लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् 'हे कतर + स्' (सुं) यहां भी पूर्ववत् सकार को अद्द् आदेश होकर भसञ्ज्ञक टि का लोप कर चर्त्व करने से—'हे कतरत्, हे कतरद्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। ध्यान रहे कि यहां एङ्कस्वात् सम्बुद्धे (१३४) से तकार का लोप नहीं होता, क्योंकि 'कतर' यह ह्रस्वान्त होते हुए भी अङ्ग नहीं है, अङ्ग तो 'कतरद्' है। अन्त का अकार प्रत्यय का अवयव है प्रकृति का नहीं। प्रश्न—'अद्द्' की बजाय 'अद्' आदेश ही क्यों नहीं कर देते ? उत्तर—यदि 'अद्' आदेश का विधान करते तो 'अम्' में तो कुछ अन्तर न होता क्योंकि अम् के स्थान पर हुए अद्' को स्थानिवत् मानने से अमि पूर्व (१३५) से पूर्वरूप होकर 'कतरत्' सिद्ध हो जाता। परन्तु 'सुं' में 'अद्' आदेश होने पर अतो गुणे (२७४) का बाध कर पूर्वसवर्णदीर्घ होकर 'हे कतरात्', हे कतराद्' ये अनिष्ट रूप बन जाते। अतः इसे डित् करना ही युक्त है। प्रश्न—यदि पूर्वसवर्णदीर्घ का निवारण ही अभीष्ट है तो केवल 'द्' या 'त्' आदेश ही विधान क्यों नहीं कर देते ? उत्तर—यदि दकार वा तकार आदेश ही विधान करते तो प्रथमा और द्वितीया में तो कोई दोष न आता किन्तु सम्बुद्धि में एङ्कस्वात्सम्बुद्धे (१३४) से लोप हो कर 'हे कतर' यह अनिष्ट रूप बन जाता। अतः 'अड्ड्' आदेश करना ही युक्त है। डित्त्वाभावेऽमि सिद्धेऽपि सावदिष्टं प्रसज्यते । दकारे वा तकारे वा सम्बुद्धौ तत्स्थितिः कुतः ॥ द्वितीया विभक्ति में भी प्रथमाविभक्तिवत् प्रक्रिया होनी है। तृतीयादि विभ- क्तियों में पुँल्लिङ्गवत् प्रक्रिया जाननी चाहिये। रूपमाला यथा— प्र० कतरत्-द् कतरे कतराणि | प० कतरस्मात्* कतराभ्याम् कतरेभ्यः द्वि० ,, ,, ,, ,, | ष० कतरस्य कतरयोः कतरेषाम्‡ तृ० कतरेण कतराभ्याम् कतरैः | स० कतरस्मिन्* ,, कतरेषु च० कतरस्मै✓ ,, कतरेभ्यः | सं० हे कतरत्-द् हे कतरे हे कतराणि ✓ सर्वनाम्नः स्मै (१५३)। * ङसिंङ्योः स्मात्स्मिनौ (१५४)। ‡ आमि सर्वनाम्नः सुट् (१५५), बहुवचने झल्येत् (१४५)। इसी प्रकार—१. यतर (दो में जो) २ यतम (बहुतों में जो) ३ ततर (दो में वह), ४ कतम (बहुतों में कौन), ५ ततम (बहुतों में वह), ६ एकतम (बहुतों में एक), ७ अन्य (दूसरा), ८ अन्यतर (दो में एक), ६ इतर (भिन्न) शब्दों के उच्चारण होते हैं। ध्यान रहे कि ये सब शब्द त्रिलिङ्गी हैं, विशेष्यलिङ्ग के आश्रित रहते हैं। विशेष्य नपुंसक होगा तो ये नपुंसक में प्रयुक्त होंगे। नोट—अन्यतर और अन्यतम ये दोनों शब्द अव्युत्पन्न हैं, डतरान्त या डतमान्त नहीं। इन में प्रथम तो सर्वादिगण में पढ़ा गया है और डतरादि पञ्चों में भी आता है अतः इस का उच्चारण कतरवत् होता है। परन्तु अन्यतम शब्द सर्वादिगण में नहीं आता अतः इस का उच्चारण ज्ञानवत् होता है। अद्द् आदेश नहीं होता। इसी तरह स्मै, स्मात्, सुट् और स्मिन् भी नहीं होते।