भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 357

३४२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् (१०) 'हरि' शब्द की विशेषता 'प्रकृष्टप्लवनवत्त्व' ही प्रवृत्तिनिमित्त है। (११) सुनु ,, ,, ,, 'शोभननौकावत्त्व' ,, ,, ।१ सूत्र का भावार्थ— जिस इगन्त नपुंसकलिंगी शब्द का जो प्रवृत्तिनिमित्त नपुंसक में हो यदि वही प्रवृत्तिनिमित्त उस का पुंल्लिङ्ग में भी हो तो तृतीयादि अजादि विभक्तियों के पर होने पर उस नपुंसक शब्द में विकल्प कर के पुंवद्भावात् कार्य होते हैं। सुधि शब्द इगन्त नपुंसक है। इस का प्रवृत्तिनिमित्त 'शोभनध्यानवत्तृत्व' है। पुंल्लिङ्ग में भी इस का यही प्रवृत्तिनिमित्त होता है। अतः तृतीयादि अजादि विभक्तियों में इसे विकल्प कर के पुंवत्कार्य होगा। पुंवत्पक्ष में पुनः वही दीर्घान्त 'सुधी' शब्द आ जायेगा। तत्र न भूसुधियो (१०२) से यण् का निषेध हो कर अचि श्नु० (१६६) से इयङ् करने पर 'सुधिया' आदि रूप बनेंगे। जिस पक्ष में पुंवत् न होगा उस पक्ष में वारिशब्दवत् प्रक्रिया हो कर 'सुधिना' आदि रूप सिद्ध होंगे। इस की रूपमाला यथा— प्रथमा सुधि सुधिनी सुधीनि द्वितीया ,, ,, ,, तृतीया सुधिया, सुधिना सुधिभ्याम् सुधिभिः चतुर्थी सुधिये, सुधिने ,, सुधिभ्यः पञ्चमी सुधियः, सुधिनः ,, ,, षष्ठी ,, ,, सुधियोः, सुधिनोः सुधियाम्, सुधीनाम् सप्तमी सुधियि, सुधिनि ,, सुधिषु सम्बोधन हे सुधे!, हे सुधि! हे सुधिनी! हे सुधीनि! इसी प्रकार निम्नस्थ भाषितपुंस्क शब्दों में वैकल्पिक पुंवद्भाव जानना चाहिए। पुंवत्पक्ष में हरिशब्दवत् तथा तदभावपक्ष में वारिशब्दवत् रूप बनेंगे। १ अनादि = जिस का आदि न हो (ब्रह्म)। २ शुचि = पवित्र (कुल)। ३ सादि = जिस का आदि हो (कार्य)। ४ सुकवि = श्रेष्ठ कवियों वाला (कुल)। ५ सुयति = श्रेष्ठ यतियों वाला (धन)। ६ सुशकुनि = अच्छे पक्षियों वाला (वन)। ७ सुमणि = श्रेष्ठ मणियों वाला (भूषण)। ८ सुध्वनि = अच्छी ध्वनि वाला (वाद्य)। ९ सुकपि = अच्छे वानरों वाला (अरण्य)। १० सुभूरि = अच्छे विद्वानों वाला (कुल)। ११ अतिध्वनि = ध्वनि को लांघा हुआ (वायुयान)। १२ निरादि = आदिहीन (ब्रह्म)। (यहां इकारान्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है) ─── ० ─── १ प्रवृत्तिनिमित्तं पदप्रवृत्तावनावच्छेदकम्। यथा घटत्वं घटपदस्य प्रवृत्तिनिमित्तम्। एवं शुक्लादिपदस्य शुक्लत्वम् पाचकस्य पाकः, देवदत्तादिसंज्ञाशब्दादि प्रवृत्तिनिमित्त- म्भवति। प्रवृत्तिनिमित्तशब्दस्य व्युत्पत्तिः — प्रवृत्तेः = शब्दानांमर्थबोधनशक्तेः निमित्तम् = प्रयोजकम् इति। तच्च शक्यतावच्छेदकम्भवतीति ज्ञेयम्। तल्लक्ष- णञ्च प्रकारतया शक्तिग्रहविषयत्वम् — इति तत्त्वचिन्तामणौ श्रीमद्गङ्गेशोपाध्यायाः।