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लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

३४४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् 'सुलू' कहते हैं। विशेष्यलिङ्ग के आश्रित होने से यह शब्द त्रिलिङ्गी है। नपुंसक में पूर्ववत् (२४३) सूत्र से ह्रस्व होकर सुधिशब्दवत् प्रक्रिया होती है। प्रवृत्तिनिमित्त के एक होने से तृतीयादि अजादि विभक्तियों में इसे भी वैकल्पिक पुंवद्भाव हो जाता है। पुंवत्पक्ष में ओः सुपि (२१०) से यण् होता है। रूपमाला यथा— प्रथमा सुलूं सुलुनौ सुलूनि द्वितीया ,, ,, ,, तृतीया सुल्वा, सुलुना सुलुभ्याम् सुलुभिः चतुर्थी सुल्वे, सुलुने ,, सुलुभ्यः पञ्चमी सुल्वः, सुलुनः ,, ,, षष्ठी ,, ,, सुल्वोः, सुलुनोः सुल्वाम्, सुलनाम् सप्तमी सुल्वि, सुलनि ,, ,, सुलुषु सम्बोधन हे सुलो!, हे सुल! हे सुलनी! हे सुलूनि! इसी प्रकार निम्नस्थ शब्द भी भाषितपुंस्क हैं। पुंवत्पक्ष में इनका उच्चारण भानुवत् तथा पुंवद्भाव के अभाव में मधुवत् होता है--[* यह णत्वविधि का चिह्न है] (१) ऋजु = सरल, सीधा (१७) लघु = छोटा, हल्का (२) कटु = तीखा (मरिचवत्) (१८) वन्दारु* = वन्दनशील (३) कमण्डलु¹ = साधुओं का पात्र (१९) वर्तिष्णु = वर्तनशील, होने वाला (४) खम्बु² = शस्त्र (२०) वर्धिष्णु = वृद्धिशील (५) गुरु* = बड़ा, (२१) विजिगीषु* = जीतने का इच्छुक (६) चिकीर्षु* = करने का इच्छुक (२२) विभु = व्यापक (७) जानु = घुटना, जानुशब्दोऽयं क्वचिदि (२३) व्यसु = मरा हुआ, मृत (८) जिज्ञासु = जानने की इच्छा वाला (२४) शीधु = गन्ने से निर्मित मद्य (९) जीवातु³ = जीवन औषध (२५) श्रद्धालु = श्रद्धा रखने वाला (१०) तनु = सूक्ष्म, पतला (२६) सञ्जु = मिले हुए घुटनों वाला (११) दयालु = दया करने वाला (२७) सहिष्णु = सहन करने वाला (१२) दिदृक्षु* = देखने का इच्छुक (२८) संशयालु = संशयशील (१३) पटु = चतुर (२९) साधु = सरल, सीधा (१४) पिपासु = पीने का इच्छुक (३०) सानु⁴ = पहाड की चोटी (१५) प्रज्ञु = टेढ़े घुटनों वाला (३१) स्पृहयालु = इच्छा करने वाला (१६) मृदु = कोमल (३२) स्वादु = स्वादिष्ट १ अस्त्री कमण्डलु कुण्डी—इत्यमरप्रामाण्याद्भाषितपुंस्कोऽयम् । २ शङ्खः स्यात्कम्बुरस्त्रियाम् इत्यमरप्रामाण्याद्भाषितपुंस्कोऽयम् । ३ पुन्नपुंसकयोर्दातु-जीव तु-स्याणु-शौघव..—इति त्रिकाण्डशेष । ४ क्ष्माप्रस्थः सानुरस्त्रियाम्—इत्यमर. ।

अजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३४५ इसी प्रकार—सुशिशु, सुतंरु, सुवायु, सुगुरु, सुक्रतु, सुपरशु, सुबाहु, सुवातु, सुबन्धु, सुकेतु, सुजन्तु, सुतन्तु, सुपांशु, सुपटु—प्रभृति शब्द होते हैं । नोट—भाषितपुंस्क शब्द प्रायः विशेषणवाची ही होते हैं; विशुद्ध भाषितपुंस्क शब्द बहुत ही थोड़े हैं। यथा—कमण्डलु, कम्बु, शीधु, जीवातु आदि। विशेष्य के नपुंसक होने पर ही ये विशेषणवाची नपुंसक होते हैं। (यहां उकारान्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) -----::०::----- अब ऋकारान्त नपुंसक शब्दों का वर्णन करते हैं— [लघु०] धातृ। धातृणी। धातॄणि। हे धातः!, हे धातृ ! । धात्रा। धातृणा। धातॄणाम्। एवं ज्ञात्रादयः ॥ व्याख्या—दधातीति धातृ (कुलम्)। जो धारण करे उसे 'धातृ' कहते हैं। यह शब्द भी विशेष्यलिङ्ग के आश्रित होने से त्रिलिङ्गी है। विशेष्य के नपुंसक होने पर इस के नपुंसक में रूप बनते हैं। इसकी रूपमाला यथा— प्रथमा धातृ धातृणी धातॄणि द्वितीया ,, ,, ,, तृतीया धात्रा, धातृणा* धातृभ्याम् धातृभिः चतुर्थी धात्रे, धातृणे* ,, धातृभ्यः पञ्चमी धातुः, धातृणः* ,, ,, षष्ठी ,, ,, * धात्रोः, धातृणोः* धातॄणाम्* सप्तमी धातरि, धातृणि* ,, धातृषु सम्बोधन हे धातृ!, हे धातः! हे धातृणी! हे धातॄणि! : * इन तृतीयादि अजादि विभक्तियों में तृतीयादिषु भाषित० (२४६) सूत्र से वैकल्पिक पुंवद्भाव हो जाता है। पुंवत्पक्ष में अजन्तपुंल्लिङ्गान्तर्गत 'धातृ' शब्द के समान प्रक्रिया होती है। पुंवद्भाव के अभाव में 'वारि' शब्दवत् कार्य होते हैं। किन्तु टा में ना आदेश न हो कर नुँम् ही होता है। ध्यान रहे कि 'धातृ' शब्द की घिसञ्ज्ञा नहीं है अतः ङे, ङसिँ, ङस्, ङि विभक्तियों में घेर्डिति (१७२) और अच्च घेः (१७४) के साथ नुँम् को झगड़ना नहीं पड़ता। आम् में यद्यपि दोनों पक्षों में एक जैसे रूप बनते हैं तथापि पुंवद्भाव के अभाव में प्रक्रिया में कुछ अन्तर होता है। अर्थात् नुट् का आगम पूर्वविप्रतिषेध से नुँम् का बाध कर लेता है। 'हे धातृ, हे धातः' में न लुमताङ्गस्य (१६१) की अनित्यता के कारण दो रूप बनते हैं। अनित्यतापक्ष में नपुंसक में सर्वनामस्थानता न होने से ऋतो ङि० (२०४) से गुण न हो कर ह्रस्वस्य गुणः (१६६) से गुण हो जाता है। इसी प्रकार ज्ञातृ आदि शब्दों के नपुंसकलिङ्ग में रूप होते हैं—

३४६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् १ ज्ञातृ = जानने वाला (कुल आदि) | ६ छेत्तृ = काटने वाला (कुल आदि) २ कर्तृ = करने वाला ( ,, ,, ) | ७ दातृ = देने वाला ( ,, ,, ) ३ कथयितृ = कहने वाला ( ,, ,, ) | ८ वक्तृ = बोलने वाला ( ,, ,, ) ४ गणयितृ = गिनने वाला ( ,, ,, ) | ९ श्रोतृ = सुनने वाला ( ,, ,, ) ५ जेतृ = जीतने वाला ( ,, ,, ) | १० हर्तृ = हरने वाला ( ,, ,, ) ध्यातृ, गन्तृ, रचयितृ, प्रभृति शब्दों की स्वयं कल्पना कर लेनी चाहिये। नोट—ऋदन्त विशुद्ध नपुंसक शब्दों का संस्कृत-साहित्य में प्रायः अभाव ही है। सब के सब ऋदन्त शब्द नपुंसक में प्रायः भाषितपुंस्क ही मिलते हैं। (यहाँ ऋदन्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) ० अब ओकारान्त 'प्रद्यो' शब्द का वर्णन करते हैं— प्रकृष्टा द्यौर्यस्य यस्मिन् वा तत् = प्रद्यु (दिनम्)। प्रकृष्ट अर्थात् सुन्दर वा निर्मल आकाश वाले दिन को 'प्रद्यो' कहते हैं। प्रद्यो शब्द में 'ह्रस्वो नपुंसके प्रातिपदि- कस्य' (२४३) से ह्रस्व करना है, परन्तु ओकार के स्थान पर स्थानकृत आन्तर्य से अकार और उकार दोनों प्राप्त होते हैं। इन में से कौन सा ह्रस्व किया जाये? इस का निर्णय अग्रिमसूत्र करता है— [लघु०] नियम-सूत्रम्— (२५०) एच इग्घ्रस्वादेशे । १।१।४७॥ आदिश्यमानेषु ह्रस्वेषु (मध्ये¹) एच इगेव स्यात् । प्रद्यु । प्रद्युनी । प्रद्यूनि । प्रद्युना—इत्यादि ॥ अर्थ—जब ह्रस्व आदेश का विधान हो तब एचों के स्थान पर इक् ही ह्रस्व हो। व्याख्या—एचः ६।१। इक् १।१। ह्रस्वादेशे ७।१। समास—ह्रस्वस्य आदेशः = ह्रस्वादेशः, तस्मिन् = ह्रस्वादेशे, षष्ठीतत्पुरुष। अर्थ—(एचः) एच् के स्थान पर (ह्रस्वादेशे) ह्रस्व आदेश विधान करने पर (इक्) इक् ह्रस्व होता है। यद्यपि एच् और इक् दोनों चार-चार हैं, तथापि यहाँ यथासङ्ख्यविधि नहीं होती। यथासङ्ख्य- विधि अपूर्वविधि में ही प्रवृत्त हुआ करती है, नियमविधि में नहीं। अतः स्थानेऽन्तर- तम (१७) से यहाँ एकार और ऐकार के स्थान पर इकार ह्रस्व तथा ओकार और औकार के स्थान पर उकार ह्रस्व हो जायेगा। ध्यान रहे कि एचों के अपने ह्रस्व नहीं होते, 'एचामपि द्वादश, तेषां ह्रस्वाभा- वात्' यह पीछे सञ्ज्ञाप्रकरण में कहा जा चुका है। एच् संयुक्तस्वर हैं अर्थात् दो दो स्वर मिलकर बने हैं। अकार और इकार के संयोग से एकार ऐकार तथा अकार और उकार के संयोग से ओकार औकार की उत्पत्ति हुई है। इस अवस्था में एचों को १. मध्य इत्यपपाठः, तद्योगे षष्ठ्या एवौचित्याद्—इति शेखरे नागेशः।

अजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३४७ अकार और इकार तथा उकार प्राप्त होते हैं। अब इस सूत्र के नियम से इकार और उकार ही ह्रस्व होंगे अवर्ण नहीं। 'प्रद्यो' यहां ओकार को उकार ह्रस्व होकर 'प्रद्यु' हुआ। अब इस की समग्र प्रक्रिया तथा रूपमाला मधुशब्दवत् होती है— प्र० प्रद्यु प्रद्युनी प्रद्यूनि । प० प्रद्युनः प्रद्युभ्याम् प्रद्युभ्यः द्वि० ,, ,, ,, । ष० ,, प्रद्युनोः प्रद्यूनाम् तृ० प्रद्युना प्रद्युभ्याम् प्रद्युभिः । स० प्रद्युनि ,, प्रद्युषु च० प्रद्युने ,, प्रद्युभ्यः । सं० हे प्रद्यो!,प्रद्यु! हे प्रद्युनी! हे प्रद्यूनि! यहां पर धातुवृत्तिकार श्रीमाधव लिखते हैं कि तृतीयादि विभक्तियों में पुंव- द्भाव नहीं होता। क्योंकि नपुंसक में—प्रद्यु और पुंलिङ्ग में—प्रद्यो शब्द होने से दोनों इगन्त नहीं रहते। इगन्त शब्दों की ही तृतीयादिषु भाषित० (२४६) सूत्र में भाषित पुंस्कता कही गई है। परन्तु अन्य कई लोग इसे स्वीकार नहीं करते, वे कहते हैं कि पुंलिङ्गगत 'प्रद्यो' शब्द ही नपुंसक में 'प्रद्यु' शब्द बना है अतः एकदेशविकृतन्याय से दोनों एक ही हैं। नपुंसकगत इगन्त प्रद्यु शब्द पुंलिङ्ग में भी वर्त्तमान होने से पुंवद्भाव को प्राप्त हो जायेगा। ऐसा मानने वालों के मत में—प्रद्यवा, प्रद्युना (टा); प्रद्यवे, प्रद्युने(ङे); प्रद्योः, प्रद्युनः(ङसिं वा ङस्); प्रद्यवोः, प्रद्युनोः(ओस्); प्रद्यवाम्, प्रद्यूनाम् (आम्); प्रद्यवि, प्रद्युनि(ङि)—इस प्रकार दो २ रूप बनेंगे। (यहां ओकारान्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) ---------:०:--------- अब ऐकारान्त 'प्ररै' शब्द का वर्णन करते हैं— [लघु०] प्ररि। प्ररिणी। प्ररीणि॑। एकदेशविकृतमनन्यवत्—प्रराभ्याम्। प्ररीणाम्॥ व्याख्या—प्रकृष्टो राः = धनं यस्य तत् = प्ररि(कुलम्)। जिसका विपुल धन हो उसे 'प्ररै' कहते हैं। नपुंसक में एच इग्घ्रस्वादेशे (२५०) की सहायता से ह्रस्वो नपुंसके० (२४३) द्वारा ह्रस्व—इकार हो कर 'प्ररि' शब्द बन जाता है। अब इस का उच्चारण प्रायः 'वारि'शब्दवत् होता है। रूपमाला यथा— प्र० प्ररि प्ररिणी प्ररीणि । प० प्ररिणः प्रराभ्याम् प्रराभ्यः द्वि० ,, ,, ,, । ष० ,, प्ररिणोः प्ररीणाम् तृ० प्ररिणा प्रराभ्याम् प्रराभिः । स० प्ररिणि ,, प्ररासु च० प्ररिणे ,, प्रराभ्यः । सं० हे प्ररि!,प्ररे! हे प्ररिणी! हे प्ररीणि! (१) नोट—भ्याम्, भिस्, भ्यस् और सुप् में एकदेशविकृतमनन्यवत् की सहा- यता से पुनः वही रै शब्द माना जाने से रायो हलि (२१५) द्वारा ऐकार को आकार होकर 'प्रराभ्याम्' आदि रूप सिद्ध होते हैं। (२) नोट—यहां भी पूर्वोक्त 'प्रद्यो' शब्द की तरह श्रीमाधव के मत में

३४८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां पुंवद्भाव नही होता अन्यों के मत मे हो जाता है। पुंवद्भाव मे--प्रराया, प्ररिणा इत्यादिप्रकारेण दो २ रूप बनते हैं। (३) नोट - 'प्ररि+आम्' यहा नुमचिर०(वा० १६) से नुँम् का बाध कर नुट् हो जाता है। पुन नामि (१४६) मे दीर्घ तथा अट्कुप्वाङ्नुम्० (१३८) से णत्व हो कर 'प्ररीणाम्' बनता है। ध्यान रहे कि 'प्ररि+नाम्' यहा नुट् हो चुकने पर रायो हलि (२१५) से आत्व नही होगा, क्योकि तब सन्निपात-परिभाषा विरोध करेगी। नामि (१४६) यह दीर्घ तो आरम्भसामर्थ्य से ही सन्निपात-परिभाषा की सर्वथा अवहेलना किया करता है। (यहा ऐकारान्त नपुंसक शब्दो का विवेचन समाप्त होता है।) -------------------.० ------------------- अब औकारान्त 'सुनौ' शब्द का वर्णन करते है— [लघु०] सुनु। सुनुनी। सुनूनि। सुनुना—इत्यादि ॥ व्याख्या--सु= शोभना नौर्यस्य तत् =सुनु(कुलम्)। जिस की सुन्दर नौका हो उसे 'सुनौ' कहते हैं। नपुंसक मे एच इग्घ्रस्वादेशे(२५०) के अनुसार ह्रस्वो नपुंसके० (२४३) से औकार को उकार ह्रस्व हो कर 'सुनु' शब्द बन जाता है। इसका उच्चा- रण 'मधु' शब्दवत् होता है। रूपमाला यथा— प्र० सुनु सुनुनी सुनूनि | प० सुनुन सुनुभ्याम् सुनुभ्य. द्वि० ,, ,, ,, | ष० ,, सुनुनो सुनूनाम् तृ० सुनुना सुनुभ्याम् सुनुभि | स० सुनुनि ,, सुनुषु च० सुनुने ,, सुनुभ्यः | स० हेसुनो!,सुनु! हेसुनुनी! हेसुनूनि! यहा भी पूर्ववत् श्रीमाधवे के मतानुसारोध से पुवद्भाव नही किया गया। वस्तुत. यहा भी पुंवद्भाव हो जाता है। पुवत्वक्ष मे ह्रस्व का पुन औकार बन जाता है। तब एचोऽयवायाव.(२२) द्वारा आव् आदेश करने से--सुनावा, सुनावे, सुनाव २, सुनावो. २, सुनावाम्, सुनावि—ये रूप भी पक्ष मे बन जाते हैं। (यहां औकारान्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) -----------; ० . ----------- [लघु०] इत्यजन्ता नपुसकलिङ्गा. [शब्दा ] ॥ अर्थ.—यहा अजन्तनपुसकलिङ्ग शब्द समाप्त होते हैं। अभ्यास (३७) (१) न लुमताङ्गस्य सूत्र की अनित्यता कैसे और क्यो सिद्ध की जाती है ? (२) 'वारीणाम्' मे नुट् हो वा नुँम् ? दोनो मे अन्तर स्पष्ट करें। (३) 'प्रवृत्तिनिमित्त' किसे कहते हैं ? पीलु शब्द पर उसे घटाए । (४) 'प्रद्यो' शब्द नपुसक मे मापितपुस्क मानना चाहिये या नही ? सहेतुक दोनो पक्षो का प्रतिपादन कर अपनी सम्मति लिखें।

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३४६ (५) एच इग्घ्रस्वादेशे सूत्र की व्याख्या करते हुए इस की आवश्यकता पर एक विस्तृत नोट लिखें । (६) निम्नलिखित सूत्र-वार्त्तिकों की विस्तृत व्याख्या करें— १. तृतीयादिषु० । २. अल्लोपोऽनः । ३. अस्थिदधि० । ४. विभाषा ङिश्श्योः । ५. स्वमोर्नपुंसकात् । ६. वृद्धैचौत्व-तृज्वद्भाव-गुणेभ्यो० । (७) सूत्रनिर्देशपूर्वक सिद्धि करें— १. अक्ष्णा । २. प्रराभ्याम् । ३. वारिणे । ४. हे धातः ! । ५. सुल्वा । ६. त्रीणि । ७. दधनि । ८. द्वे । ६. धातॄणि । १०. मधूनाम् । (८) सख्यि, सुनी, पीलु, प्रद्यो, वारि, सुधी—शब्दों का उच्चारण लिखें । ---::०::--- इति भैमीव्याख्योपेतायां लघु-सिद्धान्त- कौमुद्यामजन्त-नपुंसक-लिङ्ग- प्रकरणं समाप्तम् ॥ अथ हलन्त-पुँल्लिङ्ग-प्रकरणम् अब क्रमप्राप्त हलन्तपुंलिङ्ग शब्दों का विवेचन करते हैं। हयवरट् (प्रत्या- हार-सूत्र ५) के क्रमानुसार सर्वप्रथम हकारान्त शब्दों का नम्बर आता है । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२५१) हो ढः ।८।२।३१॥ हस्य ढः स्याज्झलि पदान्ते च । लिट्, लिड् । लिहौ । लिहः । लिड्भ्याम् । लिट्त्सु, लिड्सु ॥ अर्थः—झल् परे होने पर या पदान्त में हकार के स्थान पर ढकार हो । व्याख्या—झलि ।७।१। (झलो झलि से)। पदस्य ।६।१। (यह अधिकृत है) । अन्ते ।७।१। (स्कोः संयोगाद्योरन्ते च से) । हः ।६।१। ढः ।१।१। अर्थः—(झलि) झल् परे होने पर या (पदस्य) पद के (अन्ते) अन्त में (हः) ह के स्थान पर (ढः) ढ् हो जाता है । सूत्र में ढकारोत्तर अकार उच्चारणार्थ है । लेढीति लिट् । चाटने वाले को 'लिह्' कहते हैं। लिहँ आस्वादने (अदा० उभ०) धातु से कर्त्ता में क्विँप् च (८०२) सूत्र द्वारा क्विँप् प्रत्यय हो उस का सर्वापहार लोप¹ करने से 'लिह्' शब्द सिद्ध होता है। लिहू के कृदन्त होने से कृत्तद्धित० (११७) सूत्र से प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो कर सुँ आदि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं। १. जो लोप सम्पूर्ण प्रत्यय का अदर्शन करता है उसे 'सर्वापहार' या 'सर्वापहारी' लोप कहते हैं। क्विन्, क्विँप्, विँट्, विँच् आदि प्रत्ययों का सर्वापहार लोप होता है ।

३५० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां लिहू+स्(सुं)। यहां हल्ङ्याब्भ्यो ० (१७६) से अपृक्त सकार का लोप हो जाता है। तब प्रत्ययलोपे० (१६०) सूत्र की सहायता से सुप्तिङन्तं पदम् (१४) द्वारा 'लिहू' की पदसञ्ज्ञा हो पद के अन्त में हकार को हो ढ (२५१) से ढकार हो जाता है। पुनः झलां जशोऽन्ते (६७) से ढकार को डकार तथा वाऽवसाने (१४६) से वैकल्पिक टकार करने से—'लिट्, लिड्' ये दो रूप बनते हैं। लिहू + औ = लिहौ । लिहू + अस् (जस्) = लिह । लिहू + अम् = लिहम् । लिहू + औ (औट्) = लिहौ। लिहू + अस् (शस्) = लिह । लिहू + आ (टा) = लिहा। 'लिहू + भ्याम्' यहां स्वादिष्वसर्वनामस्थाने (१६४) सूत्र से 'लिहू' की पद- सञ्ज्ञा है, हकार पदान्त में स्थित है। अतः हो ढ (२५१) से हकार को ढकार तथा झलां जशोऽन्ते (६७) से ढकार को डकार हो कर 'लिड्भ्याम्' सिद्ध होता है। भिस् और भ्यस् में भी इसी प्रकार 'लिड्भिः' और 'लिड्भ्यः' रूप बनते हैं। लिहू + ए (ङे) = लिहे । लिहू + अस् (ङसिं वा ङस्) = लिह । लिहू + ओस् – लिहो । लिहू + आम् = लिहाम् । लिहू + इ (ङि) = लिहि । सप्तमी के बहुवचन में 'लिहू+सु' (सुप्) इस स्थिति में हो ढ (२५१) सूत्र से पदान्त हकार को ढकार तथा झलां जशोऽन्ते (६७) से उसे जश्त्व–डकार हो कर 'लिड् + सु' बना। अब खरि च (८ ४ ५४) के असिद्ध होने से ङः सि धुट् (८ ३ २६) द्वारा वैकल्पिक धुट् करने में अनुबन्धों के चले जाने पर—'१ लिड् ध् सु २ लिड् सु' हुआ। अब यहां ष्टुना ष्टुः (६४) सूत्र द्वारा प्रथम रूप में धकार को ढकार और दूसरे रूप में सकार को षकार प्राप्त होता है। इस का न पदान्ताट्टोरनाम् (६५) से निषेध हो जाता है। पुनः खरि च (७४) सूत्र द्वारा प्रथम रूप में धकार को तकार और उस तकार को खर् मान कर डकार को टकार करने से—'लिट्त्सु' । दूसरे रूप से डकार को टकार करने पर—'लिट्सु' । इस प्रकार दो रूप सिद्ध होते हैं। ध्यातव्य—'लिट्त्सु, लिट्सु' इन दोनों रूपों में खरि च (७४) द्वारा किया गया चर्त्व असिद्ध है, अतः चयो द्वितीया० (वा० १४) से प्रथम रूप में तकार को थकार तथा दूसरे रूप में टकार को ठकार नहीं होता। भष् परे होने पर हो ढ (२५१) सूत्र के उदाहरण 'वोढा' आदि हैं, जो आगे मूल में ही स्पष्ट हो जाएंगे। 'लिहू' (चाटने वाला) शब्द की रूपमाला यथा— प्र० लिट्-ड् लिहौ लिह | प० लिह लिड्भ्याम् लिड्भ्य द्वि० लिहम् " " | ष० " लिहोः लिहाम् तृ० लिहा लिड्भ्याम् लिड्भि | स० लिहि " लिट्त्सु, त्सु च० लिहे " लिड्भ्य | सं० हे लिट्, ड्! हे लिहौ! हे लिह ! इसी प्रकार—मधुलिह् (भ्रमर), पुष्पलिह (भ्रमर), कुसुमलिह (भ्रमर), गुडलिह (गुड़ चाटने वाला), शिरोरुह् (केश), भूरुह् (वृक्ष), सरोरुह् (कमल), सर-

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३५१ गीर्हूहू (कमल), पर्णहूहू (वसन्त ऋतु)—प्रभृति शब्दों के रूप होते हैं। नोट—हलन्त शब्दों की अजादि विभक्तियों में प्राय: कोई कार्य विशेष नहीं करना पड़ता। व्यञ्जनों को स्वरों के साथ मिलाना मात्र ही कार्य होता है। हलादि विभक्तियों में कुछ कार्य होता है। अर्थात् सुं, भ्याम्, भिस्, भ्यस् और सुँप्, इन पाँच स्थलों में ही रूप बनाने पड़ते हैं। हम आगे प्राय: इन में ही सिद्धि करेंगे। दुह् = दोहने वाला (दोग्धीति धुक्)। दुहँ प्रपूरणे (अदा० उ०) धातु से कर्त्ता में क्विप् च (८०२) से क्विप् प्रत्यय करने पर उस का सर्वापहार लोप हो 'दुह्' शब्द निष्पन्न होता है। अब इस से स्वादियों की उत्पत्ति होती है- 'दुह् + स्' (सुँ) यहां हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६) से सकार का लोप हो 'दुह्' इस अवस्था में हो ढः (२५१) सूत्र प्राप्त होता है। इस पर अग्रिम अपवादसूत्र प्रवृत्त होता है - [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३५२) दादेर्धातोर्घः ।८।२।३२॥ झलि पदान्ते चोपदेशे दादेर्धातोर्हस्य घः स्यात् ॥ अर्थः-उपदेश में जो दकारादि धातु, उस के हकार को घकार हो जाता है झल् परे होने पर या पदान्त में । व्याख्या-दादेः ।६।१। धातोः ।६।१। हः ।६।१। (हो ढः से) । घः ।१।१। झलि ।७।१। (झलो झलि से) । पदस्य ।६।१। (यह अधिकृत है) । अन्ते ।७।१। (स्कोः० से) । यहां भाष्यकार के व्याख्यान से उपदेश में ही 'दादि' ग्रहण किया जाता है। समासः-दः=दकारः, आदी आदिर्वा यस्य स दादिस्तस्य दादेः, बहुव्रीहिसमासः । अर्थः-(झलि) झल् परे होने पर या (पदस्य) पद के (अन्ते) अन्त में (दादेः) उपदेश में दकार आदि वाली (धातोः) धातु के (हः) हकार के स्थान पर (घः) घ् आदेश हो जाता है। घकार में अकार उच्चारणार्थ है। यह सूत्र यद्यपि हो ढः (८.२.३१) सूत्र की दृष्टि में असिद्ध है; तथापि वचनसामर्थ्य से यह उस का अपवाद है—अपवादो वचनप्रामाण्यात् । 'उपदेश' ग्रहण का यह प्रयोजन है कि 'अधोक्' यहां दुह के अजादि होने पर भी घत्व हो जाये और 'दामलिद्' यहां दादि धातु होने पर भी घत्व न हो। १ १. 'अधोक्' यह 'दुह' धातु के लङ् लकार के प्रथम वा मध्यमपुरुष का एकवचन है। दादेर्धातोर्घः में 'उपदेश' ग्रहण न करने से 'अदोह्' इस स्थिति में हकार को घकार नहीं हो सकता; क्योंकि 'दुह्' धातु को अट् का आगम होने से यदागमास्तद्- गुणीभूतास्तद्ग्रहणेन गृह्यन्ते परिभाषा के अनुसार वह अजादि हो गई है, दादि नहीं रही; पुनः यदि यहां 'उपदेश' ग्रहण करते हैं तो हकार को घकार हो जाता है; क्योंकि उपदेश = आद्योच्चारण में तो यह दादि ही थी, अजादि तो बाद = दूसरे उच्चारण में बनी है। घकार करने पर एकाचः० (२५३) सूत्र से दकार को धकार हो जश्त्व चर्ख करने से- 'अधोक्-ग्' ये दो रूप सिद्ध हो जाते-हैं। इसी

३५२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां 'दुह्' यह उपदेश में दादि धातु१ है। अत इस सूत्र से पदान्त में हकार को घकार हो कर—'धुघ्' हुआ। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२५३) एकाचो बशो भष् भषन्तस्य स्ध्वोः।८।२।३७॥ धात्ववयवस्यैकाचो भषन्तस्य बशो भष् स्यात्, से ध्वे पदान्ते च। धुक्, धुग्। दुहौ। दुहः। धुग्भ्याम्। धुक्षु॥ अर्थ.—धातु का अवयव जो भषन्त एकाच्, उस के बश् को भष् हो, सकार अथवा ध्व परे होने पर या पदान्त में। व्याख्या—घातोः।६।१। (वादेर्घार्तोर्घं से)। एकाचः।६।१। बशः।६।१। भष् ।१।१। भषन्तस्य।६।१। स्ध्वोः।७।२। पदस्य।६।१। (अधिकृत है)। अन्ते।७।१। (स्कोः संयोगाद्योरन्ते च से)। अन्वय—धातोर् (अवयवस्य) एकाचो भषन्तस्य बशो भष् (स्यात्) स्ध्वोः पदस्य अन्ते (च)। अर्थ—(घातोः) धातु के अवयव (एकाचः) एक अच् वाले (भषन्तस्य) भषन्त भाग के (बशः) बश् अर्थात् ब्, ग्, ड्, द् वर्णों के स्थान पर (भष्) भष् अर्थात् भ्, घ्, ढ्, ध् वर्ण हो जाते हैं (स्ध्वोः) सकार अथवा ध्व शब्द परे हो या (पदस्य) पद के (अन्ते) अन्त में। इस सूत्र के अर्थ में हम ने अनुवृत्तिलब्ध 'घातोः' पद का 'एकाचः भषन्तस्य' के साथ सामानाधिकरण्य नहीं किया। अर्थात् 'एक अच् वाली भषन्त धातु के बश् को भष् हो' इस प्रकार का अर्थ नहीं किया। ऐसा अर्थ करने से यह दोष प्राप्त होता था कि जहाँ एक अच् वाली धातु न होती वहाँ भष् प्राप्त न होता२। यथा—'गर्दभ' शब्द से तत्करोति तदाचष्टे (चुरा० ग० सू०) द्वारा णिच् प्रत्यय करने पर सनाद्यन्ता धातवः (४६८) से धातुसञ्ज्ञा हो कर कर्त्ता में क्विँप् प्रत्यय करने से 'गर्दभ्' शब्द निष्पन्न होता है। यहां एक अच् वाली धातु न होने से भष्भाव प्राप्त नहीं होता। परन्तु हम भष्भाव कर 'गधैप्' रूप बनाना अभीष्ट है। अत यहां 'घातोः' पद का 'एकाचः भषन्तस्य' इस के साथ अवयव-अवयवी सम्बन्ध करना ही युक्त है। अर्थात् 'धातु का अवयव जो एकाच् भषन्त, उस के बश् को भष् हो' ऐसा अर्थ करना प्रत्यु०—'दामलिह्' शब्द में उपदेश में धातु के दादि न होकर लकारादि होने से घत्व नहीं होता। हो ढः (२५१) से ढत्व हो जश्त्व चत्त्वं करने पर—'दामलिट्- ड्' सिद्ध होते हैं। दाम लेढीति दामलिट्, दामलिहमात्मन इच्छतीति-दामलिट्। इस की विशेष प्रक्रिया सिद्धान्तकौमुदी में देखें। १ क्विबन्ता णिङन्ता णिजन्ता शब्दा धातुत्वं न जहाति (क्विबन्त, णिङन्त और णिजन्त शब्दों की धातुसञ्ज्ञा बनी रहती है) इस परिभाषानुसार यहां 'दुह्' की धातुसञ्ज्ञा पूर्ववद् अक्षुण्ण है। २ यदि एकाच् अनेकाच् सब धातुओं में भष्भाव करना है तो—'एकाचः' की क्या आवश्यकता है ? यहां यह शङ्का नहीं करनी चाहिये, क्योंकि 'एकाचः' ग्रहण न करने से ढत्व कर चुकने पर 'दामलिड्' में भी अनिष्ट भष्भाव प्राप्त होगा।

चाहिये। ऐसा करने से—'गर्दभ्' इस धातु का अवयव एकाच् झषन्त 'दभ्' हो जाता है। इस से उस के दकार को धकार सिद्ध हो जाता है। इस सूत्र का स्थूल तात्पर्य यह है कि स् या ध्व परे होने पर या पदान्त में यदि किसी धातु के एकाच् अंश के अन्त में झष् अर्थात् वर्गचतुर्थ वर्ण होगा तो धातु के उसी अंश के अन्तर्गत ब्, ग्, ड्, द् को क्रमशः भ्, घ्, ढ्, ध् वर्ण हो जायेंगे। यथा —बुध् का भुध्, गुह् का घुह्, दुह् का धुह्, गर्दभ् का गधर्भ् हो जायेगा। सकार या ध्व परे होने पर उदाहरण आगे तिङन्तप्रकरण में—भोत्स्यते, घोक्ष्यते, अभुद्ध्वम्, अगुध्वम् आदि आयेंगे। यहां प्रकृत में पदान्त के उदाहरण प्रस्तुत हैं। 'दुह्' यह व्यपदेशिवद्भाव¹ से धातु का अवयव है और एकाच् झषन्त भी है, अतः यहां पदान्त में इस के बश्—दकार को स्थानकृत आन्तर्य से धकार हो कर 'धुह्' हुआ। अब जश्त्व (६७) और वैकल्पिक चर्त्व (१४६) करने से—'धुक्, धुग्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। भ्याम् में—'दुह् + भ्याम्' इस स्थिति में पदान्त में हकार को घकार एकाचः० (२५३) से दकार को धकार तथा जश्त्व—गकार हो कर 'धुग्भ्याम्' रूप सिद्ध होता है। इसी प्रकार भिस् में 'धुग्भिः' और भ्यस् में 'धुग्भ्यः' सिद्ध होते हैं। दुह् + सु (सुप्)। यहां भी पदान्त में घकारादेश, भष्त्व से दकार को धकार तथा झलां जशोऽन्ते (६७) से जश्त्व—गकार और खरि च (७४) से चर्त्व-ककार कर षत्व करने से 'धुक्षु' सिद्ध होता है। रूपमाला यथा— प्र० धुक्,ग् दुहौ दुहः | प० दुहः धुग्भ्याम् धुग्भ्यः द्वि० दुहम् ,, ,, | प० ,, दुहोः दुहाम् तृ० दुहा धुग्भ्याम् धुग्भिः | स० दुहि ,, धुक्षु च० दुहे ,, धुग्भ्यः | सं० हे धुक्,ग्! हे दुहौ! हे दुहः! इसी प्रकार—गोदुह (गौ दोहने वाला =ग्वाला), अजादुह् (बकरी दोहने वाला), दह (जलाने वाली =अग्नि), आश्रयदह (अग्नि), काष्ठदह् (अग्नि) प्रभृति शब्दों के रूप होते हैं। [लघु०] विधि-सूत्रम् (२५४) वा द्रुह-मुह-ष्णुह-ष्णिहाम् ।८।२।३३॥ एषां हस्य वा घो झलि पदान्ते च। ध्रुक्, ध्रुग्, ध्रुट्, ध्रुड्। द्रुहौ। द्रुहः। ध्रुग्भ्याम्, ध्रुड्भ्याम्। ध्रुक्षु, ध्रुट्सु, ध्रुट्सु। एवम्—मुक्, मुग्, मुट्, मुड् इत्यादि ॥ अर्थः—द्रुह्, मुह्, ष्णुह्, ष्णिह्—इन धातुओं के हकार को झल् परे होने पर या पदान्त में विकल्प कर के घकार हो जाता है। व्याख्या—वा इत्यव्ययपदम्। द्रुह-मुह-ष्णुह-ष्णिहाम् ।६।३। हः ।६।१। (हो ढः से)। घः ।१।१। (दादेर्धातोर्घः से)। झलि ।७।१। (झलो झलि से)। पदस्य १. इस का विवेचन आद्यन्तवदेकस्मिन् (२७८) सूत्र पर देखें। ल० प्र० (२३)

३५४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां

। ६।१। (यह अधिकृत है)। अन्ते । ७।१। (स्को ० से)। समास —द्रुहश्च मुहश्च ष्णुह- श्च ष्णिह् च = द्रुह् मुहू ष्णुह्-ष्णिह , तेषाम् =द्रुह मुह ष्णुह ष्णिहाम् । इतरेतरद्वन्द्व । द्रुहादिषु त्रिषु अकार उच्चारणार्थ । अर्थ —(द्रुह मुह ष्णुह् ष्णिहाम्) द्रुह्, मुह, ष्णुह् और ष्णिहू धातुओं के (ह ) हकार के स्थान पर (वा) विकल्प कर के (घ ) घकार आदेश होता है (झलि) झल् परे होने पर या (पदस्य) पद के (अन्ते) अन्त मे । 'द्रुहू' मे दादेर्धातोर्घ (२५२) द्वारा घत्व के नित्य प्राप्त होने पर तथा अन्यो मे दादि न होने मे घत्व के अप्राप्त होने पर इस सूत्र से वैकल्पिक घत्व किया जाता है, अतः यह प्राप्ताऽप्राप्तविभाषा है । द्रुह्= द्रोह करने वाला (द्रुह्यतीति ध्रुक्) । द्रुह जिघांसायाम् (दिवा० प०) धातु मे कर्ता मे क्विप् प्रत्यय कर उस का सर्वापहार लोप करने मे 'द्रुह्' शब्द निष्पन्न होता है । द्रुह् +म् (सुं) । यहा हल्ङ्याब्भ्य ० (१७६) सूत्र से सकारलोप हो कर पदान्त मे हकार को वा द्रुह०(२५४) सूत्र द्वारा वैकल्पिक घकार तथा घत्वाभावपक्ष में हो ढ (२५१) सूत्र से ढकार कर दोनो पक्षो मे एकाच ० (२५३) सूत्र से दकार को धकार हो गया तो—ध्रुघ्, ध्रुढ् । अब झलां जशोऽन्ते (६७) मे जश्त्व तथा वाऽवसाने (१४६) सूत्र से वैकल्पिक चत्त्व करने मे—'१ ध्रुक्, २ ध्रुग्, ३ ध्रुद्, ४ ध्रुड्—ये चार रूप सिद्ध होते हैं । 'द्रुह् +भ्याम्' यहा पदान्त हकार को घकार तथा पक्ष मे ढकार होकर दोनो पक्षो मे एकाच ० (२५३) से दकार को धकार हो जाता है । पुनः झलां जशोऽन्ते (६७) मे दोनो पक्षो मे जश्त्व हो कर—'१ ध्रुग्भ्याम्, २ ध्रुड्भ्याम्' ये दो रूप बनते हैं। इसी प्रकार भिस् और भ्यस् मे भी दो २ रूप होते हैं। द्रुह् +सु (सुप्) । यहा वा द्रुह० (२५४) से पदान्त हकार को वैकल्पिक घकार हो कर एकाचो बशो० (२५३) सूत्र मे दकार को धकार, जश्त्व से घकार को गकार, षत्व भ सु के सकार को षकार तथा चर्व मे गकार को ककार करने मे— ध्रुक् षु = 'ध्रुक्षु' रूप सिद्ध होता है। घत्वाभाव मे—पदान्त हकार को हो ढः (२५१) से ढकार, भष्व से दकार को धकार, जश्त्व से ढकार को डकार, डः सि धुट् (८४) से वैकल्पिक धुट् आगम, अनुबन्धलोप तथा खरि च (७४) मे चत्वं करने पर—'१ ध्रुद्र्सु, २. ध्रुट्सु' ये दो रूप बनते हैं। तो इस प्रकार कुल मिला कर—'१ ध्रुक्षु, २ धृट्सु ३ धृट्सु' ये तीन रूप सिद्ध होते हैं। सम्पूर्ण रूपमाला यथा— प्रथमा ध्रुक्,-ग्, ध्रुट्,-ड् ध्रुहौ द्रुह द्वितीया द्रुहम् " " तृतीया द्रुहा ध्रुग्भ्याम्, ध्रुड्भ्याम् ध्रुग्भि, ध्रुड्भि चतुर्थी द्रुहे " " ध्रुग्भ्य, ध्रुड्भ्यः पञ्चमी द्रुह " " " " षष्ठी " द्रुहो द्रुहाम्

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३५५ सप्तमी द्रुहि द्रुहोः ध्रुक्षु, ध्रुट्त्सु, ध्रुट्सु सम्बोधन हे ध्रुक्,-ग्, ध्रुट्,-ड्! हे द्रुहौ! हे द्रुहः! इसीप्रकार—मित्रद्रुह्, (मित्राय द्रुह्यति=मित्रद्रोही) आदि शब्दों के रूप होते हैं। मुह वैचित्ये (दिवा० प०) धातु से क्विन् तथा उस का सर्वापहार लोप करने से 'मुह्' (मोह करने वाला) शब्द निष्पन्न होता है। इस की प्रक्रिया 'द्रुह्' शब्दवत् होती है, केवल भष्भाव नहीं होता। रूपमाला यथा— प्रथमा मुक्,-ग्, मुट्,-ड् मुहौ मुहः द्वितीया मुहम् ,, ,, तृतीया मुहा मुग्भ्याम्, मुड्भ्याम् मुग्भिः, मुड्भिः चतुर्थी मुहे ,, ,, मुग्भ्यः, मुड्भ्यः पञ्चमी मुहः ,, ,, ,, ,, षष्ठी ,, मुहोः मुहाम् सप्तमी मुहि ,, मुक्षु, मुट्त्सु, मुट्सु सम्बोधन हे मुक्,-ग्, मुट्,-ड्! हे मुहौ! हे मुहः! [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२५५) धात्वादेः षः सः। ६।१।६४॥ (धातोरादेः षस्य सः स्यात्)। स्नुक्, स्नुग्, स्नुट्, स्नुड्। एवं स्निक्, स्निग्, स्निट्, स्निड्। विश्ववाट्, विश्ववाड्। विश्ववाही। विश्ववाहः। विश्ववाहम्। विश्ववाहौ॥ अर्थः—धातु के आदि षकार के स्थान पर सकार आदेश हो। व्याख्या—धात्वादेः ।६।१। षः ।६।१। सः ।१।१। समासः—धातोर् आदिः= धात्वादिः। तस्य=धात्वादेः, षष्ठीतत्पुरुषः। स इत्यत्र अकार उच्चारणार्थः। अर्थः— (धात्वादेः) धातु के आदि (षः) ष् के स्थान पर (सः) स् आदेश होता है। 'धातु' कहने से 'षोडशः, षट्' आदि में षकार को सकार नहीं होता तथा 'आदि' कथन से 'कषति' आदियों में धातु के अन्त्य षकार को सकार नहीं होता। ष्णुह उद्गिरणे (दिवा० प०), ष्णिह प्रीतौ (दिवा० प०) इन धातुओं के आदि षकार को प्रकृत-सूत्र से सकार हो कर णकार को भी नकार हो जाता है। क्योंकि यह नियम है कि—निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः अर्थात् (निमित्त-अपाये) निमित्त=कारण के नाश होने पर (नैमित्तिकस्य) नैमित्तिक—उस निमित्त से उत्पन्न हुए कार्य का भी (अपायः) नाश हो जाता है¹। यहां षकार से परे होने के कारण ही नकार को रषाभ्यां नो णः समानपदे (२६७) से णकार हुआ था। जब निमित्त षकार ही न रहा तब नैमित्तिक कार्य णकार भी न रहा पुनः नकार हो गया। स्नुह्, स्निह्—दोनों से कर्त्ता में क्विन् हो कर उस का सर्वापहार लोप करने १. यहां नाश से तात्पर्य पुनः पूर्वावस्था में आ जाना है, लोप नहीं।

भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां

द्रुह्, स्निह्' शब्द सिद्ध होते हैं । इन दोनों की सम्पूर्ण प्रक्रिया 'द्रुह्' शब्द के समान होती है । केवल एकाचो बशो भष्० (२५३) से भष्भाव नहीं होता । स्नुह् (स्नुह्यतीति स्नुक् वमन करने वाला) शब्द की रूपमाला यथा— प्रथमा स्नुक्-ग्, स्नुट्-ड् स्नुहौ स्नुहः द्वितीया स्नुहम् " " तृतीया स्नुहा स्नुग्भ्याम्, स्नुड्भ्याम् स्नुग्भिः, स्नुड्भिः चतुर्थी स्नुहे " " स्नुग्भ्यः, स्नुड्भ्यः पञ्चमी स्नुहः " " " " षष्ठी " स्नुहोः स्नुहाम् सप्तमी स्नुहि " स्नुक्षु, स्नुट्सु स्नुट्त्सु सम्बोधन हे स्नुक्-ग् ट्-ड! हे स्नुहौ! हे स्नुहः ! इसी प्रकार स्निह् (स्निह्यतीति स्निक्, स्नेह करने वाला) के रूप चलते हैं । विश्ववाह् (जगत् को धारण करने वाला, भगवान्) । विश्वं वहतीति विश्व- वाट् । विश्वकर्मोपपद वहँ प्रापणे (भ्वा० उ०) धातु से कर्त्ता में वहश्च (३।२।६४) सूत्र द्वारा ण्विं प्रत्यय, णित्त्व के कारण उपधावृद्धि तथा ण्विं के चले जाने पर उपपद- समास करने से 'विश्ववाह्' शब्द निष्पन्न होता है । 'विश्ववाह्' शब्द के सर्वनामस्थान प्रत्ययों में लिहशब्दवत् रूप बनते हैं । भसञ्ज्ञकों में कुछ विशेष होता है । वह अग्रिम सूत्रों में बताया जाता है— [लघु०] सञ्ज्ञा सूत्रम्—(२५६) इग्यणः सम्प्रसारणम् ।१।१।४५॥ यणः स्थाने प्रयुज्यमानो य इक्, स सम्प्रसारणसञ्ज्ञः स्यात् ॥ अर्थ—यण् के स्थान पर विधान किया इक् सम्प्रसारणसञ्ज्ञक हो । व्याख्या—इक् १।१। यणः ६।१। सम्प्रसारणम् १।१। अर्थ—(यण्) यण् के स्थान पर विधान किया (इक्) इक् (सम्प्रसारणम्) सम्प्रसारणसञ्ज्ञक होता है । यहां यथासङ्ख्य अथवा स्थानकृत आन्तर्य से यकारस्थानिक इवर्ण, वकारस्थानिक उवर्ण, रेफस्थानिक ऋवर्ण तथा लकारस्थानिक ऌवर्ण सम्प्रसारणसञ्ज्ञक होगा । इस शास्त्र में सम्प्रसारण का दो प्रकार के स्थानों पर उपयोग किया जाता है । एक विधिसूत्रों में और दूसरा अनुवादसूत्रों में । जिन सूत्रों में सम्प्रसारण का साक्षात् विधान किया जाता है वे विधिसूत्र कहाते हैं । यथा—वाह ऊठ् (२५७) भसञ्ज्ञक वाह् के स्थान पर सम्प्रसारण ऊठ् हो । वचिस्वपि० (५४७) वच्, स्वप् और यजादि धातुओं को क्तिङ् परे होने पर सम्प्रसारण हो । इत्यादि । जहां सम्प्रसारण का नाम ले कर कोई अन्य कार्य किया जाता है वहां सम्प्रसारण का अनुवाद होता है । यथा—सम्प्रसारणाच्च (२५८) सम्प्रसारण से अच् परे होने पर पूर्व+पर के स्थान पर पूर्वरूप एकादेश हो । हलः (८१६) हल् से परे सम्प्रसारण को दीर्घ हो । इत्यादि । यणस्थानिक् इक् की सम्प्रसारणसञ्ज्ञा होने से अनुवादस्थलों में कोई बाधा

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३५७ उपस्थित नहीं होती; क्योंकि सर्वत्र सम्प्रसारण विद्यमान रहने से अन्य कार्य अबाध हो जाते हैं। परन्तु विधिस्थलों में महान् झगड़ा उपस्थित हो जाता है; क्योंकि सदैव यह नियम होता है कि प्रथम सञ्ज्ञी वर्त्तमान रहता है और बाद में उस की सञ्ज्ञा की जाती है। इस नियमानुसार पहले यणस्थानिक इक् वर्त्तमान होना चाहिये और पीछे सम्प्रसारणसञ्ज्ञा का विधान करना चाहिये। इस प्रकार वाह ऊठ् (२५७) द्वारा वाह् में तब सम्प्रसारण होगा जब यणस्थानिक इक् होगा। परन्तु यणस्थानिक इक् तब हो सकता है जब कि वाह ऊठ् (२५७) सूत्र प्रवृत्त हो कर सम्प्रसारण कर दे। इस प्रकार यहां अन्योऽन्याश्रय दोष आ कर महान् झगड़ा उपस्थित हो जाता है। क्योंकि अन्योऽन्याश्रय कार्य हो नहीं सकते। जब पहला हो तब उस का आश्रित दूसरा हो और जब दूसरा हो तब उस का आश्रित पहला हो। इस दशा में कोई भी नहीं हो सकता। भाष्यकार ने भी कहा है — इतरेतराश्रयाणि च कार्याणि न प्रकल्पन्ते । इस झगड़े को उपस्थित देख भाष्यकार सूत्रशाटकन्याय के आश्रय से इस का समाधान करते हैं। उन का कथन है कि जैसे कोई पुरुष सूत ले कर जुलाहे के पास जा कर कहता है कि अस्य सूत्रस्य शाटकं वय इस सूत का वस्त्र बुन। अब यहां 'वस्त्र बुन' पर यह सन्देह होता है कि यदि यह वस्त्र है तो बुनना कैसे ? क्योंकि वस्त्र बुना नहीं जा सकता। और यदि यह बुनने योग्य है तो वस्त्र कैसा ? क्योंकि बुनना वस्त्र में सम्भव नहीं हो सकता। इस प्रकार विरोध आने पर लोक में भावी सञ्ज्ञा का आश्रय किया जाता है। अर्थात् उस पुरुष का यह आशय समझा जाता है कि 'इस को ऐसा बुन जिस से यह वस्त्र हो जाये।' इसी प्रकार यहां विधिप्रदेशों में भी भावी सञ्ज्ञा का आश्रयण करना चाहिये। यथा—वाह ऊठ् (२५७) भसञ्ज्ञक वाह् के स्थान पर ऐसा करो कि जिस से किया हुआ कार्य सम्प्रसारणसञ्ज्ञक हो जाये। तो इस प्रकार विधिप्रदेशों में दोष का परिहार हो जाता है। अब इस प्रकरण में सम्प्रसारणसञ्ज्ञा का उपयोग दिखाते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम् —(२५७) वाह ऊठ् ।६।४।१३२॥ भस्य वाहः सम्प्रसारणम् ऊठ् ॥ अर्थः—भसञ्ज्ञक 'वाह्' के स्थान पर सम्प्रसारण ऊठ् हो । व्याख्या—भस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। वाहः ।६।१। सम्प्रसारणम् ।१।१। (वसोः सम्प्रसारणम् से) । ऊठ् ।१।१। अर्थः—(भस्य) भसञ्ज्ञक (वाहः) वाह् के स्थान पर (सम्प्रसारणम्) सम्प्रसारण (ऊठ्) ऊठ् हो। पूर्वसूत्रानुसार वाह् के वकार को ही ऊठ् होगा। विश्ववाह् + अस् (शस्)। यहां यचि भम् (१६५) से वाह् की भसञ्ज्ञा है; अतः प्रकृतसूत्र से इस के वकार को ऊठ् हो जाता है। ऊठ् के ठकार की हलन्त्यम् (१) से इत्सञ्ज्ञा और तस्य लोपः (३) से लोप हो कर 'विश्व ऊ आह् + अस्' हुआ। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—

३५८ भैमोव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२५८) सम्प्रसारणाच्च ।६।१।१०८॥ सम्प्रसारणादचि पूर्वरूपमेकादेश । वृद्धि —विश्वौह । इत्यादि ॥ अर्थ —सम्प्रसारण से अच् परे होने पर पूर्व+पर के स्थान पर पूर्वरूप हो। व्याख्या—सम्प्रसारणात् ।५।१। च इत्यव्ययपदम् । अचि ।७।१। (इको यणचि से) । पूर्वपरयो ।६।२। एक ।१।१। (एक पूर्वपरयो. यह अधिकृत है) । पूर्व ।१।१। (अमि पूर्व स) । अर्थ —(सम्प्रसारणात्) सम्प्रसारण स (अचि) अच् परे होने पर (पूर्व-परयो ) पूर्व+पर के स्थान पर (एक ) एक (पूर्व ) पूर्वरूप आदेश हो। 'विश्व ऊ आह् +अस्' यहा 'ऊ' यह सम्प्रसारण है, इस से परे 'आ' यह अच् वर्त्तमान है, अत पूर्व (ऊ) और पर (आ) के स्थान पर एक पूर्वरूप 'ऊ' हो कर 'विश्व ऊ ह्+अस्' हुआ । अब एत्येधत्यूठ्सु (३४) सूत्र म वकारोत्तर अकार और ऊठ् के ऊकार के स्थान पर 'औ' वृद्धि हो कर—सकार को रुत्व और रेफ को विसर्ग करने से 'विश्वौह' प्रयोग सिद्ध होता है। इसी प्रकार आगे सर्वत्र भसञ्ज्ञको मे प्रक्रिया होती है। 'विश्ववाह' शब्द की रूपमाला यथा— प्रथमा विश्ववाट्-ड विश्ववाहौ विश्ववाह द्वितीया विश्ववाहम् ,, विश्वौह तृतीया विश्वौहा विश्ववाड्भ्याम् विश्ववाड्भि. चतुर्थी विश्वौहे ,, विश्ववाड्भ्य पञ्चमी विश्वौह ,, ,, षष्ठी ,, विश्वौहो विश्वौहाम् सप्तमी विश्वौहि ^,, विश्ववाट्सु ट्सु सम्बोधन हे विश्ववाट्-ड्! हे विश्ववाहौ! हे विश्ववाह ! इसी प्रकार—१. रथवाह् (रथ हाकने वाला), २. शकटवाह् (छकडा हाकने वाला), ३ भारवाह् (भार उठाने वाला), ४ उष्ट्रवाह् (ऊंट हाक्ने वाला), ५. प्रष्ठवाह् (सिखाने के लिये जोते हुए बैल आदि) प्रभृति शब्दो के रूप होते हैं। अनडुह्=बैल [अन =शकट वहतीत्यनड्वान्]। अनडुह् शब्द पाणिनीयगण- पाठ मे पञ्च वार प्रयुक्त हुआ है। [१ उर प्रभृति, २ ऋश्य दि ३ कुणालादि, ४. गर्गादि ५. शरत्प्रभृति] । शाकटायन के उणादिसूत्रो मे इस की सिद्धि नही की गई। महाराज-भोजप्रणीत सरस्वतीकण्ठाभरण के अनसि वहे क्विब्वे दश्चानस (अ० २ पा० १ सू० ३४६) इस औणादिक-सूत्र द्वारा अनस्‌कर्मोपपद 'वह' धातु से क्विँप् प्रत्यय, अनस् के सकार को डकारादेश, क्विब्वेलोप, वचिखपि० (५७७) द्वारा सम्प्रं १. कई लोग—वारिवाह, भूवाह प्रभृति अनकारान्तोपपद शब्दो की कल्पना करते है, परन्तु ऐसे शब्द प्रामाणिक नही हैं [देखें—(६४१३२) पर भाष्य, प्रदीप, तत्त्वबोधिनी] ।

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३५६ सारण तथा सम्प्रसारणाच्च (२५८) से पूर्वरूप करने पर 'अनडुह्' शब्द निष्पन्न होता है। अनडुह् + स् (सुं)। यहां अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्— (२५६) चतुरनडुहोरामुदात्तः ।७।१।९८॥ अनयोराम् स्यात्सर्वनामस्थाने परे ॥ अर्थः—सर्वनामस्थान परे हो तो चतुर् और अनडुह् शब्दों का अवयव आम् हो। व्याख्या — चतुरनडुहोः ।६।२। आम् ।१।१। उदात्तः ।१।१। सर्वनामस्थाने ।७।१। (इतोऽत्सर्वनामस्थाने से) । अर्थः— (सर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान परे होने पर (चतुरनडुहोः) चतुर् और अनडुह् शब्दों का अवयव (उदात्तः) उदात्त (आम्) आम् हो जाता है। 'आम्' मित् है, क्योंकि हलन्त्यम् (१) से इस के मकार की इत्सञ्ज्ञा होती है। अतः यह मिदचोऽन्त्यात्परः (२४०) के अनुसार चतुर् और अनडुह् शब्दों के अन्त्य अच् से परे होगा । ग्रन्थकार ने 'उदात्त' शब्द स्वरप्रकरणोपयोगी जान कर वृत्ति में छोड़ दिया है। लघुसिद्धान्तकौमुदी में स्वरप्रकरण नहीं है। 'अनडुह् + स्' यहां 'सुं' यह सर्वनामस्थान परे हैं अतः अनडुह् शब्द के अन्त्य अच् = उकार से परे आम् का आगम हो कर—'अनङ् आम् ह् + स्' हुआ । अब अनुबन्ध मकार का लोप हो कर इको यणचि (१५) से यण् हो जाता है। तब 'अनड्वाह् + स्' इस स्थिति में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्— (२६०) सावनडुहः ।७।१।८२॥ अस्य नुम् स्यात्सी परे । अनड्वान् ॥ अर्थः—सुँ परे हो तो अनडुह् शब्द का अवयव नुम् हो जाता है। व्याख्या—सौ ।७।१। अनडुहः ।६।१। नुम् ।१।१। (आच्छीनद्योर्नुम् से) । अर्थः—(सौ) सुँ परे होने पर (अनडुहः) अनडुह् शब्द का अवयव (नुँम्) नुम् हो जाता है। यहां यह सन्देह होता है कि चतुरनडुहोः० (२५६) सूत्र का सावनडुहः(२६०) सूत्र अपवाद है। क्योंकि दोनों का विषय एक है अर्थात् दोनों अनडुह् शब्द को आगम करते हैं। इन में से प्रथम (चतुरनडुहोः०) सम्पूर्ण सर्वनामस्थान में विहित होने से उत्सर्ग और दूसरा (सावनडुहः) केवल सर्वनामस्थानान्तर्गत 'सुं' में विहित होने से उस का अपवाद होने योग्य है। अतः सुं में सावनडुहः (२६०) सूत्र ही प्रवृत्त होना चाहिये, चतुरनडुहोः० (२५६) नहीं। क्योंकि उत्सर्ग की प्रवृत्ति अपवादविषय को छोड़ कर ही हुआ करती है—प्रकल्प्य चापवादविषयं तत उत्सर्गोऽभिनिविशते । इस का उत्तर यह है कि आच्छीनद्योर्नुम् (३६५) सूत्र से यहां 'आत्' की अनुवृत्ति आती है। जिस से —'सुं परे होने पर अनडुह् को नुँम् का आगम होता है परन्तु वह अवर्ण से परे होता है'—ऐसा अर्थ हो जाता है। तो अब यदि आम् का

३६० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां आगम नहीं करते तो अनडुह् शब्द में अवर्ण नहीं आ सकता, और यदि अवर्ण नहीं आता तो नुम् प्रवृत्त नहीं हो सकता। अतः नुम् को अपनी प्रवृत्ति के लिये विवश हो कर आम् को छूट देनी पड़ती है। अतः प्रथम आम् होकर पश्चात् नुम् होता है। इन में उत्सर्ग-अपवादभाव नहीं होता। अनड्वाह् + स्' यहां आकार से परे नुम् हो कर अनुबन्धों (उकार, मकार) के चले जाने पर—'अनङ्ख्ान् ह् + स्' हुआ। अब हल्ङ्याब्भ्य० (१७६) सूत्र से सकार का तथा संयोगाऽतस्य लोपः (२०) सूत्र से हकार का लोप हो कर 'अनड्वान्' प्रयोग सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि संयोगान्तलोप (८ २ २३) असिद्ध है अतः न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य (८ २ ७) सूत्र से नकार का लोप नहीं होगा। हे अनडुह् + स् (सुँ)। यहां सम्बुद्धि में आम् (२५६) प्राप्त होने पर उम का अपवाद अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है — [लघु०] विधि-सूत्रम्- (२६१) अम् सम्बुद्धौ ।७।१।६६॥ (चतुरनडुहोराम् स्यात्सम्बुद्धौ) । हे अनड्वन् ' । अनड्वाहौ । अनड्वाहः । अनडुहः । अनडुहा ॥ अर्थ.-सम्बुद्धि परे हो तो चतुर और अनडुह शब्दों का अवयव अम् हो। व्याख्या—चतुरनडुहोः।६।२। (चतुरनडुहोरामुदात्तः से)। अम् ।१।१। सम्बुद्धौ ।७।१। अर्थ —(सम्बुद्धौ) सम्बुद्धि परे होने पर (चतुरनडुहो ) चतुर और अनडुह का अवयव (अम्) अम् हो जाता है। यह सूत्र चतुरनडुहो० (२५६) सूत्र का अपवाद है। इस के प्रवृत्त होने पर भी सावनडुहः (२६०) द्वारा नुम् हो जाता है। क्योंकि वहां 'आत्' की अनुवृत्ति आने से वह अवर्ण से परे होता है। 'हे अनडुह + स्' यहां सम्बुद्धि परे है अतः मिदचोऽन्त्यात्परः (२४०) के नियमानुसार अम्सम्बुद्धौ (२६१) द्वारा अनडुहू के अन्त्य अच्-उकार से परे अम् का आगम हो कर यण् करने से 'अनड्वह् + स्' हुआ। पुनः सावनडुह (२६०) सूत्र से नुम् का आगम कर सकारलोप और संयोगान्तलोप करने से—'हे अनड्वन्' प्रयोग सिद्ध होता है। अनडुहू + औ = अनडु आम् ह् + औ = अनड्वाहो। अनड्वाहः । अनड्वाहम् । अनड्वाहौ । शस् मे सर्वनामस्थान परे न होने के कारण आम् का आगम नही होता —अनडुह । 'अनडुह + भ्याम्' यहां स्वादिष्वसर्वनामस्थाने (१६४) सूत्र से अनडुह की पदसञ्ज्ञा हो कर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि सूत्रम्-- (२६२) वसुंस्रंसुध्वंस्वनडुहां दः ।८।२।७२॥ सान्तवस्वन्तस्य स्रंसादेश्च दः स्यात्पदान्ते। अनडुद्भ्याम् इत्यादि । सान्तेति किम् ? विद्वान् । पदान्तेति किम् ? स्रस्तम्, ध्वस्तम् ॥

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३६१ अर्थः—पद के अन्त में सान्त वसुंप्रत्ययान्त को तथा स्रंसुं, ध्वंसु और अनडुह् शब्दों को दकार आदेश हो जाता है । व्याख्या—सः ।६।१। (ससजुषो रुः का एक अंश) । वसुंस्रंसुंध्वंस्वनडुहाम् ।६।३। पदानाम् ।६।३। (पदस्य इस अधिकृत का यहां वचनविपरिणाम हो जाता है) । दः ।१।१। समासः—वसुंश्च स्रंसुंश्च ध्वंसुंश्च अनड्वान् च = वसुंस्रंसुंध्वंस्वनडुहः, तेषाम् = वसुंस्रंसुंध्वंस्वनडुहाम्, इतरेतरद्वन्द्वः । 'सः' यह 'वसुं' अंश का ही विशेषण है । स्रंसुं और ध्वंसुं में किसी प्रकार का दोष न आने से तथा अनडुह् का असम्भव होने से विशेषण नहीं बन सकता । विशेषण होने से 'सः' से तदन्तविधि हो जाती है । शतृँ के स्थान पर आदेश होने से स्थानिवद्भाव से 'वसुं' भी प्रत्ययसञ्ज्ञक है अतः प्रत्यय होने से उस से भी तदन्तविधि हो जाती है । स्रंसुं आदि भी 'पद' के विशेषण होने से तदन्तविधि को प्राप्त होते है । अर्थः—(सः) सान्त (वसुंस्रंसुंध्वंस्वनडुहाम्) वसुंप्रत्ययान्त और स्रंसुं ध्वंसुं तथा अनडुह् अन्त वाले (पदानाम्) पदों को (दः) दकार आदेश होता है । दकार में अकार उच्चारणार्थ है, आदेश 'द्' ही होता है । अलोऽन्त्यपरिभाषा से यह दकारादेश पद के अन्त को ही होता है । 'अनडुह्+भ्याम्' यहां व्यपदेशिवद्भाव से अथवा पदाङ्गाधिकारे तस्य च तदन्तस्य च (पृष्ठ २१३) के अनुसार अनडुह् के अन्त्य हकार को प्रकृत सूत्र से दकार आदेश होकर 'अनडुद्भ्याम्' रूप सिद्ध होता है । इसी प्रकार भिस् में 'अनडुद्भिः' तथा भ्यस् में 'अनडुद्भ्यः' रूप बनता है । सुप् में दकारादेश हो कर खरि च (७४) से चर्त्व हो जाता है—अनडुत्सु । अनडुह् शब्द की रूपमाला यथा— प्रथमा अनड्वान् अनड्वाहौ अनड्वाहः द्वितीया अनड्वाहम् ,, अनडुहः तृतीया अनडुहा अनडुद्भ्याम् अनडुद्भिः चतुर्थी अनडुहे ,, अनडुद्भ्यः पञ्चमी अनडुहः ,, ,, षष्ठी ,, अनडुहोः अनडुहाम् सप्तमी अनडुहि ,, अनडुत्सु सम्बोधन हे अनड्वन्! हे अनड्वाहौ! हे अनड्वाहः! अब यहां यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि ससजुषो रुः (१०५) सूत्र से 'सः' पद की अनुवृत्ति ला कर 'वसुं' का विशेषण बना कर तदन्तविधि कर 'सान्त वस्वन्त' क्यों कहा गया है ? जब कि वह है ही सकारान्त ? इसका उत्तर यह है कि यदि 'सान्त' न कहते, केवल वस्वन्त को ही दकारादेश करते तो 'विद्वान्' यहां पर भी नकार को दकार आदेश हो जाता; क्योंकि यह भी वस्वन्त है । अब सूत्र में 'सान्त' कथन से कोई दोष नहीं आता, क्योंकि 'विद्वान्' यह सान्त नहीं किन्तु नान्त वस्वन्त है । 'विद्वान्' कैसे वस्वन्त है ? यह आगे 'विद्वस्' शब्द पर इसी प्रकरण में स्पष्ट हो जायेगा ।

३६२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां पदान्त अर्थात् पद के अन्त को आदेश कहने से 'स्रस् + तम् = स्रस्तम्, ध्वस्

  • तम् = ध्वस्तम्' यहां अपदान्त सकार को दकार आदेश नहीं होता। ध्यान रहे कि यहां क्रमशः स्रंसुँ ध्वंसुँ धातुओं से 'क्त' प्रत्यय हो कर अनिदितां हल उपधायाः० (३३४) सूत्र से अनुनासिक का लोप हुआ है। वस्रन्तो में दकारादेश के उदाहरण 'विद्वद्द्भ्याम्' आदि आगे आएंगे। स्रंसुँ, ध्वंसुँ दोनों भ्वादिगणीय सेट् आत्मनेपदी धातु हैं। एक का अर्थ 'गिरना' और दूसरे का अर्थ ध्वंस होना = 'नाश होना' है। इन के उदाहरण उखास्रस् और पर्णध्वस् शब्द हैं। यथा- उखास्रस् = बटलोई से गिरने वाला धान्यकण आदि। उखायाः स्रंसत इत्यु- खास्रत्। कर्तरि क्विप्, उपपदसमास। इस की रूपमाला यथा- प्र० उखास्रत्-द् उखास्रसौ उखास्रसः पं० उखास्रसः उखास्रद्भ्याम् उखास्रद्भ्यः द्वि० उखास्रसम् " " ष० " उखास्रसोः उखास्रसाम् तृ० उखास्रसा उखास्रद्भ्याम् उखास्रद्भिः स० उखास्रसि " उखास्रत्सु च० उखास्रसे " उखास्रद्भ्यः सं० हेउखास्रत्-द् ! उखास्रसौ ! उखास्रसः ! यहां सर्वत्र पदान्त में वसुस्रंसु० (२६२) से दत्व हो जाता है। पर्णध्वस् = पत्तों का नाश करने वाला। पर्णानि ध्वंसत इति पर्णध्वत्। क्विप्, उपपदसमास। [सिद्धि और अर्थ विशेषरूप से (८०२) सूत्र पर देखें]। रूपमाला यथा- प्रथमा पर्णध्वत्-द् पर्णध्वसौ पर्णध्वसः द्वितीया पर्णध्वसम् " " तृतीया पर्णध्वसा पर्णध्वद्भ्याम् पर्णध्वद्भिः चतुर्थी पर्णध्वसे " पर्णध्वद्भ्यः पञ्चमी पर्णध्वसः " " षष्ठी " पर्णध्वसोः पर्णध्वसाम् सप्तमी पर्णध्वसि " पर्णध्वत्सु सम्बोधन हे पर्णध्वत्-द् ! हे पर्णध्वसौ ! हे पर्णध्वसः ! यहां भी सर्वत्र पदान्त में पूर्ववत् दत्व हो जाता है। तुरासाह् = इन्द्र। तुरम् = वेगवन्तं साहयति = अभिभवति इति तुराषाट्। तुरकर्मोपपदान् षहँ मर्षणे (भ्वा० आ०) इत्यस्माद्धातो विवँप् च (८०२) इति क्विप्। उपपदसमास। अन्येषामपि दृश्यते (६ ३ १३६) इति दीर्घ। जो वेग वाले को दबा लेता है उसे 'तुरासाह्' कहते हैं। यह इन्द्र का नाम है। तुरासाह् + स् (सुँ)। यहां हल्ङ्याब्भ्य० (१७६) से सकारलोप हो कर हो ढः (२५१) सूत्र द्वारा हकार को ढकार तथा झलां जशोऽन्ते (६७) से ढकार को डकार करने पर-'तुरासाड्' हुआ। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है-

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३६३ [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२६३) सहेः साडः सः ।८।३।५६॥ साड्रूपस्य सहेः सस्य मूर्धन्यादेशः स्यात् । तुराषाट्, तुराषाड् । तुरासाहौ । तुरासाहः । तुराषाड्भ्याम् इत्यादि ॥ अर्थः—सह् धातु से बने 'साड्' शब्द के सकार को मूर्धन्य आदेश हो । व्याख्या—सहेः ।६।१। साडः ।६।१। सः ।६।१। मूर्धन्यः ।१।१। (अपदान्तस्य मूर्धन्यः से) । मूर्ध्नि भवः=मूर्धन्यः । शरीरावयवाच्च (१०६१) इति यत् । अर्थः— (सहेः) सह् धातु का जो (साडः) साड् उस के (सः) सकार के स्थान पर (मूर्धन्यः) मूर्धा स्थान वाला वर्ण हो जाता है । सकार के स्थान पर आन्तर्य से ईषद्विवृत प्रयत्न वाला षकार ही मूर्धन्य होता है । सह् का साड् रूप पदान्त में ही बनता है अतः पदान्त में सह् के सकार को मूर्धन्य आदेश हो—यह फलितार्थ हुआ । 'तुरासाड्' यहां 'साड्' यह सह् धातु से बना है । अतः इस के सकार को मूर्धन्य षकार हो कर वाऽवसाने (१४६) से वैकल्पिक चत्त्वं करने पर 'तुराषाट्, तुराषाड्' दो रूप बनते हैं । तमभ्यनन्दत्प्रणतं लवणान्तकमग्रजः । कालनेमिवधात्प्रीत- स्तुराषाडिव शार्ङ्गिणम् (रघु० १५.४०) । रूपमाला यथा— प्र० तुराषाट्-ड् तुरासाहौ तुरासाहः | प० तुरासाहः तुराषाड्भ्याम् तुराषाड्भ्यः द्वि० तुरासाहम् ,, ,, | प० ,, तुरासाहोः तुरासाहाम् तृ० तुरासाहा तुराषाड्भ्याम् तुराषाड्भिः | स० तुरासाहि ,, तुराषाट्सु, ड्सु च० तुरासाहे ,, तुराषाड्भ्यः | सं० हे तुराषाट्-ड् ! तुरासाहौ ! तुरासाहः ! इसी प्रकार—पृतनासाह्, प्रभृति शब्दों के रूप जानने चाहियें । (यहां हकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।) —:: o ::— यद्यपि हकारान्त शब्दों के अनन्तर प्रत्याहारक्रम से यकारान्त शब्द आने चाहियें थे तथापि उन का विरलप्रयोग¹ तथा उन में किसी प्रकार का विशेषकार्य होता न देख कर ग्रन्थकार उन्हें छोड़ कर वकारान्त शब्दों का निरूपण करते हैं । सुदिव् =अच्छे अर्थात् निर्मल आकाश वाला दिवस (दिन) आदि या अच्छे स्वर्ग वाला पुरुष आदि । 'दिव्' शब्द नित्यस्त्रीलिङ्ग है । इस का अर्थ आकाश वा स्वर्ग है । द्यो-दिवौ द्वे स्त्रियाम् इत्यमरः । सु=शोभना द्योः=आकाशो नाको वा यस्य स सुद्यौः । इस प्रकार बहुव्रीहि-समास में 'सुदिव्' शब्द पुंल्लिङ्ग हो जाता है । प्रातिपदिक सञ्ज्ञा हो कर इस से स्वादि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं— सुदिव् + स् (सुँ) में हल्ङ्याब्भ्योः० (१७६) से सकारलोप प्राप्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२६४) दिव औत् ।७।१।८४॥ दिव् इति प्रातिपदिकस्य औत् स्यात् सौ । सुद्यौः । सुदिवौ ॥ १. यथा व्याकरण में अय्, आय्, मय्, चय्, यय् आदि ।