लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां आगम नहीं करते तो अनडुह् शब्द में अवर्ण नहीं आ सकता, और यदि अवर्ण नहीं आता तो नुम् प्रवृत्त नहीं हो सकता। अतः नुम् को अपनी प्रवृत्ति के लिये विवश हो कर आम् को छूट देनी पड़ती है। अतः प्रथम आम् होकर पश्चात् नुम् होता है। इन में उत्सर्ग-अपवादभाव नहीं होता। अनड्वाह् + स्' यहां आकार से परे नुम् हो कर अनुबन्धों (उकार, मकार) के चले जाने पर—'अनङ्ख्ान् ह् + स्' हुआ। अब हल्ङ्याब्भ्य० (१७६) सूत्र से सकार का तथा संयोगाऽतस्य लोपः (२०) सूत्र से हकार का लोप हो कर 'अनड्वान्' प्रयोग सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि संयोगान्तलोप (८ २ २३) असिद्ध है अतः न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य (८ २ ७) सूत्र से नकार का लोप नहीं होगा। हे अनडुह् + स् (सुँ)। यहां सम्बुद्धि में आम् (२५६) प्राप्त होने पर उम का अपवाद अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है — [लघु०] विधि-सूत्रम्- (२६१) अम् सम्बुद्धौ ।७।१।६६॥ (चतुरनडुहोराम् स्यात्सम्बुद्धौ) । हे अनड्वन् ' । अनड्वाहौ । अनड्वाहः । अनडुहः । अनडुहा ॥ अर्थ.-सम्बुद्धि परे हो तो चतुर और अनडुह शब्दों का अवयव अम् हो। व्याख्या—चतुरनडुहोः।६।२। (चतुरनडुहोरामुदात्तः से)। अम् ।१।१। सम्बुद्धौ ।७।१। अर्थ —(सम्बुद्धौ) सम्बुद्धि परे होने पर (चतुरनडुहो ) चतुर और अनडुह का अवयव (अम्) अम् हो जाता है। यह सूत्र चतुरनडुहो० (२५६) सूत्र का अपवाद है। इस के प्रवृत्त होने पर भी सावनडुहः (२६०) द्वारा नुम् हो जाता है। क्योंकि वहां 'आत्' की अनुवृत्ति आने से वह अवर्ण से परे होता है। 'हे अनडुह + स्' यहां सम्बुद्धि परे है अतः मिदचोऽन्त्यात्परः (२४०) के नियमानुसार अम्सम्बुद्धौ (२६१) द्वारा अनडुहू के अन्त्य अच्-उकार से परे अम् का आगम हो कर यण् करने से 'अनड्वह् + स्' हुआ। पुनः सावनडुह (२६०) सूत्र से नुम् का आगम कर सकारलोप और संयोगान्तलोप करने से—'हे अनड्वन्' प्रयोग सिद्ध होता है। अनडुहू + औ = अनडु आम् ह् + औ = अनड्वाहो। अनड्वाहः । अनड्वाहम् । अनड्वाहौ । शस् मे सर्वनामस्थान परे न होने के कारण आम् का आगम नही होता —अनडुह । 'अनडुह + भ्याम्' यहां स्वादिष्वसर्वनामस्थाने (१६४) सूत्र से अनडुह की पदसञ्ज्ञा हो कर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि सूत्रम्-- (२६२) वसुंस्रंसुध्वंस्वनडुहां दः ।८।२।७२॥ सान्तवस्वन्तस्य स्रंसादेश्च दः स्यात्पदान्ते। अनडुद्भ्याम् इत्यादि । सान्तेति किम् ? विद्वान् । पदान्तेति किम् ? स्रस्तम्, ध्वस्तम् ॥