लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
पृष्ठ 355, कुल 633 में से
संदर्भ में पढ़ें३४० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् है यदि सर्वनामस्थानभिन्न यकारादि वा अजादि स्वादि प्रत्ययों म से केवल 'ङि' वा 'शी' परे हो तो । व्याख्या—विभाषा ।१।१। ङिश्यो ।७।२। अत् ।६।१। लोप ।१।१। अन ।६।१। (अल्लोपोऽन स)। भस्य ।६।१। अङ्गस्य ।६।१। (ये दोनो अधिकृत हैं) । समास — ङिश्च शी च = ङिश्यौ, तयो = ङिश्यो । इतरेतरद्वन्द्व । अर्थ—(अङ्गस्य) अङ्ग के अवयव (भस्य) सर्वनामस्थानभिन्न यकारादि वा अजादि स्वादि प्रत्यय परे वाले (अन ) अन् के (अत्) ह्रस्व अकार का (विभाषा) विकल्प करके (लोप ) लोप हो जाता है (ङिश्यो ) ङि अथवा शी परे होने पर । यहा 'शी' यह नपुसकलिङ्ग वाला दीर्घ ही लिया जाता है। ह्रस्व 'शि' तो शि सर्वनामस्थानम् (२३८) से सर्वनामस्थानसञ्ज्ञक होता है, उस के परे होने पर तो भसञ्ज्ञा का होना ही असम्भव है। 'दधन् + ङि' यहा ङि परे है, अत प्रवृत्तसूत्र से अन् के अकार का विकल्प कर के लोप हो गया । लोपपक्ष मे—'दध्नि' और लोपाभावपक्ष म—'दधनि' इस प्रकार दो रूप सिद्ध हुए । दधिशब्द की सम्पूर्ण रूपमाला यथा— प्र० दधि दधिनी दधीनि । प० दध्न दधिभ्याम् दधिभ्य द्वि० ,, ,, ,, । प० ,, दध्नो दध्नाम् तृ० दध्ना दधिभ्याम् दधिभि । स० दध्नि,दधनि ,, दधिषु च० दध्ने ,, दधिभ्य । स० हे दधे',दधि' दधिनी' दधीनि' इसी प्रकार—अस्थि (हड्डी), सक्थि (ऊरु, जङ्घा) और अक्षि (आंख) शब्दो के रूप बनते हैं । (यहाँ इदन्त नपुसकलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) ॰— [लघु०] सुधि । सुधिनी । सुधीनि । हे सुधे', हे सुधि' ॥ व्याख्या—'सुधी' शब्द विशेष्यलिङ्ग के आश्रित होने से त्रिलिङ्गी है । 'कुलम्' आदि के विशेष्य होने पर यह नपुंसक हो जाता है । नपुंसक म ह्रस्वो नपुंसके प्राति- पदिकस्य (२४३) से ह्रस्व हो कर 'सुधि' शब्द बन जाता है । प्रथमा और द्वितीया विभक्ति म इस की प्रक्रिया वारिशब्दवत् होती है । तृतीयादि अजादि विभक्तिया म कुछ विशेष होता है । वह अग्रिमसूत्र द्वारा बतलाया जाता है— [लघु०] अतिदेश-सूत्रम् (२४६) तृतीयादिषु भाषितपुंस्कं पुंवद् गालवस्य ।७।१।७४॥ प्रवृत्तिनिमित्तैक्ये भाषितपुंस्कम् इगन्तं क्लीबं पुंवद्वा टादावचि । सुधिया, सुधिना--इत्यादि ॥ अर्थ—यदि प्रवृत्तिनिमित्त एक हो तो इगन्त नपुसक भाषितपुंस्क शब्द अजादि तृतीयादि विभक्तियों के परे होने पर विकल्प कर के पुंवत् होता है ।