लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३४५ इसी प्रकार—सुशिशु, सुतंरु, सुवायु, सुगुरु, सुक्रतु, सुपरशु, सुबाहु, सुवातु, सुबन्धु, सुकेतु, सुजन्तु, सुतन्तु, सुपांशु, सुपटु—प्रभृति शब्द होते हैं । नोट—भाषितपुंस्क शब्द प्रायः विशेषणवाची ही होते हैं; विशुद्ध भाषितपुंस्क शब्द बहुत ही थोड़े हैं। यथा—कमण्डलु, कम्बु, शीधु, जीवातु आदि। विशेष्य के नपुंसक होने पर ही ये विशेषणवाची नपुंसक होते हैं। (यहां उकारान्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) -----::०::----- अब ऋकारान्त नपुंसक शब्दों का वर्णन करते हैं— [लघु०] धातृ। धातृणी। धातॄणि। हे धातः!, हे धातृ ! । धात्रा। धातृणा। धातॄणाम्। एवं ज्ञात्रादयः ॥ व्याख्या—दधातीति धातृ (कुलम्)। जो धारण करे उसे 'धातृ' कहते हैं। यह शब्द भी विशेष्यलिङ्ग के आश्रित होने से त्रिलिङ्गी है। विशेष्य के नपुंसक होने पर इस के नपुंसक में रूप बनते हैं। इसकी रूपमाला यथा— प्रथमा धातृ धातृणी धातॄणि द्वितीया ,, ,, ,, तृतीया धात्रा, धातृणा* धातृभ्याम् धातृभिः चतुर्थी धात्रे, धातृणे* ,, धातृभ्यः पञ्चमी धातुः, धातृणः* ,, ,, षष्ठी ,, ,, * धात्रोः, धातृणोः* धातॄणाम्* सप्तमी धातरि, धातृणि* ,, धातृषु सम्बोधन हे धातृ!, हे धातः! हे धातृणी! हे धातॄणि! : * इन तृतीयादि अजादि विभक्तियों में तृतीयादिषु भाषित० (२४६) सूत्र से वैकल्पिक पुंवद्भाव हो जाता है। पुंवत्पक्ष में अजन्तपुंल्लिङ्गान्तर्गत 'धातृ' शब्द के समान प्रक्रिया होती है। पुंवद्भाव के अभाव में 'वारि' शब्दवत् कार्य होते हैं। किन्तु टा में ना आदेश न हो कर नुँम् ही होता है। ध्यान रहे कि 'धातृ' शब्द की घिसञ्ज्ञा नहीं है अतः ङे, ङसिँ, ङस्, ङि विभक्तियों में घेर्डिति (१७२) और अच्च घेः (१७४) के साथ नुँम् को झगड़ना नहीं पड़ता। आम् में यद्यपि दोनों पक्षों में एक जैसे रूप बनते हैं तथापि पुंवद्भाव के अभाव में प्रक्रिया में कुछ अन्तर होता है। अर्थात् नुट् का आगम पूर्वविप्रतिषेध से नुँम् का बाध कर लेता है। 'हे धातृ, हे धातः' में न लुमताङ्गस्य (१६१) की अनित्यता के कारण दो रूप बनते हैं। अनित्यतापक्ष में नपुंसक में सर्वनामस्थानता न होने से ऋतो ङि० (२०४) से गुण न हो कर ह्रस्वस्य गुणः (१६६) से गुण हो जाता है। इसी प्रकार ज्ञातृ आदि शब्दों के नपुंसकलिङ्ग में रूप होते हैं—