लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३४३ अब उकारान्त नपुंसक शब्दों का वर्णन करते हैं— [लघु०] मधु। मधुनी। मधूनि। हे मधो!, हे मधु! ॥ व्याख्या—'मधु' शब्द पुंन्नपुंसक होता है। पुंलिङ्ग में इस का अर्थ—१. वसन्त ऋतु, २. चैत्रमास, ३. दैत्यविशेष आदि होता है। नपुंसक में इस का अर्थ—१. शहद, २. मद्य आदि होता है। अत एव प्रवृत्तिनिमित्त के एक न होने से यह भाषितपुंस्क नहीं होता। नपुंसक में इस की सम्पूर्ण प्रक्रिया वारिशब्दवत् होती है; किञ्चित् भी अन्तर नहीं होता। रूपमाला यथा— (मधु = शहद) प्र० मधु मधुनी मधूनि | प० मधुनः मधुभ्याम् मधुभ्यः द्वि० ,, ,, ,, | ष० ,, मधुनोः मधूनाम् तृ० मधुना मधुभ्याम् मधुभिः | स० मधुनि ,, मधुषु च० मधुने ,, मधुभ्यः | सं० हे मधो!,मधु! हे मधुनी! हे मधूनि! इसीप्रकार निम्नस्थ शब्दों के रूप होते हैं। [* यह णत्वविधि का चिह्न है।] १. अम्बु = जल। २. अश्रु * = आंसू। ३. उडु¹ = नक्षत्र, तारा। ४. जतु = लाख। ५. जत्रु * = गले के नीचे की दो हड्डियां, स्कन्धसन्धि। ६. तालु = दांतों के पीछे मुख की कठिन छत। ७. त्रपु* = जो अग्नि को पा कर मानो लज्जा से पिघल जाता है—सीसा वा रांगा। ८. दारु ² = लकड़ी। ६. पीलु³ = पीलु का फल। १०. वसु = धन। ११. वस्तु = पदार्थ, चीज़। १२. शिलाजतु = शिलाजीत। १३. श्मश्रु = दाढ़ी-मूंछ। १४. हिङ्गु = हींग। नोट—ध्यान रहे कि विशुद्ध उदन्त नपुंसक शब्द संस्कृतसाहित्य में बहुत थोड़े हैं। हां ! भाषितपुंस्क पर्याप्त मिल सकते हैं। इनका वर्णन आगे देखें। [लघु०] सुलु। सुलुनी। सुलूनि। सुल्वा, सुलुने—इत्यादि॥ व्याख्या—सुष्ठु लुनातीति सुलु (शस्त्रम्)। जो भली प्रकार काटता है उसे १. 'उडु' शब्द स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिंग दोनों में प्रयुक्त होता है; अतः यह भाषित- पुंस्क नहीं होता। उडु वा स्त्रियाम्—इत्यमरः। २. कुछ लोगों के मत में 'दारु' शब्द पुंलिङ्ग भी माना जाता है। पुंन्नपुंसकयोर्दारु इति त्रिकाण्डशेषः। तब वह भाषितपुंस्क भी हो जायेगा। इसी प्रकार 'देवदारु' शब्द के विषय में भी समझना चाहिये। अमुं पुरः पश्यसि देवदारुम् (रघुवंशे २.३६); सप्त स्युर्देवदारुणि (इत्यमरे)। ३. 'पीलु' शब्द पुंलिङ्ग और नपुंसक दोनों लिङ्गों में प्रयुक्त होता है। परन्तु इस का पुंलिङ्ग में 'पीलु-वृक्ष' और नपुंसक में 'पीलु-फल' अर्थ होता है। अतः प्रवृत्ति- निमित्त के एक न होने के कारण यह भाषितपुंस्क नहीं होता। इस विषय पर एक श्लोक बहुत प्रसिद्ध है— पीलुर्वृक्षः फलं पीलु पीलुने न तु पीलवे। वृक्षे निमित्तं पीलुत्वं तज्जत्वं तत्फले पुनः॥