसूत्र द्वारा दर्शाया जाता है— [लघु०] विधि सूत्रम्—(२४३) ह्रस्वो नपुंसके प्रातिपदिकस्य ।१।२।४७॥ अजन्तस्येत्येव । श्रीपम् । ज्ञानवत् ॥ अर्थ —नपुंसकलिङ्ग में अजन्त प्रातिपदिक को ह्रस्व हो जाता है। व्याख्या—ह्रस्व ।१।१। नपुंसके ।७।१। प्रातिपदिकस्य ।६।१। ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत सदा अच् के स्थान पर ही हुआ करते हैं। जहां इन का विधान होता है वहां 'अच' (अच् के स्थान पर) यह षष्ठ्यन्त पद उपस्थित हो जाता है [यह अचश्च (१ २ २८) परिभाषा का तात्पर्य है]। यहां भी 'अच' पद उपस्थित हो कर 'प्राति- पदिकस्य' का विशेषण बन येन विधिरतदन्तस्य द्वारा तदन्तविधि के कारण—'अजन्त- स्य प्रातिपदिकस्य' बन जाता है। अर्थ —(नपुंसके) नपुंसकलिङ्ग में (अच) अजन्त (प्रातिपदिकस्य) प्रातिपदिक के स्थान पर (ह्रस्व ) ह्रस्व हो जाता है। अलोऽन्त्य- परिभाषा से अन्त्य अच् के स्थान पर ही ह्रस्व होता है। 'श्रीपा' यहां अन्त्य आकार को ह्रस्व हो कर 'श्रीप'। अब इस में स्वादिप्रत्यय उत्पन्न हो कर सम्पूर्ण प्रक्रिया 'ज्ञान' शब्दवत् होती है। रूपमाला यथा— प्र० श्रीपम् श्रीपे श्रीपाणि | प० श्रीपात् श्रीपाभ्याम् श्रीपेभ्यः द्वि० ,, ,, ,, | ष० श्रीपस्य श्रीपयोः श्रीपाणाम् तृ० श्रीपेन श्रीपाभ्याम् श्रीपैः | स० श्रीपे ,, श्रीपेषु च० श्रीपाय , श्रीपेभ्यः | सं० हे श्रीप ! हे श्रीपे ! हे श्रीपाणि! नोट—'श्रीपाणि' आदि प्रयोगों में एकाजुत्तरपदे न (२८६) से ही णत्व होता है। भिन्न पद होने के कारण अट्कुप्वाङ्० (१३८) से णत्व नहीं हो सकता। इसी प्रकार विशेष्य के नपुंसक होने पर—विश्वपा, गोपा, कीलालपा, सोमपा आदि धात्वन्त आकारान्त शब्दों के उच्चारण होते हैं। (यहां आकारान्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) ० [लघु०] द्वे २ ॥ व्याख्या—'द्वि' (दो) शब्द त्रिलिङ्गी है। विशेष्य के नपुंसक होने पर यह भी नपुंसक हो जाता है। 'द्वि+औ' यहां त्यदादीनाम (१६३) से इकार को अकार, नपुंसकाच्च (२३५) से 'औ' को 'शी' आदेश, अनुबन्धलोप तथा आद् गुण (२७) से गुण एका- देश करने स 'द्वे' प्रयोग सिद्ध होता है। 'द्वि+भ्याम्'। त्यदाद्यत्व और सुपि च (१४१) से दीर्घ हो 'द्वाभ्याम्'। 'द्वि+ओस्'। त्यदाद्यत्व, ओसि च (१४७) से अकार को एकार तथा एचो- ऽयवायाव (२२) में अय् आदेश करने पर सकार को रुत्व और रेफ को विसर्ग हो कर 'द्वयोः' प्रयोग सिद्ध होता है। सम्पूर्ण रूपमाला यथा—

अजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३३३ प्र० ० द्वे ० | प० ० द्वाभ्याम् ० द्वि० ० ,, ० | ष० ० द्वयोः ० तृ० ० द्वाभ्याम् ० | स० ० ,, ० च० ० ,, ० सम्बोधन नहीं होता । नोट — ध्यान रहे कि स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग में ‘द्वि’ शब्द के एक समान रूप होते हैं परन्तु इन दोनों की प्रक्रिया में बड़ा अन्तर है । [लघु०] त्रीणि २ ॥ व्याख्या — त्रि (तीन) शब्द भी विशेष्यलिङ्ग के आश्रित होने से त्रिलिङ्गी होता है । यह सदा बहुवचनान्त होता है । नपुंसकलिङ्ग में इस की प्रक्रिया यथा— ‘त्रि + अस्’ (जस् व शस्) इस स्थिति में शि आदेश, सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा, नुम् आगम और सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) ने उपधादीर्घ हो कर अट्कुप्वाङ्० (१३८) से नकार को णकार आदेश करने में ‘त्रीणि’ प्रयोग सिद्ध होता है । त्रि + भिस् = त्रिभिः । त्रि + भ्यस् = त्रिभ्यः । त्रि + सु (सुप्) = त्रिषु । षष्ठी के बहुवचन में ‘त्रि + आम्’ इस दशा में त्रेस्त्रयः (१६२) से त्रय आदेश, ह्रस्वमूलक नुट् आगम तथा नामि (१४६) से दीर्घ हो कर नकार को णकार करने से ‘त्रयाणाम्’ प्रयोग सिद्ध होता है । रूपमाला यथा— प्र० ० ० त्रीणि | प० ० ० त्रिभ्यः द्वि० ० ० ,, | ष० ० ० त्रयाणाम् तृ० ० ० त्रिभिः | स० ० ० त्रिषु च० ० ० त्रिभ्यः सम्बोधन नहीं होता । अब सुप्रसिद्ध इदन्त नपुंसक ‘वारि’ (जल) शब्द का विवेचन करते हैं । णि- जन्त वृञ् वरणे धातु से वसि-वपि-यजि० (उणा० ५६४) इस औणादिक सूत्रद्वारा इन् प्रत्यय करने पर ‘वारि’ शब्द निष्पन्न होता है । वारयति उष्णतादिकमिति वारि । आपः स्त्री भूमिन् वार्वारि सलिलं कमलं जलम् — इत्यमरः । गजबन्धनी (हाथी बान्धने की भूमि), सरस्वती आदि अर्थों में वारिशब्द स्त्रीलिङ्ग होता है, परन्तु यहां जल अर्थ में नित्यनपुंसक ही है । वारि + सु (सुँ) । यहां अदन्त न होने से अतोऽम् (१३४) द्वारा सकार को अम् आदेश नहीं होता । अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है — [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२४४) स्वमोर्नपुंसकात् ।७।१।२३॥ लुक् स्यात् । वारि ॥ अर्थः—नपुंसकलिङ्ग से परे सुँ और अम् का लुक् हो । व्याख्या—स्वमोः ।६।२। नपुंसकात् ।५।१। लुक् ।१।१। (षड्भ्यो लुक् से) । समासः—सुँश्च अम् च = स्वमौ, तयोः । इतरेतरद्वन्द्वः । अर्थः—(नपुंसकात्) नपुंसक से परे (स्वमोः) सुँ और अम् का (लुक्) लुक् हो जाता है । यह उत्सर्गसूत्र है इस

३३४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् का अपवाद अतोऽम् (२३४) सूत्र और उस का भी अपवाद अद्ड्डतरादिभ्यः पञ्चभ्यः (२४१) सूत्र पीछे लिख चुके हैं। यह लुक् सुँ और अम् के सम्पूर्ण स्थान पर प्रवृत्त होता है। प्रश्न-आदेः परस्य (७२) परिभाषा द्वारा यह लुक् अम् के आदि अकार के स्थान पर क्यो प्रवृत्त न हो जाये ? उत्तर-प्रत्ययस्य लुक्श्लुलुपः (१८६) सूत्र मे बताया जा चुका है कि लुक् प्रत्यय के अदर्शन को कहते हैं। यहां अम् का लुक् करना है। अम् का अकार या मकार प्रत्यय नहीं, किन्तु सम्पूर्ण समुदाय 'अम्' ही प्रत्यय है। अतः यदि सम्पूर्ण अम् का अदर्शन करेंगे तो तभी लुक् सार्थक होगा, अन्यथा नही। इस से सम्पूर्ण अम् का लुक् होता है, केवल आदि अकार का नहीं। वारि + सु । प्रकृतसूत्र से सकार का लुक् हो 'वारि' प्रयोग बना। प्रथमा के द्विवचन 'वारि+औ' मे नपुंसकाच्च (२३५) मे 'औ' को 'शी' हो अनुबन्धलोप करने से 'वारि+ई'। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है- [लघु०] विधि-सूत्रम्- (२४५) इकोऽचि विभक्तौ । ७।१।७३॥ इगन्तस्य क्लीवस्य नुम् अचि विभक्तौ । वारिणी । वारीणि ॥ अर्थः-अजादि विभक्ति परे हो तो इगन्त नपुंसक को नुँम् का आगम हो। व्याख्या इक् ।६।१। नपुंसकस्य ।६।१। (नपुंसकस्य झलच से)। नुम् ।१।१। (इदितो नुम् धातोः से) । अचि ।७।१। विभक्तौ ।७।१। 'नपुंसकस्य' का विशेषण होने से 'इक्' से तदन्तविधि हो कर 'इगन्तस्य नपुंसकस्य' बन जाता है। 'अचि' मे तदादि- विधि हो कर 'अजादौ विभक्तौ' बन जाता है। अर्थ-(अचि = अजादौ) अजादि (विभक्तौ) विभक्ति परे होने पर (इक् = इगन्तस्य) इगन्त (नपुंसकस्य) नपुंसक का अवयव (नुँम्) नुँम् हो जाता है। मित् होने से नुँम् अन्त्य अच् से परे होता है। 'वारि+ई' यहा 'वारि' यह इगन्त नपुंसक है। इस से परे 'ई' यह अजादि विभक्ति वर्तमान है। अतः प्रकृतसूत्र से इगन्त को नुँम् का आगम हो कर अनुबन्धलोप और नकार को णकार करने मे 'वारिणी' प्रयोग सिद्ध होता है। प्रथमा के बहुवचन मे 'वारि+अस्' (जस्) इस स्थिति मे पूर्ववत् शि आदेश, उस की सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा, नुँम् आगम, अनुबन्धलोप, उपधादीर्घ तथा नकार को णकार आदेश हो कर 'वारीणि' प्रयोग सिद्ध होता है२। १. 'इकोऽचि सुंपि' इत्येव सुवचम् इति नागेशो मन्यते । २ वारि+इ (शि) मे नपुंसकस्य झलच (२३६) ओर इकोऽचि विभक्तौ (२४५) दोनों से नुँम् हो सकता है, किस से नुँम् किया जाये ? इस विषय मे वैयाकरण एकमत नही। कुछ वैयाकरणो का कहना है कि यहा परत्व के कारण इकोऽचि विभक्तौ से ही नुँम् करना चाहिये। परन्तु अन्य वैयाकरणो का कथन है कि इको- ऽचि विभक्तौ तो अन्य सब अजादि विभक्तियो में चरितार्थ है यहा शि (इ) मे नपुंसकस्य झलच की ही प्रवृत्ति होनी चाहिये। किञ्च 'झलन्त' न कह कर

अजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३३५ हे वारि + स् । यहां स्वमोर्नपुंसकात् (२२४) से सुं का लुक् हो कर 'हे वारि !' हुआ। अब यहां प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम् (१६०) से सम्बुद्धि को निमित्त मान कर ह्रस्वस्य गुणः (१६६) से गुण प्राप्त होता है। परन्तु न लुमताङ्गस्य (१६१) के निषेध के कारण प्रत्ययलक्षण नहीं हो सकता। हमें यहां पाक्षिक गुण करना अभीष्ट है। अतः न लुमताङ्गस्य (१६१) निषेध की अनित्यता सिद्ध करते हैं— [लघु०] न लुमता० (१६१) इत्यस्याऽनित्यत्वात् पक्षे सम्बुद्धिनिमित्तो गुणः —हे वारे !, हे वारि !। आङो ना० (१७१)—वारिणा। घेर्डिति (१७२) इति गुणे प्राप्ते— अर्थः—न लुमताङ्गस्य (१६१) यह निषेध अनित्य है। अतः पक्ष में ह्रस्वस्य गुणः (१६६) से सम्बुद्धिनिमित्तक गुण भी हो जाता है। गुणपक्ष में—हे वारे ! और गुणाभाव में—हे वारि ! । व्याख्या—न लुमताङ्गस्य (१६१) सूत्र अनित्य है। इस में ज्ञापक इकोऽचि विभक्तौ (२४५) सूत्र में 'अचि' पद का ग्रहण है। हम इसे समझाने के लिये पक्षात्मक ढंग से विचार करते हैं। तथाहि— पूर्वपक्षी—इकोऽचि विभक्तौ सूत्र में 'अचि' पद के ग्रहण का क्या प्रयोजन है ? उत्तरपक्षी—'वारि + भ्याम्' इत्यादि रूपों में भ्याम् आदि हलादि विभक्तियों में नुँम् न हो जाये, इसलिये सूत्र में 'अचि' पद का ग्रहण किया गया है। पूर्वपक्षी—'वारिभ्याम्' आदि में यदि नुँम् हो भी जाये तो न लोपः० (१८०) द्वारा लोप हो जाने से कोई दोष नहीं आता। अतः 'अचि' पद का ग्रहण व्यर्थ है। उत्तरपक्षी—तो 'हे वारि!' यहां लुक् हुए सम्बुद्धि को निमित्त मान कर नुँम् न हो जाये, इसलिये 'अचि' पद का ग्रहण किया है। पूर्वपक्षी—सम्बुद्धि में भी न लोपः० (१८०) से नकार का लोप हो जायेगा। उत्तरपक्षी—ऐसा नहीं हो सकता; क्योंकि सम्बुद्धि में न ङिसम्बुद्ध्योः (२८१) सूत्र नकार का लोप नहीं करने देगा। अतः 'हे वारिन्!' आदि अनिष्ट प्रयोगों की निवृत्ति के लिये 'अचि' पद का ग्रहण करना आवश्यक है। पूर्वपक्षी—ओहो! सम्बुद्धि में तो नुँम् प्राप्त ही नहीं हो सकता; क्योंकि विभक्ति का लुक् होने से न लुमताङ्गस्य (१६१) से प्रत्ययलक्षण का निषेध हो जाता है। अतः 'अचि' पद का ग्रहण व्यर्थ है। उत्तरपक्षी—आप का कथन सत्य है। इस प्रकार 'अचि' पद के बिना भी 'झलचः' कथन में अच्प्रत्याहार का ग्रहण भी यही प्रमाणित करता है कि यहां नपुंसकस्य झलचः द्वारा ही नुँम् होना चाहिये। हमारे विचार में दोनों सूत्रों से एक ही कार्य प्राप्त है अतः विरोध या विप्रतिषेध कुछ भी नहीं, इस तरह इन के बलावल का विचार निष्प्रयोजन ही है।

३३६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्

‘वारिभ्याम्, हे वारि’ आदि प्रयोगों के सिद्ध हो जाने पर आचार्य के पुनः ‘अचि’ पद के ग्रहण से न लुमताङ्गस्य (१६१) सूत्र की अनित्यता स्पष्ट प्रतीत होती है। पूर्वपक्षी—‘अचि’ पद के ग्रहण से भला आप कैसे न लुमताङ्गस्य (१६१) सूत्र की अनित्यता का अनुमान करते हैं ? उत्तरपक्षी—यदि न लुमताङ्गस्य (१६१) निषेध नित्य होता, तो सम्बुद्धि में उस का आश्रय कर के नुँम् प्राप्त ही न हो सकता। पुनः उस के निषेध के लिये ‘अचि’ पद की कोई आवश्यकता ही न होती। परन्तु आचार्य का उस के निषेध के लिये यत्न करना सिद्ध करता है कि आचार्य न लुमताङ्गस्य (१६१) निषेध को नित्य नहीं मानते। ‘हे वारि’ यहां सम्बुद्धि में न लुमताङ्गस्य (१६१) निषेध के अनित्य होने से अनित्यपक्ष में ह्रस्वस्य गुण (१६६) से गुण हो कर—‘हे वारे’ और नित्यपक्ष में गुण न होने से—‘हे वारि’ इस प्रकार दो रूप सिद्ध होते हैं। द्वितीया विभक्ति में भी प्रथमावत् प्रक्रिया होती है। तृतीया के एकवचन ‘वारि+आ’ (टा) में शेषो घ्यसखि (१७०) से घिसञ्ज्ञा हो इकोऽचि० (७।१।७३) की अपेक्षा पर होने के कारण आङो नाऽस्त्रियाम् (७।३। १२०) से टा को ना आदेश हो कर नकार को णकार करने से ‘वारिणा’ प्रयोग सिद्ध होता है। वारि+भ्याम् = वारिभ्याम्। वारिभिः। हलादि विभक्ति में नुँम् न होगा। चतुर्थी के एकवचन में ‘वारि+ए’ इस अवस्था में घिसञ्ज्ञा हो कर नुँम् की अपेक्षा पर होने के कारण घेर्ङिति (१७२) द्वारा गुण प्राप्त होता है। परन्तु यहां नुँम् करना ही अभीष्ट है। अतः अग्रिम वार्त्तिक से पूर्वविप्रतिषेध का विधान करते हैं— [लघु०] वा०—(२४) वृद्धधौत्वतृज्वद्भावगुणेभ्यो नुँम् पूर्वविप्रतिषेधेन ॥ वारिणे। वारिणः २। वारिणोः २। नुमचिर० (वा० १६) इति नुँट् —वारीणाम्। वारिणि। हलादौ हरिवत् ॥ अर्थ—वृद्धि, औत्व, तृज्वद्भाव और गुण—इन के साथ विप्रतिषेध होने पर, पूर्व भी नुँम् प्रवृत्त हो जाता है। व्याख्या—अचो ञ्णिति (७।२।११५) में प्राप्त वृद्धि, अच्च घे (७।३।११९)


१ यद्यपि इकोऽचि विभक्तौ (७।१।७२) के भाष्य में ‘हे त्रपो!’ और एङ्ह्रस्वात् सम्बुद्धेः (६।१।६७) के भाष्य में ‘हे त्रपु!’ ऐसे दो प्रयोग पाये जाते हैं, तथापि हमारा मन प्रत्येक इगन्त नपुंसक के सम्बुद्धि में दो दो—रूप बनाना स्वीकार नहीं करता । न लुमताङ्गस्य (१।१।६२) निषेध के अनित्य होने से केवल कहीं कहीं ‘त्रपो!’ आदि पूर्वमहानुभावों के लिखे रूपों में ही गुण का समाधान करना चाहिये, न कि सर्वत्र विकल्प, नहीं तो फिर अव्यवस्था हो जायगी । कैयट ने इकोऽचि विभक्तौ (७।१।७२) सूत्र के प्रदीप में इस का उल्लेख भी किया है।

अजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३३७ से प्राप्त औत्व, तृज्वत्क्रोष्टुः (७.१.५५) और विभाषा तृतीयादिष्वचि (७.१.५७) से प्राप्त तृज्वद्भाव तथा घेर्डिति (७.३.१११) से प्राप्त गुण यद्यपि नुँम् (७.१.७३) से परे हैं और विप्रतिषेधे परं कार्यम् (११३) के अनुसार इन की ही प्रवृत्ति उचित है; तथापि नुँम् की प्रवृत्ति पूर्वविप्रतिषेध से हो जाती है। अर्थात् इन के साथ नुँम् का विप्रतिषेध होने पर विप्रतिषेधे परं कार्यम् (११३) का दूसरा अर्थ—'अपरं कार्यम्' मान कर नुँम् की प्रवृत्ति हो जाती है।¹ 'वारि+ए' यहां पूर्वविप्रतिषेध के कारण गुण का बाध कर इकोऽचि विभक्तौ (२४५) से नुँम् हो कर नकार को णकार करने से 'वारिणे' प्रयोग सिद्ध होता है। 'वारि+अस्' (ङसिँ वा ङस्) यहां भी घेर्डिति (१७२) से प्राप्त गुण का पूर्व- विप्रतिषेध के कारण नुँम् बाध कर लेता है—'वारिणः'। 'वारि+ओस्' यहां परत्व के कारण इको यणचि (१५) का बाध कर नुँम् प्रवृत्त हो जाता है—'वारिणोः'। षष्ठी के बहुवचन 'वारि+आम्' में ह्रस्वनद्यापो नुट् (१४८) से आम् को नुट् का और इकोऽचि विभक्तौ (२४५) से अङ्ग को नुँम् का आगम युगपत् प्राप्त हुआ। नुम्चिर० (वा० १६) के द्वारा पूर्वविप्रतिषेध से नुट् हो गया। तब नामि (१८४) से दीर्घ और नकार को णकार करने पर 'वारीणाम्' प्रयोग सिद्ध हुआ। नोट—यदि नुँम् हो जाता तो वह 'वारि' का ही अवयव होता, आम् का नहीं। तब 'नाम्' परे न रहने से नामि (१८४) द्वारा दीर्घ न हो सकता। किञ्च तब अङ्ग के अजन्त न होकर नान्त हो जाने से 'वारिणाम्' ऐसा अनिष्ट प्रयोग बन जाता। सप्तमी के एकवचन 'वारि+इ' (ङि) में अच्च घेः (१७४) से ङि को औत्व और इकोऽचि विभक्तौ (२४५) से अङ्ग को नुँम् प्राप्त होने पर वृद्धौत्व० (वा० २४) से पूर्वविप्रतिषेध के कारण नुँम् हो जाता है। तब नकार को णकार होकर—'वारिणि' प्रयोग सिद्ध होता है। वारिशब्द की रूपमाला यथा— १. इन के उदाहरण भाष्य (७.१.६६) में अतीव सरल उपाय से समझाये गये हैं। तद्यथा— गुणवृद्ध्यौत्वतृज्वद्भावेभ्यो नुम् पूर्वविप्रतिषिद्धम्। तत्र गुणस्यावकाशः— अग्नये, वायवे। नुमोऽवकाशः—त्रपुणी, जतुनी। इहोभयं प्राप्नोति—त्रपुणे, जतुने। वृद्धेरवकाशः—सखायौ, सखायः। नुमः स एव। इहोभयं प्राप्नोति—अतिसखीनि, ब्राह्मणकुलानि। औत्वस्यावकाशः—अग्नौ, वायौ। नुमः स एव। इहोभयं प्राप्नोति —त्रपुणि, जतुनि। तृज्वद्भावस्यावकाशः—क्रोष्ट्रा, क्रोष्टुना। नुमः स एव। इहोभयं प्राप्नोति—कुशक्रोष्टुनेऽरण्याय, हितक्रोष्टुने वृषलकुलाय। नुम् भवति पूर्वविप्रतिषेधेन। ल० प्र० (२२)

३३८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् प्र० वारि वारिणी वारीणि । प० वारिणः वारिभ्याम् वारिभ्यः द्वि० ,, ,, ,, । ष० ,, वारिणो वारिणाम् तृ० वारिणा वारिभ्याम् वारिभिः । स० वारिणि ,, वारिषु च० वारिणे ,, वारिभ्यः । सं० हे वारि¹, वारे¹ वारिणी¹ वारीणि! नोट—'वारि' शब्द की तरह उच्चारण वाले शब्द संस्कृत-साहित्य में शायद ही कुछ हों। नपुंसक में इदन्त शब्द प्रायः भाषितपुंस्क ही मिलते हैं। उन का उच्चा- रण आगे आने वाले 'सुधि' शब्द की तरह होता है। 'दधि' (दही) शब्द के उच्चारण में वारि की अपेक्षा कुछ अन्तर पड़ता है। प्रथमा और द्वितीया विभक्ति की प्रक्रिया तो वारिशब्द के समान ही होती है। परन्तु तृतीया आदि अजादि विभक्तियों में निम्नप्रकारेण प्रक्रिया का अन्तर है— 'दधि + आ' (टा) यहां घिसञ्ज्ञा होने से आङो नाऽस्त्रियाम् (१७१) द्वारा टा को ना आदेश प्राप्त होता है। इस पर अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्--(२४६) अस्थिदधिसक्थ्यक्ष्णामनडुदात्तः ।७।१।७५॥ एषामनङ् स्याट् टादावचि (स चोदात्तः) ॥ अर्थः—तृतीयादि अजादि विभक्ति परे होने पर अस्थि, दधि, सक्थि और अक्षि—इन चार शब्दों के स्थान पर उदात्त अनङ् आदेश हो। व्याख्या—अचि ७।१। विभक्तिषु ७।३। (इकोऽचि विभक्तौ से वचनविपरि- णाम कर के)। तृतीयादिषु ७।३। (तृतीयादिषु भाषित० से)। अस्थिदधिसक्थ्यक्ष्णाम् ६।३। अनङ् १।१। उदात्तः १।१। समासः—अस्थि च दधि च सक्थि च अक्षि च = अस्थिदधिसक्थ्यक्षीणि, तेषाम् = अस्थिदधिसक्थ्यक्ष्णाम्। प्रकृतिवदनुकरणं भवति— इति परिभाषयाऽत्राप्यक्षिशब्दस्यानङ्। 'अचि' से तदादिविधि हो कर 'अजादिषु तृतीयादिषु विभक्तिषु' बन जाता है। अर्थ—(अचि) अजादि (तृतीयादिषु) तृतीया आदि (विभक्तिषु) विभक्तियों के परे होने पर (अस्थिदधिसक्थ्यक्ष्णाम्) अस्थि, दधि, सक्थि और अक्षि शब्दों के स्थान पर (अनङ्) अनङ् आदेश हो जाता है और वह (उदात्तः) उदात्त होता है¹। अनङ् में ङकार इत्सञ्ज्ञक है। अतः ङिच्च (४६) सूत्र द्वारा यह अन्त्य इकार के स्थान पर आदेश होगा। अनङ् में नकारोत्तर अकार उच्चारणार्थ है। टा, ङे, ङसिँ, ङस्, ओस्, आम्, ङि और ओस् ये आठ तृतीयादि अजादि विभक्तियां हैं। 'दधि + आ' यहां प्रकृतसूत्र से अन्त्य इकार को अनङ् आदेश होकर—दध् अन् + आ = दधन् + आ। तत्र अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम् (२४७) अल्लोपोऽनः।६।४।१३४॥ अङ्गावयवोऽसर्वनामस्थान-यजादि-स्वादिपरो योऽन्, तस्याकारस्य लोपः। दध्ना। दध्ने। दध्नः २। दध्नोः २॥ १ लघुकौमुदी में स्वरप्रकरण न होने से हम यहां स्वरविचार प्रस्तुत नहीं कर रहे।

अजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३३६ अर्थः-अङ्ग के अवयव अन् शब्द के अकार का लोप हो जाता है यदि सर्व- नामस्थान-भिन्न यकारादि वा अजादि स्वादि प्रत्यय परे हो तो। व्याख्या-अत् ।६।१। (यहां सुपां सुलुक्० से षष्ठी का लुक् हुआ है)। लोपः ।१।१। अनः ।६।१। भस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। जिस से परे सर्वनामस्थानभिन्न यकारादि वा अजादि स्वादि प्रत्यय हो उसे 'भ' कहते हैं-यह पीछे (१६५) सूत्र पर स्पष्ट कर चुके हैं। अर्थः - (अङ्गस्य) अङ्ग के अवयव, (भस्य) सर्वनामस्थानसञ्ज्ञक प्रत्ययों से भिन्न यकारादि वा अजादि स्वादि प्रत्यय परे वाले (अनः) अन् के (अतः) अत् का (लोपः) लोप हो जाता है।१ 'दधन् + आ' यहां सर्वनामस्थानभिन्न अजादि प्रत्यय आ (टा) के परे होने से अङ्ग के अवयव अन् के अकार का लोप हो कर 'दध्ना' प्रयोग सिद्ध होता है। 'दधि + ए' (ङे) यहां अनङ् आदेश होने पर 'दधन् + ए' इस दशा में प्रकृत- सूत्र से भसञ्ज्ञक अन् के अकार का लोप हो कर 'दध्ने' प्रयोग सिद्ध होता है। 'दधि + अस्' (ङसिं वा ङस्) यहां भी पूर्ववत् अनङ् आदेश हो कर भसञ्ज्ञक अन् के अकार का लोप करने से 'दध्नः' प्रयोग सिद्ध होता है। ओस् में 'दध्नोः' और आम् में 'दध्नाम्' भी पूर्वोक्त-प्रकारेण बनते हैं। ङि में 'दधि + इ' इस अवस्था में अनङ् आदेश होकर 'दधन् + इ' हुआ। अब अल्लोपोऽनः (२४७) से अन् के अकार का नित्यलोप प्राप्त होता है। इस पर अग्रिमसूत्र से विकल्प करते हैं- [लघु०] विधि-सूत्रम्-(२४८) विभाषा ङिइश्योः ।६।४।१३६॥ अङ्गावयवोऽसर्वनामस्थान-यजादि-स्वादिपरो योऽन्, तस्याकारस्य लोपो वा स्याद् ङिइश्योः परयोः। दध्नि, दधनि। शेषं वारिवत्। एवम् अस्थि- सक्थ्यक्षि ॥ अर्थः-अङ्ग के अवयव अन् शब्द के अकार का विकल्प करके लोप हो जाता १. यहां भस्य और अङ्गस्य ये दो अधिकार आ रहे हैं। 'भसञ्ज्ञक अङ्ग के अवयव अन् के अकार का लोप हो' इस प्रकार यदि अर्थ करें तो-अनसा, मनसा आदियों में आदि अकार का भी लोप हो जायेगा। यदि-'अन्नन्त भसञ्ज्ञक अङ्ग के अकार का लोप हो' इस प्रकार अर्थ करें तो-तक्ष्णा आदियों में तकारोत्तर अकार के लोप की भी प्राप्ति आएगी। यदि-'अन्नन्त भसञ्ज्ञक अङ्ग के अन् के अकार का लोप हो' इस प्रकार अर्थ करें तो-'अनस्तक्ष्णा' इत्यादियों में भी आदि अकार का लोप प्राप्त होगा। अतः इन सब दोषों से बचने का उपाय केवल यही है कि उपर्युक्त अर्थ किया जाये। यहां यह ध्यातव्य है कि मूलगत अर्थ और इन अर्थों में केवल यही भेद है कि मूलगत अर्थ में 'भस्य' का सम्बन्ध 'अनः' से किया गया है और इन सब अर्थों में उस का सम्बन्ध 'अङ्गस्य' के साथ किया गया है। इस विषय पर विस्तृत विचार व्याकरण के उच्च ग्रन्थों में देखें।

३४० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् है यदि सर्वनामस्थानभिन्न यकारादि वा अजादि स्वादि प्रत्ययों म से केवल 'ङि' वा 'शी' परे हो तो । व्याख्या—विभाषा ।१।१। ङिश्यो ।७।२। अत् ।६।१। लोप ।१।१। अन ।६।१। (अल्लोपोऽन स)। भस्य ।६।१। अङ्गस्य ।६।१। (ये दोनो अधिकृत हैं) । समास — ङिश्च शी च = ङिश्यौ, तयो = ङिश्यो । इतरेतरद्वन्द्व । अर्थ—(अङ्गस्य) अङ्ग के अवयव (भस्य) सर्वनामस्थानभिन्न यकारादि वा अजादि स्वादि प्रत्यय परे वाले (अन ) अन् के (अत्) ह्रस्व अकार का (विभाषा) विकल्प करके (लोप ) लोप हो जाता है (ङिश्यो ) ङि अथवा शी परे होने पर । यहा 'शी' यह नपुसकलिङ्ग वाला दीर्घ ही लिया जाता है। ह्रस्व 'शि' तो शि सर्वनामस्थानम् (२३८) से सर्वनामस्थानसञ्ज्ञक होता है, उस के परे होने पर तो भसञ्ज्ञा का होना ही असम्भव है। 'दधन् + ङि' यहा ङि परे है, अत प्रवृत्तसूत्र से अन् के अकार का विकल्प कर के लोप हो गया । लोपपक्ष मे—'दध्नि' और लोपाभावपक्ष म—'दधनि' इस प्रकार दो रूप सिद्ध हुए । दधिशब्द की सम्पूर्ण रूपमाला यथा— प्र० दधि दधिनी दधीनि । प० दध्न दधिभ्याम् दधिभ्य द्वि० ,, ,, ,, । प० ,, दध्नो दध्नाम् तृ० दध्ना दधिभ्याम् दधिभि । स० दध्नि,दधनि ,, दधिषु च० दध्ने ,, दधिभ्य । स० हे दधे',दधि' दधिनी' दधीनि' इसी प्रकार—अस्थि (हड्डी), सक्थि (ऊरु, जङ्घा) और अक्षि (आंख) शब्दो के रूप बनते हैं । (यहाँ इदन्त नपुसकलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) ॰— [लघु०] सुधि । सुधिनी । सुधीनि । हे सुधे', हे सुधि' ॥ व्याख्या—'सुधी' शब्द विशेष्यलिङ्ग के आश्रित होने से त्रिलिङ्गी है । 'कुलम्' आदि के विशेष्य होने पर यह नपुंसक हो जाता है । नपुंसक म ह्रस्वो नपुंसके प्राति- पदिकस्य (२४३) से ह्रस्व हो कर 'सुधि' शब्द बन जाता है । प्रथमा और द्वितीया विभक्ति म इस की प्रक्रिया वारिशब्दवत् होती है । तृतीयादि अजादि विभक्तिया म कुछ विशेष होता है । वह अग्रिमसूत्र द्वारा बतलाया जाता है— [लघु०] अतिदेश-सूत्रम् (२४६) तृतीयादिषु भाषितपुंस्कं पुंवद् गालवस्य ।७।१।७४॥ प्रवृत्तिनिमित्तैक्ये भाषितपुंस्कम् इगन्तं क्लीबं पुंवद्वा टादावचि । सुधिया, सुधिना--इत्यादि ॥ अर्थ—यदि प्रवृत्तिनिमित्त एक हो तो इगन्त नपुसक भाषितपुंस्क शब्द अजादि तृतीयादि विभक्तियों के परे होने पर विकल्प कर के पुंवत् होता है ।

अजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३४१ व्याख्या—तृतीयादिषु ।७।३। अक्षु ।७।३। विभक्तिषु ।७।३। इक् ।१।१। (इकोऽचि विभक्तौ से वचन और विभक्ति का विपरिणाम कर के)। नपुंसकम् ।१।१। (नपुंसकस्य झलचः से)। भाषितपुंस्कम् ।१।१। पुंवत् इत्यव्ययपदम्। गालवस्य ।६।१। 'अक्षु' से तदादिविधि तथा 'इक्' से तदन्तविधि हो जाती है। समासः—भाषितः पुमान् येन प्रवृत्तिनिमित्तेन तत् भाषितपुंस्कम्, बहुव्रीहिसमासः। तद् अस्यास्तीति— भाषितपुंस्कम्। अर्शआदिभ्योऽच् (११६१) इति मत्वर्थीयोऽच्प्रत्ययः। 'शब्दस्वरूपम्' इति विशेष्यमध्याहार्यम्। अर्थः—(तृतीयादिषु) तृतीयादि (अक्षु = अजादौ) अजादि (विभक्तिषु) विभक्तियों के परे होने पर (इक् = इगन्तम्) इगन्त (नपुंसकम्) नपुंसक शब्द (भाषितपुंस्कम्) जो पुंल्लिङ्ग में भी उसी प्रवृत्तिनिमित्त को भाषित कर चुका हो, (गालवस्य) गालव आचार्य के मत में (पुंवत्) पुंल्लिङ्गवत् होता है। गालव के मत में पुंवत् और अन्य आचार्यों के मत में पुंवत् न होने से पुंवद्भाव का विकल्प हो जायेगा। पुंवद्भाव का अभिप्राय यह है कि जो २ कार्य पुंल्लिङ्ग में होते हैं, वे यहां नपुंसक में भी हो जाएं। 'प्रवृत्तिनिमित्त' किसे कहते हैं ? प्रत्येक शब्द का अपने वाच्य को बोधन कराने का कोई न कोई निमित्त अवश्य हुआ करता है। इस निमित्त को ही प्रवृत्तिनिमित्त कहते हैं। यथा—'घट' शब्द का घड़े को बोध कराने का निमित्त 'घटत्व' है, अर्थात् घट को घट इसीलिये कहते हैं क्योंकि इस में घटत्व पाया जाता है। यदि घटत्व न पाया जाये तो उसे कोई भी घट न कहे। तो यहां 'घटत्व' प्रवृत्तिनिमित्त हुआ। शुक्ल को शुक्ल कहने का प्रवृत्तिनिमित्त 'शुक्लत्व' है। यदि शुक्ल में शुक्लत्व न पाया जाये तो उसे कोई भी शुक्ल न कहे। 'पाचक' को पाचक कहने का प्रवृत्तिनिमित्त 'पाककर्तृत्व' अर्थात् पकाने की क्रिया को करना है। यदि रसोइये में पकाना न पाया जाये तो उसे कोई भी पाचक न कहे। इसी प्रकार 'देवदत्त' आदि शब्दों का प्रवृत्तिनिमित्त तत्तद्विशेष आकृति ही है। सार यह है कि जिस विशेषता के कारण कोई शब्द अपने अर्थ को जनाता है; उस शब्द की वह विशेषता ही उस का प्रवृत्तिनिमित्त होती है। तथाहि— (१) 'घट' शब्द की विशेषता घटत्व ही प्रवृत्तिनिमित्त है। (२) 'पट' ,, ,, ,, पटत्व ,, ,, ,,। (३) 'यज्ञदत्त' ,, ,, ,, आकृतिविशेष ,, ,, ,,। (४) 'सुधि' ,, ,, ,, शोभनध्यानवत्त्व ,, ,, ,,। (५) 'सुलु' ,, ,, ,, शोभनलवनकर्तृत्व ,, ,, ,,। (६) 'धातृ' ,, ,, ,, धारणकर्तृत्व ,, ,, ,,। (७) 'अनादि' ,, ,, ,, आदिहीनता ,, ,, ,,। (८) 'ज्ञातृ' ,, ,, ,, ज्ञानकर्तृत्व ,, ,, ,,। (६) 'प्रद्यु' ,, ,, ,, निर्मलाकाशवत्त्व ,, ,, ,,।

३४२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् (१०) 'हरि' शब्द की विशेषता 'प्रकृष्टप्लवनवत्त्व' ही प्रवृत्तिनिमित्त है। (११) सुनु ,, ,, ,, 'शोभननौकावत्त्व' ,, ,, ।१ सूत्र का भावार्थ— जिस इगन्त नपुंसकलिंगी शब्द का जो प्रवृत्तिनिमित्त नपुंसक में हो यदि वही प्रवृत्तिनिमित्त उस का पुंल्लिङ्ग में भी हो तो तृतीयादि अजादि विभक्तियों के पर होने पर उस नपुंसक शब्द में विकल्प कर के पुंवद्भावात् कार्य होते हैं। सुधि शब्द इगन्त नपुंसक है। इस का प्रवृत्तिनिमित्त 'शोभनध्यानवत्तृत्व' है। पुंल्लिङ्ग में भी इस का यही प्रवृत्तिनिमित्त होता है। अतः तृतीयादि अजादि विभक्तियों में इसे विकल्प कर के पुंवत्कार्य होगा। पुंवत्पक्ष में पुनः वही दीर्घान्त 'सुधी' शब्द आ जायेगा। तत्र न भूसुधियो (१०२) से यण् का निषेध हो कर अचि श्नु० (१६६) से इयङ् करने पर 'सुधिया' आदि रूप बनेंगे। जिस पक्ष में पुंवत् न होगा उस पक्ष में वारिशब्दवत् प्रक्रिया हो कर 'सुधिना' आदि रूप सिद्ध होंगे। इस की रूपमाला यथा— प्रथमा सुधि सुधिनी सुधीनि द्वितीया ,, ,, ,, तृतीया सुधिया, सुधिना सुधिभ्याम् सुधिभिः चतुर्थी सुधिये, सुधिने ,, सुधिभ्यः पञ्चमी सुधियः, सुधिनः ,, ,, षष्ठी ,, ,, सुधियोः, सुधिनोः सुधियाम्, सुधीनाम् सप्तमी सुधियि, सुधिनि ,, सुधिषु सम्बोधन हे सुधे!, हे सुधि! हे सुधिनी! हे सुधीनि! इसी प्रकार निम्नस्थ भाषितपुंस्क शब्दों में वैकल्पिक पुंवद्भाव जानना चाहिए। पुंवत्पक्ष में हरिशब्दवत् तथा तदभावपक्ष में वारिशब्दवत् रूप बनेंगे। १ अनादि = जिस का आदि न हो (ब्रह्म)। २ शुचि = पवित्र (कुल)। ३ सादि = जिस का आदि हो (कार्य)। ४ सुकवि = श्रेष्ठ कवियों वाला (कुल)। ५ सुयति = श्रेष्ठ यतियों वाला (धन)। ६ सुशकुनि = अच्छे पक्षियों वाला (वन)। ७ सुमणि = श्रेष्ठ मणियों वाला (भूषण)। ८ सुध्वनि = अच्छी ध्वनि वाला (वाद्य)। ९ सुकपि = अच्छे वानरों वाला (अरण्य)। १० सुभूरि = अच्छे विद्वानों वाला (कुल)। ११ अतिध्वनि = ध्वनि को लांघा हुआ (वायुयान)। १२ निरादि = आदिहीन (ब्रह्म)। (यहां इकारान्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है) ─── ० ─── १ प्रवृत्तिनिमित्तं पदप्रवृत्तावनावच्छेदकम्। यथा घटत्वं घटपदस्य प्रवृत्तिनिमित्तम्। एवं शुक्लादिपदस्य शुक्लत्वम् पाचकस्य पाकः, देवदत्तादिसंज्ञाशब्दादि प्रवृत्तिनिमित्त- म्भवति। प्रवृत्तिनिमित्तशब्दस्य व्युत्पत्तिः — प्रवृत्तेः = शब्दानांमर्थबोधनशक्तेः निमित्तम् = प्रयोजकम् इति। तच्च शक्यतावच्छेदकम्भवतीति ज्ञेयम्। तल्लक्ष- णञ्च प्रकारतया शक्तिग्रहविषयत्वम् — इति तत्त्वचिन्तामणौ श्रीमद्गङ्गेशोपाध्यायाः।

अजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३४३ अब उकारान्त नपुंसक शब्दों का वर्णन करते हैं— [लघु०] मधु। मधुनी। मधूनि। हे मधो!, हे मधु! ॥ व्याख्या—'मधु' शब्द पुंन्नपुंसक होता है। पुंलिङ्ग में इस का अर्थ—१. वसन्त ऋतु, २. चैत्रमास, ३. दैत्यविशेष आदि होता है। नपुंसक में इस का अर्थ—१. शहद, २. मद्य आदि होता है। अत एव प्रवृत्तिनिमित्त के एक न होने से यह भाषितपुंस्क नहीं होता। नपुंसक में इस की सम्पूर्ण प्रक्रिया वारिशब्दवत् होती है; किञ्चित् भी अन्तर नहीं होता। रूपमाला यथा— (मधु = शहद) प्र० मधु मधुनी मधूनि | प० मधुनः मधुभ्याम् मधुभ्यः द्वि० ,, ,, ,, | ष० ,, मधुनोः मधूनाम् तृ० मधुना मधुभ्याम् मधुभिः | स० मधुनि ,, मधुषु च० मधुने ,, मधुभ्यः | सं० हे मधो!,मधु! हे मधुनी! हे मधूनि! इसीप्रकार निम्नस्थ शब्दों के रूप होते हैं। [* यह णत्वविधि का चिह्न है।] १. अम्बु = जल। २. अश्रु * = आंसू। ३. उडु¹ = नक्षत्र, तारा। ४. जतु = लाख। ५. जत्रु * = गले के नीचे की दो हड्डियां, स्कन्धसन्धि। ६. तालु = दांतों के पीछे मुख की कठिन छत। ७. त्रपु* = जो अग्नि को पा कर मानो लज्जा से पिघल जाता है—सीसा वा रांगा। ८. दारु ² = लकड़ी। ६. पीलु³ = पीलु का फल। १०. वसु = धन। ११. वस्तु = पदार्थ, चीज़। १२. शिलाजतु = शिलाजीत। १३. श्मश्रु = दाढ़ी-मूंछ। १४. हिङ्गु = हींग। नोट—ध्यान रहे कि विशुद्ध उदन्त नपुंसक शब्द संस्कृतसाहित्य में बहुत थोड़े हैं। हां ! भाषितपुंस्क पर्याप्त मिल सकते हैं। इनका वर्णन आगे देखें। [लघु०] सुलु। सुलुनी। सुलूनि। सुल्वा, सुलुने—इत्यादि॥ व्याख्या—सुष्ठु लुनातीति सुलु (शस्त्रम्)। जो भली प्रकार काटता है उसे १. 'उडु' शब्द स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिंग दोनों में प्रयुक्त होता है; अतः यह भाषित- पुंस्क नहीं होता। उडु वा स्त्रियाम्—इत्यमरः। २. कुछ लोगों के मत में 'दारु' शब्द पुंलिङ्ग भी माना जाता है। पुंन्नपुंसकयोर्दारु इति त्रिकाण्डशेषः। तब वह भाषितपुंस्क भी हो जायेगा। इसी प्रकार 'देवदारु' शब्द के विषय में भी समझना चाहिये। अमुं पुरः पश्यसि देवदारुम् (रघुवंशे २.३६); सप्त स्युर्देवदारुणि (इत्यमरे)। ३. 'पीलु' शब्द पुंलिङ्ग और नपुंसक दोनों लिङ्गों में प्रयुक्त होता है। परन्तु इस का पुंलिङ्ग में 'पीलु-वृक्ष' और नपुंसक में 'पीलु-फल' अर्थ होता है। अतः प्रवृत्ति- निमित्त के एक न होने के कारण यह भाषितपुंस्क नहीं होता। इस विषय पर एक श्लोक बहुत प्रसिद्ध है— पीलुर्वृक्षः फलं पीलु पीलुने न तु पीलवे। वृक्षे निमित्तं पीलुत्वं तज्जत्वं तत्फले पुनः॥