भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 354

अजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३३६ अर्थः-अङ्ग के अवयव अन् शब्द के अकार का लोप हो जाता है यदि सर्व- नामस्थान-भिन्न यकारादि वा अजादि स्वादि प्रत्यय परे हो तो। व्याख्या-अत् ।६।१। (यहां सुपां सुलुक्० से षष्ठी का लुक् हुआ है)। लोपः ।१।१। अनः ।६।१। भस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। जिस से परे सर्वनामस्थानभिन्न यकारादि वा अजादि स्वादि प्रत्यय हो उसे 'भ' कहते हैं-यह पीछे (१६५) सूत्र पर स्पष्ट कर चुके हैं। अर्थः - (अङ्गस्य) अङ्ग के अवयव, (भस्य) सर्वनामस्थानसञ्ज्ञक प्रत्ययों से भिन्न यकारादि वा अजादि स्वादि प्रत्यय परे वाले (अनः) अन् के (अतः) अत् का (लोपः) लोप हो जाता है।१ 'दधन् + आ' यहां सर्वनामस्थानभिन्न अजादि प्रत्यय आ (टा) के परे होने से अङ्ग के अवयव अन् के अकार का लोप हो कर 'दध्ना' प्रयोग सिद्ध होता है। 'दधि + ए' (ङे) यहां अनङ् आदेश होने पर 'दधन् + ए' इस दशा में प्रकृत- सूत्र से भसञ्ज्ञक अन् के अकार का लोप हो कर 'दध्ने' प्रयोग सिद्ध होता है। 'दधि + अस्' (ङसिं वा ङस्) यहां भी पूर्ववत् अनङ् आदेश हो कर भसञ्ज्ञक अन् के अकार का लोप करने से 'दध्नः' प्रयोग सिद्ध होता है। ओस् में 'दध्नोः' और आम् में 'दध्नाम्' भी पूर्वोक्त-प्रकारेण बनते हैं। ङि में 'दधि + इ' इस अवस्था में अनङ् आदेश होकर 'दधन् + इ' हुआ। अब अल्लोपोऽनः (२४७) से अन् के अकार का नित्यलोप प्राप्त होता है। इस पर अग्रिमसूत्र से विकल्प करते हैं- [लघु०] विधि-सूत्रम्-(२४८) विभाषा ङिइश्योः ।६।४।१३६॥ अङ्गावयवोऽसर्वनामस्थान-यजादि-स्वादिपरो योऽन्, तस्याकारस्य लोपो वा स्याद् ङिइश्योः परयोः। दध्नि, दधनि। शेषं वारिवत्। एवम् अस्थि- सक्थ्यक्षि ॥ अर्थः-अङ्ग के अवयव अन् शब्द के अकार का विकल्प करके लोप हो जाता १. यहां भस्य और अङ्गस्य ये दो अधिकार आ रहे हैं। 'भसञ्ज्ञक अङ्ग के अवयव अन् के अकार का लोप हो' इस प्रकार यदि अर्थ करें तो-अनसा, मनसा आदियों में आदि अकार का भी लोप हो जायेगा। यदि-'अन्नन्त भसञ्ज्ञक अङ्ग के अकार का लोप हो' इस प्रकार अर्थ करें तो-तक्ष्णा आदियों में तकारोत्तर अकार के लोप की भी प्राप्ति आएगी। यदि-'अन्नन्त भसञ्ज्ञक अङ्ग के अन् के अकार का लोप हो' इस प्रकार अर्थ करें तो-'अनस्तक्ष्णा' इत्यादियों में भी आदि अकार का लोप प्राप्त होगा। अतः इन सब दोषों से बचने का उपाय केवल यही है कि उपर्युक्त अर्थ किया जाये। यहां यह ध्यातव्य है कि मूलगत अर्थ और इन अर्थों में केवल यही भेद है कि मूलगत अर्थ में 'भस्य' का सम्बन्ध 'अनः' से किया गया है और इन सब अर्थों में उस का सम्बन्ध 'अङ्गस्य' के साथ किया गया है। इस विषय पर विस्तृत विचार व्याकरण के उच्च ग्रन्थों में देखें।