लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३४१ व्याख्या—तृतीयादिषु ।७।३। अक्षु ।७।३। विभक्तिषु ।७।३। इक् ।१।१। (इकोऽचि विभक्तौ से वचन और विभक्ति का विपरिणाम कर के)। नपुंसकम् ।१।१। (नपुंसकस्य झलचः से)। भाषितपुंस्कम् ।१।१। पुंवत् इत्यव्ययपदम्। गालवस्य ।६।१। 'अक्षु' से तदादिविधि तथा 'इक्' से तदन्तविधि हो जाती है। समासः—भाषितः पुमान् येन प्रवृत्तिनिमित्तेन तत् भाषितपुंस्कम्, बहुव्रीहिसमासः। तद् अस्यास्तीति— भाषितपुंस्कम्। अर्शआदिभ्योऽच् (११६१) इति मत्वर्थीयोऽच्प्रत्ययः। 'शब्दस्वरूपम्' इति विशेष्यमध्याहार्यम्। अर्थः—(तृतीयादिषु) तृतीयादि (अक्षु = अजादौ) अजादि (विभक्तिषु) विभक्तियों के परे होने पर (इक् = इगन्तम्) इगन्त (नपुंसकम्) नपुंसक शब्द (भाषितपुंस्कम्) जो पुंल्लिङ्ग में भी उसी प्रवृत्तिनिमित्त को भाषित कर चुका हो, (गालवस्य) गालव आचार्य के मत में (पुंवत्) पुंल्लिङ्गवत् होता है। गालव के मत में पुंवत् और अन्य आचार्यों के मत में पुंवत् न होने से पुंवद्भाव का विकल्प हो जायेगा। पुंवद्भाव का अभिप्राय यह है कि जो २ कार्य पुंल्लिङ्ग में होते हैं, वे यहां नपुंसक में भी हो जाएं। 'प्रवृत्तिनिमित्त' किसे कहते हैं ? प्रत्येक शब्द का अपने वाच्य को बोधन कराने का कोई न कोई निमित्त अवश्य हुआ करता है। इस निमित्त को ही प्रवृत्तिनिमित्त कहते हैं। यथा—'घट' शब्द का घड़े को बोध कराने का निमित्त 'घटत्व' है, अर्थात् घट को घट इसीलिये कहते हैं क्योंकि इस में घटत्व पाया जाता है। यदि घटत्व न पाया जाये तो उसे कोई भी घट न कहे। तो यहां 'घटत्व' प्रवृत्तिनिमित्त हुआ। शुक्ल को शुक्ल कहने का प्रवृत्तिनिमित्त 'शुक्लत्व' है। यदि शुक्ल में शुक्लत्व न पाया जाये तो उसे कोई भी शुक्ल न कहे। 'पाचक' को पाचक कहने का प्रवृत्तिनिमित्त 'पाककर्तृत्व' अर्थात् पकाने की क्रिया को करना है। यदि रसोइये में पकाना न पाया जाये तो उसे कोई भी पाचक न कहे। इसी प्रकार 'देवदत्त' आदि शब्दों का प्रवृत्तिनिमित्त तत्तद्विशेष आकृति ही है। सार यह है कि जिस विशेषता के कारण कोई शब्द अपने अर्थ को जनाता है; उस शब्द की वह विशेषता ही उस का प्रवृत्तिनिमित्त होती है। तथाहि— (१) 'घट' शब्द की विशेषता घटत्व ही प्रवृत्तिनिमित्त है। (२) 'पट' ,, ,, ,, पटत्व ,, ,, ,,। (३) 'यज्ञदत्त' ,, ,, ,, आकृतिविशेष ,, ,, ,,। (४) 'सुधि' ,, ,, ,, शोभनध्यानवत्त्व ,, ,, ,,। (५) 'सुलु' ,, ,, ,, शोभनलवनकर्तृत्व ,, ,, ,,। (६) 'धातृ' ,, ,, ,, धारणकर्तृत्व ,, ,, ,,। (७) 'अनादि' ,, ,, ,, आदिहीनता ,, ,, ,,। (८) 'ज्ञातृ' ,, ,, ,, ज्ञानकर्तृत्व ,, ,, ,,। (६) 'प्रद्यु' ,, ,, ,, निर्मलाकाशवत्त्व ,, ,, ,,।