भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 374

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३५६ सारण तथा सम्प्रसारणाच्च (२५८) से पूर्वरूप करने पर 'अनडुह्' शब्द निष्पन्न होता है। अनडुह् + स् (सुं)। यहां अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्— (२५६) चतुरनडुहोरामुदात्तः ।७।१।९८॥ अनयोराम् स्यात्सर्वनामस्थाने परे ॥ अर्थः—सर्वनामस्थान परे हो तो चतुर् और अनडुह् शब्दों का अवयव आम् हो। व्याख्या — चतुरनडुहोः ।६।२। आम् ।१।१। उदात्तः ।१।१। सर्वनामस्थाने ।७।१। (इतोऽत्सर्वनामस्थाने से) । अर्थः— (सर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान परे होने पर (चतुरनडुहोः) चतुर् और अनडुह् शब्दों का अवयव (उदात्तः) उदात्त (आम्) आम् हो जाता है। 'आम्' मित् है, क्योंकि हलन्त्यम् (१) से इस के मकार की इत्सञ्ज्ञा होती है। अतः यह मिदचोऽन्त्यात्परः (२४०) के अनुसार चतुर् और अनडुह् शब्दों के अन्त्य अच् से परे होगा । ग्रन्थकार ने 'उदात्त' शब्द स्वरप्रकरणोपयोगी जान कर वृत्ति में छोड़ दिया है। लघुसिद्धान्तकौमुदी में स्वरप्रकरण नहीं है। 'अनडुह् + स्' यहां 'सुं' यह सर्वनामस्थान परे हैं अतः अनडुह् शब्द के अन्त्य अच् = उकार से परे आम् का आगम हो कर—'अनङ् आम् ह् + स्' हुआ । अब अनुबन्ध मकार का लोप हो कर इको यणचि (१५) से यण् हो जाता है। तब 'अनड्वाह् + स्' इस स्थिति में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्— (२६०) सावनडुहः ।७।१।८२॥ अस्य नुम् स्यात्सी परे । अनड्वान् ॥ अर्थः—सुँ परे हो तो अनडुह् शब्द का अवयव नुम् हो जाता है। व्याख्या—सौ ।७।१। अनडुहः ।६।१। नुम् ।१।१। (आच्छीनद्योर्नुम् से) । अर्थः—(सौ) सुँ परे होने पर (अनडुहः) अनडुह् शब्द का अवयव (नुँम्) नुम् हो जाता है। यहां यह सन्देह होता है कि चतुरनडुहोः० (२५६) सूत्र का सावनडुहः(२६०) सूत्र अपवाद है। क्योंकि दोनों का विषय एक है अर्थात् दोनों अनडुह् शब्द को आगम करते हैं। इन में से प्रथम (चतुरनडुहोः०) सम्पूर्ण सर्वनामस्थान में विहित होने से उत्सर्ग और दूसरा (सावनडुहः) केवल सर्वनामस्थानान्तर्गत 'सुं' में विहित होने से उस का अपवाद होने योग्य है। अतः सुं में सावनडुहः (२६०) सूत्र ही प्रवृत्त होना चाहिये, चतुरनडुहोः० (२५६) नहीं। क्योंकि उत्सर्ग की प्रवृत्ति अपवादविषय को छोड़ कर ही हुआ करती है—प्रकल्प्य चापवादविषयं तत उत्सर्गोऽभिनिविशते । इस का उत्तर यह है कि आच्छीनद्योर्नुम् (३६५) सूत्र से यहां 'आत्' की अनुवृत्ति आती है। जिस से —'सुं परे होने पर अनडुह् को नुँम् का आगम होता है परन्तु वह अवर्ण से परे होता है'—ऐसा अर्थ हो जाता है। तो अब यदि आम् का