भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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३२८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् शब्द-अर्थ | शब्द-अर्थ | शब्द-अर्थ वृन्द = समूह | सरसिज = कमल | स्तेय = चोरी वेतन = तनख्वाह | सरसीरुह* = कमल | स्तोत्र* = स्तुतिगीत वैचित्र्य* = विचित्रता | साक्ष्य* = गवाही | स्थान = जगह वैचक्र = हिक्मत | सादृश्य = सदृशता | स्थाविर* = बुढापा वैधव्य = विधवापन | साधन = उपकरण | स्थैर्य* = स्थिरता वैर* = दुश्मनी | साध्वस = डर | स्यन्दन = रथ व्यलीक = अपकार | सान्त्वन = दिलासा | हरिताल = हड़ताल व्यसन = विपत्ति | सामर्थ्यं = ताकत | हर्म्य* = महल व्रण = घाव | साहस = जबरदस्ती | हल = हल शस्त्र* = हथियार | साहाय्य = सहायता | हवन = होम शास्त्र* = धर्मग्रन्थ | सिक्तथ = मोम | हाटक = सुवर्ण शूल = दर्द, एक अस्त्र | सिन्दूर* = सिन्दूर | हालाहल = विषविशेष शैथिल्य = शिथिलता | सिंहासन = राजगद्दी | हास्तिक = हस्तिसमूह शैशव = लडकपन | सुकृत = पुण्य | हास्य = हँसी श्रवण = कान, सुनना | सुख = सुख | हित = भलाई सख्य = मित्रता | सुदर्शन = विष्णु का चक्र | हिम = बर्फ सङ्गीत = गायन आदि | सुवर्ण = सोना | हिरण्य = सुवर्ण सत्य = सच | सोपान = सीढ़ी | हृदय = दिल सत्र* = यज्ञ | सौकर्य* = आसानी | हैयङ्गवीन = ताजामाखन१ सदन = घर | सौभाग्य = अच्छा भाग्य | —०— कतर (दो में कौन) शब्द डतरप्रत्ययान्त बताया जा चुका है। विशेष्यलिङ्ग के आश्रित होने से यह त्रिलिङ्गी है। यहां नपुंसक में इस की प्रक्रिया यथा— कतर + सु (सुँ)। यहां अतोऽम् (२३४) से अम् आदेश प्राप्त होता है, इस पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि सूत्रम्— (२४१) अद्ड्२ डतरादिभ्यः पञ्चभ्यः ।७।१।२५॥ एभ्यः पञ्चेभ्यः स्वमोborderद्ड् आदेशः स्यात् ॥ १ इन के अतिरिक्त गमन, नमन, पठन, स्मरण, हरण आदि भाववाचक ल्युडन्त क्रियाशब्द भी अदन्त नपुंसक होते हैं। इस प्रकार के पौने तीन सौ शब्दो की एक विस्तृत सार्थ सूची इस व्याख्या के तृतीयभाग में ल्युट् च (८७१) सूत्र पर दी गई है। विशेष जिज्ञासु उसे वहीं देखें। २ अद्ड् डतरादिभ्यः। यहां ष्टुना ष्टुः (६४) से दकार को डकार हो कर संयोगा- न्तस्य लोपः (२०) से संयोगान्तलोप करने पर 'अड डतरादिभ्यः' हो जाना चाहिये था, परन्तु ऐसा नहीं किया गया। इस का कारण यह है कि वैसा करने म 'अड्' आदेश है या 'अद्ड्' इस का पता नहीं चल सकता था। अतः स्पष्ट- प्रतिपत्ति के लिये मुनि ने सन्धि नहीं की।