भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 346

अजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३३१ एकतर (दो में एक) शब्द डतरप्रत्ययान्त है; अतः इस की प्रक्रिया ‘कतर’ शब्दवत् प्राप्त होती है; परन्तु यह अनिष्ट है। इस के प्रथमा और द्वितीया विभक्ति में ज्ञानवत् रूप ही इष्ट हैं, अतः अग्रिमवार्त्तिक प्रवृत्त होता है— [लघु०] वा०—(२३) एकतरात् प्रतिषेधो वक्तव्यः ॥ एकतरम् ॥ अर्थः—नपुंसक एकतरशब्द से परे सुँ और अम् को अद्द् आदेश न हो। व्याख्या—एकतरात् ।५।१। प्रतिषेधः ।१।१। यह वार्त्तिक भाष्य में अद्द् आदेश के प्रकरण में पढ़ा है अतः यह उसी का निषेध करता है। अर्थः—(एकतरात्) एकतर शब्द से परे (प्रतिषेधः) सुँ और अम् को अद्द् आदेश न हो। अद्द् आदेश न होने से प्रथमा और द्वितीया में 'ज्ञान'शब्दवत् प्रक्रिया होगी। परन्तु ङे, ङसिँ, ङि और आम् में सर्वनामकार्य निर्बाध होंगे। रूपमाला यथा— प्र० एकतरम् एकतरे एकतराणि प० एकतरस्मात् एकतराभ्याम् एकतरेभ्यः द्वि० " " " प० एकतरस्य एकतरयोः एकतरेषाम् तृ० एकतरेण एकतराभ्याम् एकतरैः स० एकतरस्मिन् " एकतरेषु च० एकतरस्मै " एकतरेभ्यः सं० हे एकतर! हे एकतरे! हे एकतराणि! अभ्यास (३६) (१) नपुंसकलिङ्ग में अम् को पुनः अम् विधान करने का क्या प्रयोजन है ? (२) मिदचोऽन्त्यात्परः सूत्र न होता तो क्या दोष उत्पन्न होता ? (३) ‘अद्द्’ आदेश को डित् करने का क्या प्रयोजन है ? (४) क्या ‘एकतर’ शब्द डतरप्रत्ययान्त है ? यदि है तो किस सूत्र से अद्द् आदेश विधान (?) किया जाता है ? (५) क्या ‘अन्यतम’ शब्द का उच्चारण ‘कतम’ शब्द की तरह होता है ? यदि नहीं तो क्यों ? क्या वह डतमप्रत्ययान्त नहीं ? (६) ‘ज्ञाने’ आदि में औङस्थानिक ‘शी’ को दीर्घ क्यों किया गया है ? (७) ‘शि’ की सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा क्यों विधान की गई है ? क्या जस्स्था- निक होने से उस की वह सञ्ज्ञा स्वतः प्राप्त नहीं हो सकती थी ? (८) सूत्रनिर्देशपूर्वक सिद्धि करें— १. इतरत् । २. अन्यतमम् । ३. ज्ञानानि । ४. ज्ञाने । ५. एकतरम् । ६. अन्यतमात् । ७. ज्ञान । ८. एकतरस्मै । (६) अतोऽम् सूत्र में अम् का छेद करें या म् का ? सहेतुक स्पष्ट करें। (यहां ह्रस्व अकारान्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।) —: : ० : : — श्रियम्पातीति = श्रीपम् (कुलम्) । जो कुल आदि, लक्ष्मी की रक्षा करे उसे ‘श्रीपा’ कहते हैं। यह शब्द विशेष्यलिङ्ग के आश्रित होने से त्रिलिङ्गी है। पुँल्लिङ्ग