भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 376

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३६१ अर्थः—पद के अन्त में सान्त वसुंप्रत्ययान्त को तथा स्रंसुं, ध्वंसु और अनडुह् शब्दों को दकार आदेश हो जाता है । व्याख्या—सः ।६।१। (ससजुषो रुः का एक अंश) । वसुंस्रंसुंध्वंस्वनडुहाम् ।६।३। पदानाम् ।६।३। (पदस्य इस अधिकृत का यहां वचनविपरिणाम हो जाता है) । दः ।१।१। समासः—वसुंश्च स्रंसुंश्च ध्वंसुंश्च अनड्वान् च = वसुंस्रंसुंध्वंस्वनडुहः, तेषाम् = वसुंस्रंसुंध्वंस्वनडुहाम्, इतरेतरद्वन्द्वः । 'सः' यह 'वसुं' अंश का ही विशेषण है । स्रंसुं और ध्वंसुं में किसी प्रकार का दोष न आने से तथा अनडुह् का असम्भव होने से विशेषण नहीं बन सकता । विशेषण होने से 'सः' से तदन्तविधि हो जाती है । शतृँ के स्थान पर आदेश होने से स्थानिवद्भाव से 'वसुं' भी प्रत्ययसञ्ज्ञक है अतः प्रत्यय होने से उस से भी तदन्तविधि हो जाती है । स्रंसुं आदि भी 'पद' के विशेषण होने से तदन्तविधि को प्राप्त होते है । अर्थः—(सः) सान्त (वसुंस्रंसुंध्वंस्वनडुहाम्) वसुंप्रत्ययान्त और स्रंसुं ध्वंसुं तथा अनडुह् अन्त वाले (पदानाम्) पदों को (दः) दकार आदेश होता है । दकार में अकार उच्चारणार्थ है, आदेश 'द्' ही होता है । अलोऽन्त्यपरिभाषा से यह दकारादेश पद के अन्त को ही होता है । 'अनडुह्+भ्याम्' यहां व्यपदेशिवद्भाव से अथवा पदाङ्गाधिकारे तस्य च तदन्तस्य च (पृष्ठ २१३) के अनुसार अनडुह् के अन्त्य हकार को प्रकृत सूत्र से दकार आदेश होकर 'अनडुद्भ्याम्' रूप सिद्ध होता है । इसी प्रकार भिस् में 'अनडुद्भिः' तथा भ्यस् में 'अनडुद्भ्यः' रूप बनता है । सुप् में दकारादेश हो कर खरि च (७४) से चर्त्व हो जाता है—अनडुत्सु । अनडुह् शब्द की रूपमाला यथा— प्रथमा अनड्वान् अनड्वाहौ अनड्वाहः द्वितीया अनड्वाहम् ,, अनडुहः तृतीया अनडुहा अनडुद्भ्याम् अनडुद्भिः चतुर्थी अनडुहे ,, अनडुद्भ्यः पञ्चमी अनडुहः ,, ,, षष्ठी ,, अनडुहोः अनडुहाम् सप्तमी अनडुहि ,, अनडुत्सु सम्बोधन हे अनड्वन्! हे अनड्वाहौ! हे अनड्वाहः! अब यहां यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि ससजुषो रुः (१०५) सूत्र से 'सः' पद की अनुवृत्ति ला कर 'वसुं' का विशेषण बना कर तदन्तविधि कर 'सान्त वस्वन्त' क्यों कहा गया है ? जब कि वह है ही सकारान्त ? इसका उत्तर यह है कि यदि 'सान्त' न कहते, केवल वस्वन्त को ही दकारादेश करते तो 'विद्वान्' यहां पर भी नकार को दकार आदेश हो जाता; क्योंकि यह भी वस्वन्त है । अब सूत्र में 'सान्त' कथन से कोई दोष नहीं आता, क्योंकि 'विद्वान्' यह सान्त नहीं किन्तु नान्त वस्वन्त है । 'विद्वान्' कैसे वस्वन्त है ? यह आगे 'विद्वस्' शब्द पर इसी प्रकरण में स्पष्ट हो जायेगा ।