लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३२६ अर्थः—डतर आदि पञ्च नपुंसक शब्दों से परे सुं और अम् के स्थान पर अद्द् आदेश हो। व्याख्या—डतरादिभ्यः ।५।३। पञ्चभ्यः ।५।३। नपुंसकेभ्यः ।५।३। (स्वमो- र्नपुंसकात् से वचनविपरिणाम द्वारा)। स्वमोः ।६।२। अद्द् ।१।१। समासः—डतर आदिर्येषां ते डतरादयः, तेभ्यः = डतरादिभ्यः, तद्गुणसंविज्ञानबहुव्रीहिसमासः। डतर आदि पञ्च शब्द सर्वादिगण के अन्तर्गत आते हैं। १. डतर, २. डतम, ३. अन्य ४. अन्यतर, ५. इतर—ये पञ्च डतरादि कहाते हैं। इन में डतर और डतम प्रत्यय हैं; अतः प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणम् परिभाषा द्वारा डतरप्रत्ययान्त और डतमप्रत्ययान्त शब्दों का ग्रहण होगा। अर्थः— (डतरादिभ्यः) डतरप्रत्ययान्त, डतमप्रत्ययान्त, अन्य, अन्यतर और इतर (पञ्चभ्यः) इन पञ्च (नपुंसकेभ्यः) नपुंसक शब्दों से परे (स्वमोः) सुँ और अम् को (अद्द्) अद्द् आदेश हो। यह सूत्र अतोऽम् (२३४) सूत्र का अपवाद है। 'कतर + सु' यहां सकार को अद्द् आदेश हो कर—'कतर + अद्द्'। हल- न्त्यम् (१) से अन्त्य हल् = डकार की इत्सञ्ज्ञा होने से लोप हो कर—'कतर + अद्'। अब यहां प्रथमयोः पूर्वसवर्णः (१२६) से पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होता है, परन्तु वह अनिष्ट है; टिलोप ही इष्ट है। अतः इस का अग्रिमसूत्र से विधान करते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२४२) टेः ।६।४।१४३॥ डिति भस्य टेलोपः। कतरत्, कतरद्। कतरे। कतराणि। हे कतरत्। शेषं पुंवत्। एवं कतमत्, इतरत्, अन्यत्, अन्यतरत्। अन्यतमस्य त्वन्यतम- मित्येव॥ अर्थः—डित् परे होने पर भसञ्ज्ञक टि का लोप हो। व्याख्या—डिति ।७।१। (ति विंशतेर्डिति से)। भस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। टेः ।६।१। लोपः ।१।१। (अल्लोपोऽनः से)। अर्थः— (डिति) डित् परे होने पर (भस्य) भसञ्ज्ञक (टेः) टि का (लोपः) लोप होता है। 'कतर + अद्' यहां स्थानिवद्भाव से 'अद्' स्वादि है। अजादि और असर्वनाम- स्थान भी; अतः इस के परे होने से यचि भम् (१६५) द्वारा पूर्व की भसञ्ज्ञा हो जाती है। पुनः 'अद्द्' इस डित् के परे होने पर भसञ्ज्ञक टि= अकार का प्रकृतसूत्र से लोप हो—कतर् + अद् = कतरद्। अब वाऽवसाने (१४६) से दकार को विकल्प कर के चर्=तकार हो कर 'कतरत्, कतरद्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। 'कतर + औ' यहां नपुंसकाच्च (२३) से 'औ' को 'शी' आदेश, अनुबन्धलोप और गुण करने से 'कतरे' प्रयोग सिद्ध होता है। 'कतर + अस्(जस्) यहां जश्शसोः शिः (२३७) से जस् को शि आदेश हो कर शि सर्वनामस्थानम् (२३८) से उस की सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा हो जाती है। पुनः- नपुंसकस्य झलचः (२३६) से नुम् का आगम हो सर्वनामस्थाने चाऽसम्बुद्धौ (१७७) से उपधादीर्घ कर नकार को णकार करने से—'कतराणि' प्रयोग बनता है।