भारतकोश
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लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३५६ सारण तथा सम्प्रसारणाच्च (२५८) से पूर्वरूप करने पर 'अनडुह्' शब्द निष्पन्न होता है। अनडुह् + स् (सुं)। यहां अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्— (२५६) चतुरनडुहोरामुदात्तः ।७।१।९८॥ अनयोराम् स्यात्सर्वनामस्थाने परे ॥ अर्थः—सर्वनामस्थान परे हो तो चतुर् और अनडुह् शब्दों का अवयव आम् हो। व्याख्या — चतुरनडुहोः ।६।२। आम् ।१।१। उदात्तः ।१।१। सर्वनामस्थाने ।७।१। (इतोऽत्सर्वनामस्थाने से) । अर्थः— (सर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान परे होने पर (चतुरनडुहोः) चतुर् और अनडुह् शब्दों का अवयव (उदात्तः) उदात्त (आम्) आम् हो जाता है। 'आम्' मित् है, क्योंकि हलन्त्यम् (१) से इस के मकार की इत्सञ्ज्ञा होती है। अतः यह मिदचोऽन्त्यात्परः (२४०) के अनुसार चतुर् और अनडुह् शब्दों के अन्त्य अच् से परे होगा । ग्रन्थकार ने 'उदात्त' शब्द स्वरप्रकरणोपयोगी जान कर वृत्ति में छोड़ दिया है। लघुसिद्धान्तकौमुदी में स्वरप्रकरण नहीं है। 'अनडुह् + स्' यहां 'सुं' यह सर्वनामस्थान परे हैं अतः अनडुह् शब्द के अन्त्य अच् = उकार से परे आम् का आगम हो कर—'अनङ् आम् ह् + स्' हुआ । अब अनुबन्ध मकार का लोप हो कर इको यणचि (१५) से यण् हो जाता है। तब 'अनड्वाह् + स्' इस स्थिति में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्— (२६०) सावनडुहः ।७।१।८२॥ अस्य नुम् स्यात्सी परे । अनड्वान् ॥ अर्थः—सुँ परे हो तो अनडुह् शब्द का अवयव नुम् हो जाता है। व्याख्या—सौ ।७।१। अनडुहः ।६।१। नुम् ।१।१। (आच्छीनद्योर्नुम् से) । अर्थः—(सौ) सुँ परे होने पर (अनडुहः) अनडुह् शब्द का अवयव (नुँम्) नुम् हो जाता है। यहां यह सन्देह होता है कि चतुरनडुहोः० (२५६) सूत्र का सावनडुहः(२६०) सूत्र अपवाद है। क्योंकि दोनों का विषय एक है अर्थात् दोनों अनडुह् शब्द को आगम करते हैं। इन में से प्रथम (चतुरनडुहोः०) सम्पूर्ण सर्वनामस्थान में विहित होने से उत्सर्ग और दूसरा (सावनडुहः) केवल सर्वनामस्थानान्तर्गत 'सुं' में विहित होने से उस का अपवाद होने योग्य है। अतः सुं में सावनडुहः (२६०) सूत्र ही प्रवृत्त होना चाहिये, चतुरनडुहोः० (२५६) नहीं। क्योंकि उत्सर्ग की प्रवृत्ति अपवादविषय को छोड़ कर ही हुआ करती है—प्रकल्प्य चापवादविषयं तत उत्सर्गोऽभिनिविशते । इस का उत्तर यह है कि आच्छीनद्योर्नुम् (३६५) सूत्र से यहां 'आत्' की अनुवृत्ति आती है। जिस से —'सुं परे होने पर अनडुह् को नुँम् का आगम होता है परन्तु वह अवर्ण से परे होता है'—ऐसा अर्थ हो जाता है। तो अब यदि आम् का

३६० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां आगम नहीं करते तो अनडुह् शब्द में अवर्ण नहीं आ सकता, और यदि अवर्ण नहीं आता तो नुम् प्रवृत्त नहीं हो सकता। अतः नुम् को अपनी प्रवृत्ति के लिये विवश हो कर आम् को छूट देनी पड़ती है। अतः प्रथम आम् होकर पश्चात् नुम् होता है। इन में उत्सर्ग-अपवादभाव नहीं होता। अनड्वाह् + स्' यहां आकार से परे नुम् हो कर अनुबन्धों (उकार, मकार) के चले जाने पर—'अनङ्ख्ान् ह् + स्' हुआ। अब हल्ङ्याब्भ्य० (१७६) सूत्र से सकार का तथा संयोगाऽतस्य लोपः (२०) सूत्र से हकार का लोप हो कर 'अनड्वान्' प्रयोग सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि संयोगान्तलोप (८ २ २३) असिद्ध है अतः न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य (८ २ ७) सूत्र से नकार का लोप नहीं होगा। हे अनडुह् + स् (सुँ)। यहां सम्बुद्धि में आम् (२५६) प्राप्त होने पर उम का अपवाद अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है — [लघु०] विधि-सूत्रम्- (२६१) अम् सम्बुद्धौ ।७।१।६६॥ (चतुरनडुहोराम् स्यात्सम्बुद्धौ) । हे अनड्वन् ' । अनड्वाहौ । अनड्वाहः । अनडुहः । अनडुहा ॥ अर्थ.-सम्बुद्धि परे हो तो चतुर और अनडुह शब्दों का अवयव अम् हो। व्याख्या—चतुरनडुहोः।६।२। (चतुरनडुहोरामुदात्तः से)। अम् ।१।१। सम्बुद्धौ ।७।१। अर्थ —(सम्बुद्धौ) सम्बुद्धि परे होने पर (चतुरनडुहो ) चतुर और अनडुह का अवयव (अम्) अम् हो जाता है। यह सूत्र चतुरनडुहो० (२५६) सूत्र का अपवाद है। इस के प्रवृत्त होने पर भी सावनडुहः (२६०) द्वारा नुम् हो जाता है। क्योंकि वहां 'आत्' की अनुवृत्ति आने से वह अवर्ण से परे होता है। 'हे अनडुह + स्' यहां सम्बुद्धि परे है अतः मिदचोऽन्त्यात्परः (२४०) के नियमानुसार अम्सम्बुद्धौ (२६१) द्वारा अनडुहू के अन्त्य अच्-उकार से परे अम् का आगम हो कर यण् करने से 'अनड्वह् + स्' हुआ। पुनः सावनडुह (२६०) सूत्र से नुम् का आगम कर सकारलोप और संयोगान्तलोप करने से—'हे अनड्वन्' प्रयोग सिद्ध होता है। अनडुहू + औ = अनडु आम् ह् + औ = अनड्वाहो। अनड्वाहः । अनड्वाहम् । अनड्वाहौ । शस् मे सर्वनामस्थान परे न होने के कारण आम् का आगम नही होता —अनडुह । 'अनडुह + भ्याम्' यहां स्वादिष्वसर्वनामस्थाने (१६४) सूत्र से अनडुह की पदसञ्ज्ञा हो कर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि सूत्रम्-- (२६२) वसुंस्रंसुध्वंस्वनडुहां दः ।८।२।७२॥ सान्तवस्वन्तस्य स्रंसादेश्च दः स्यात्पदान्ते। अनडुद्भ्याम् इत्यादि । सान्तेति किम् ? विद्वान् । पदान्तेति किम् ? स्रस्तम्, ध्वस्तम् ॥

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३६१ अर्थः—पद के अन्त में सान्त वसुंप्रत्ययान्त को तथा स्रंसुं, ध्वंसु और अनडुह् शब्दों को दकार आदेश हो जाता है । व्याख्या—सः ।६।१। (ससजुषो रुः का एक अंश) । वसुंस्रंसुंध्वंस्वनडुहाम् ।६।३। पदानाम् ।६।३। (पदस्य इस अधिकृत का यहां वचनविपरिणाम हो जाता है) । दः ।१।१। समासः—वसुंश्च स्रंसुंश्च ध्वंसुंश्च अनड्वान् च = वसुंस्रंसुंध्वंस्वनडुहः, तेषाम् = वसुंस्रंसुंध्वंस्वनडुहाम्, इतरेतरद्वन्द्वः । 'सः' यह 'वसुं' अंश का ही विशेषण है । स्रंसुं और ध्वंसुं में किसी प्रकार का दोष न आने से तथा अनडुह् का असम्भव होने से विशेषण नहीं बन सकता । विशेषण होने से 'सः' से तदन्तविधि हो जाती है । शतृँ के स्थान पर आदेश होने से स्थानिवद्भाव से 'वसुं' भी प्रत्ययसञ्ज्ञक है अतः प्रत्यय होने से उस से भी तदन्तविधि हो जाती है । स्रंसुं आदि भी 'पद' के विशेषण होने से तदन्तविधि को प्राप्त होते है । अर्थः—(सः) सान्त (वसुंस्रंसुंध्वंस्वनडुहाम्) वसुंप्रत्ययान्त और स्रंसुं ध्वंसुं तथा अनडुह् अन्त वाले (पदानाम्) पदों को (दः) दकार आदेश होता है । दकार में अकार उच्चारणार्थ है, आदेश 'द्' ही होता है । अलोऽन्त्यपरिभाषा से यह दकारादेश पद के अन्त को ही होता है । 'अनडुह्+भ्याम्' यहां व्यपदेशिवद्भाव से अथवा पदाङ्गाधिकारे तस्य च तदन्तस्य च (पृष्ठ २१३) के अनुसार अनडुह् के अन्त्य हकार को प्रकृत सूत्र से दकार आदेश होकर 'अनडुद्भ्याम्' रूप सिद्ध होता है । इसी प्रकार भिस् में 'अनडुद्भिः' तथा भ्यस् में 'अनडुद्भ्यः' रूप बनता है । सुप् में दकारादेश हो कर खरि च (७४) से चर्त्व हो जाता है—अनडुत्सु । अनडुह् शब्द की रूपमाला यथा— प्रथमा अनड्वान् अनड्वाहौ अनड्वाहः द्वितीया अनड्वाहम् ,, अनडुहः तृतीया अनडुहा अनडुद्भ्याम् अनडुद्भिः चतुर्थी अनडुहे ,, अनडुद्भ्यः पञ्चमी अनडुहः ,, ,, षष्ठी ,, अनडुहोः अनडुहाम् सप्तमी अनडुहि ,, अनडुत्सु सम्बोधन हे अनड्वन्! हे अनड्वाहौ! हे अनड्वाहः! अब यहां यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि ससजुषो रुः (१०५) सूत्र से 'सः' पद की अनुवृत्ति ला कर 'वसुं' का विशेषण बना कर तदन्तविधि कर 'सान्त वस्वन्त' क्यों कहा गया है ? जब कि वह है ही सकारान्त ? इसका उत्तर यह है कि यदि 'सान्त' न कहते, केवल वस्वन्त को ही दकारादेश करते तो 'विद्वान्' यहां पर भी नकार को दकार आदेश हो जाता; क्योंकि यह भी वस्वन्त है । अब सूत्र में 'सान्त' कथन से कोई दोष नहीं आता, क्योंकि 'विद्वान्' यह सान्त नहीं किन्तु नान्त वस्वन्त है । 'विद्वान्' कैसे वस्वन्त है ? यह आगे 'विद्वस्' शब्द पर इसी प्रकरण में स्पष्ट हो जायेगा ।

३६२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां पदान्त अर्थात् पद के अन्त को आदेश कहने से 'स्रस् + तम् = स्रस्तम्, ध्वस्

  • तम् = ध्वस्तम्' यहां अपदान्त सकार को दकार आदेश नहीं होता। ध्यान रहे कि यहां क्रमशः स्रंसुँ ध्वंसुँ धातुओं से 'क्त' प्रत्यय हो कर अनिदितां हल उपधायाः० (३३४) सूत्र से अनुनासिक का लोप हुआ है। वस्रन्तो में दकारादेश के उदाहरण 'विद्वद्द्भ्याम्' आदि आगे आएंगे। स्रंसुँ, ध्वंसुँ दोनों भ्वादिगणीय सेट् आत्मनेपदी धातु हैं। एक का अर्थ 'गिरना' और दूसरे का अर्थ ध्वंस होना = 'नाश होना' है। इन के उदाहरण उखास्रस् और पर्णध्वस् शब्द हैं। यथा- उखास्रस् = बटलोई से गिरने वाला धान्यकण आदि। उखायाः स्रंसत इत्यु- खास्रत्। कर्तरि क्विप्, उपपदसमास। इस की रूपमाला यथा- प्र० उखास्रत्-द् उखास्रसौ उखास्रसः पं० उखास्रसः उखास्रद्भ्याम् उखास्रद्भ्यः द्वि० उखास्रसम् " " ष० " उखास्रसोः उखास्रसाम् तृ० उखास्रसा उखास्रद्भ्याम् उखास्रद्भिः स० उखास्रसि " उखास्रत्सु च० उखास्रसे " उखास्रद्भ्यः सं० हेउखास्रत्-द् ! उखास्रसौ ! उखास्रसः ! यहां सर्वत्र पदान्त में वसुस्रंसु० (२६२) से दत्व हो जाता है। पर्णध्वस् = पत्तों का नाश करने वाला। पर्णानि ध्वंसत इति पर्णध्वत्। क्विप्, उपपदसमास। [सिद्धि और अर्थ विशेषरूप से (८०२) सूत्र पर देखें]। रूपमाला यथा- प्रथमा पर्णध्वत्-द् पर्णध्वसौ पर्णध्वसः द्वितीया पर्णध्वसम् " " तृतीया पर्णध्वसा पर्णध्वद्भ्याम् पर्णध्वद्भिः चतुर्थी पर्णध्वसे " पर्णध्वद्भ्यः पञ्चमी पर्णध्वसः " " षष्ठी " पर्णध्वसोः पर्णध्वसाम् सप्तमी पर्णध्वसि " पर्णध्वत्सु सम्बोधन हे पर्णध्वत्-द् ! हे पर्णध्वसौ ! हे पर्णध्वसः ! यहां भी सर्वत्र पदान्त में पूर्ववत् दत्व हो जाता है। तुरासाह् = इन्द्र। तुरम् = वेगवन्तं साहयति = अभिभवति इति तुराषाट्। तुरकर्मोपपदान् षहँ मर्षणे (भ्वा० आ०) इत्यस्माद्धातो विवँप् च (८०२) इति क्विप्। उपपदसमास। अन्येषामपि दृश्यते (६ ३ १३६) इति दीर्घ। जो वेग वाले को दबा लेता है उसे 'तुरासाह्' कहते हैं। यह इन्द्र का नाम है। तुरासाह् + स् (सुँ)। यहां हल्ङ्याब्भ्य० (१७६) से सकारलोप हो कर हो ढः (२५१) सूत्र द्वारा हकार को ढकार तथा झलां जशोऽन्ते (६७) से ढकार को डकार करने पर-'तुरासाड्' हुआ। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है-

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३६३ [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२६३) सहेः साडः सः ।८।३।५६॥ साड्रूपस्य सहेः सस्य मूर्धन्यादेशः स्यात् । तुराषाट्, तुराषाड् । तुरासाहौ । तुरासाहः । तुराषाड्भ्याम् इत्यादि ॥ अर्थः—सह् धातु से बने 'साड्' शब्द के सकार को मूर्धन्य आदेश हो । व्याख्या—सहेः ।६।१। साडः ।६।१। सः ।६।१। मूर्धन्यः ।१।१। (अपदान्तस्य मूर्धन्यः से) । मूर्ध्नि भवः=मूर्धन्यः । शरीरावयवाच्च (१०६१) इति यत् । अर्थः— (सहेः) सह् धातु का जो (साडः) साड् उस के (सः) सकार के स्थान पर (मूर्धन्यः) मूर्धा स्थान वाला वर्ण हो जाता है । सकार के स्थान पर आन्तर्य से ईषद्विवृत प्रयत्न वाला षकार ही मूर्धन्य होता है । सह् का साड् रूप पदान्त में ही बनता है अतः पदान्त में सह् के सकार को मूर्धन्य आदेश हो—यह फलितार्थ हुआ । 'तुरासाड्' यहां 'साड्' यह सह् धातु से बना है । अतः इस के सकार को मूर्धन्य षकार हो कर वाऽवसाने (१४६) से वैकल्पिक चत्त्वं करने पर 'तुराषाट्, तुराषाड्' दो रूप बनते हैं । तमभ्यनन्दत्प्रणतं लवणान्तकमग्रजः । कालनेमिवधात्प्रीत- स्तुराषाडिव शार्ङ्गिणम् (रघु० १५.४०) । रूपमाला यथा— प्र० तुराषाट्-ड् तुरासाहौ तुरासाहः | प० तुरासाहः तुराषाड्भ्याम् तुराषाड्भ्यः द्वि० तुरासाहम् ,, ,, | प० ,, तुरासाहोः तुरासाहाम् तृ० तुरासाहा तुराषाड्भ्याम् तुराषाड्भिः | स० तुरासाहि ,, तुराषाट्सु, ड्सु च० तुरासाहे ,, तुराषाड्भ्यः | सं० हे तुराषाट्-ड् ! तुरासाहौ ! तुरासाहः ! इसी प्रकार—पृतनासाह्, प्रभृति शब्दों के रूप जानने चाहियें । (यहां हकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।) —:: o ::— यद्यपि हकारान्त शब्दों के अनन्तर प्रत्याहारक्रम से यकारान्त शब्द आने चाहियें थे तथापि उन का विरलप्रयोग¹ तथा उन में किसी प्रकार का विशेषकार्य होता न देख कर ग्रन्थकार उन्हें छोड़ कर वकारान्त शब्दों का निरूपण करते हैं । सुदिव् =अच्छे अर्थात् निर्मल आकाश वाला दिवस (दिन) आदि या अच्छे स्वर्ग वाला पुरुष आदि । 'दिव्' शब्द नित्यस्त्रीलिङ्ग है । इस का अर्थ आकाश वा स्वर्ग है । द्यो-दिवौ द्वे स्त्रियाम् इत्यमरः । सु=शोभना द्योः=आकाशो नाको वा यस्य स सुद्यौः । इस प्रकार बहुव्रीहि-समास में 'सुदिव्' शब्द पुंल्लिङ्ग हो जाता है । प्रातिपदिक सञ्ज्ञा हो कर इस से स्वादि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं— सुदिव् + स् (सुँ) में हल्ङ्याब्भ्योः० (१७६) से सकारलोप प्राप्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२६४) दिव औत् ।७।१।८४॥ दिव् इति प्रातिपदिकस्य औत् स्यात् सौ । सुद्यौः । सुदिवौ ॥ १. यथा व्याकरण में अय्, आय्, मय्, चय्, यय् आदि ।

३६४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां

अर्थ—सुँ परे होने पर 'दिव्' इस प्रातिपदिक को औकार आदेश हो जाता है। व्याख्या—दिव् ।६।१। औत् ।१।१। सौ ।७।१। (सावनडुहः से) । संस्कृत में दो 'दिव्' शब्द हैं। एक अव्युत्पन्न प्रातिपदिक और दूसरा 'दिवुँ क्रीडा-विजिगीषा०' (दिवा० प०) यह धातु। इस सूत्र में 'दिव्' इस अव्युत्पन्न प्रातिपदिक का ही ग्रहण होता है दिवुँ धातु का नहीं। इस में कारण यह है कि—निरनुबन्धकग्रहणे न सानु- बन्धकस्य (परिभाषा) अर्थात् यदि निरनुबन्ध (अनुबन्धहीन) का ग्रहण सूत्र में हो तो सानुबन्ध (अनुबन्धसहित) का ग्रहण नहीं करना चाहिये। यहां सूत्र में 'दिव्' में उकारानुबन्धसहित 'दिव्' का ग्रहण किया है, अतः 'दिव्' इस प्रातिपदिक निरनु- बन्ध का ही ग्रहण होगा, सानुबन्ध 'दिवुँ' का नहीं। 'औत्' में तकार उच्चारणार्थ है, आदेश 'औ' ही होता है। यदि तकार भी साथ आदेश होता तो अनेकाल् होने से सर्वादेश हो जाता। अर्थ—(दिव्) दिव् इस प्रातिपदिक के स्थान पर (औत्) 'औ' आदेश हो (सौ) सुँ परे होने पर। यह सूत्र अङ्गाधिकार में पढ़ा गया है अतः दिव् और दिव्शब्दान्त दोनों को औकार आदेश होगा। ध्यान रहे कि अलोऽन्त्यपरिभाषा से दिव् के वकार को ही औकार आदेश होगा। 'सुदिव् + सुँ' यहां 'सुँ' परे है अतः प्रकृत-सूत्र से वकार को औकार करने पर इको यणचि (१५) से इकार को यकार हो कर रुत्व विसर्ग करने से 'सुद्यौः' प्रयोग सिद्ध होता है¹। सुदिव् + औ = सुदिवौ। सुदिव् + अस् (जस्) = सुदिवः। सुदिवम्। सुदिवौ। सुदिव् + अस् (शस्) = सुदिवः। 'सुदिव् + भ्याम्' में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि सूत्रम्—(२६५) दिव उत् ।६।१।१२७॥ दिवोऽन्तादेश उकारः स्यात्पदान्ते। सुद्युभ्याम्। इत्यादि॥ अर्थ—पद के अन्त में दिव् को उकार अन्तादेश हो। व्याख्या—दिवः ।६।१। उत् ।१।१। पदान्ते ।७।१। (एङ् पदान्तादति से वि- भक्तिविपरिणाम द्वारा)। अर्थ—(पदान्ते) पदान्त में (दिव्) दिव् शब्द के स्थान पर (उत्) ह्रस्व उकार आदेश हो। अलोऽन्त्यपरिभाषा से दिव् के अन्त्य अल् वकार को


१ 'सुदिव् + सुँ' में औकारादेश तथा सुँलोप युगपत् प्राप्त होते हैं। परन्तु औकारा- देश नित्य और सुँलोप अनित्य होने से प्रथम औकारादेश हो जाता है। जो विधि दूसरे के प्रवृत्त होने या न होने पर भी समानरूप से प्रवृत्त हो वह दूसरे की अपेक्षा नित्य होती है। जैसा कि कहा है—कृताकृतप्रसङ्गी यो विधिः स नित्यः (परि०)। यहां सुँलोप कर देने पर भी प्रत्ययलक्षण द्वारा सुँ को मान कर औकारादेश हो सकता है अतः औकारादेश नित्य है। परन्तु औकारादेश कर देने पर हल् न होने से सुँलोप नहीं हो सकता अतः सुँलोप अनित्य है। नित्य और अनित्य में नित्य ही बलवान् होता है।

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३६५ ही उकार आदेश होगा। ध्यान रहे कि यहां भी पूर्ववत् दिव् प्रातिपदिक का ही ग्रहण किया जाता है। 'सुदिव् + भ्याम्' में स्वादिष्वसर्वनामस्थाने (१६४) द्वारा पदत्व के कारण वकार को उकारादेश तथा इको यणचि (१५) से यण् हो—'सुद्युभ्याम्'। इसी प्रकार भिस्, भ्यस् और सुप् में भी होता है। रूपमाला यथा— प्र० सुद्यौः सुदिवौ मुदिवः | प० सुदिवः सुद्युभ्याम् सुद्युभ्यः द्वि० सुदिवम् " " | ष० , सुदिवोः सुदिवाम् तृ० मुदिवा सुद्युभ्याम् मुद्युभिः | स० मुदिवि " सुद्युषु च० सुदिवे " सुद्युभ्यः | सं० हे सुद्यौः ! हे सुदिवौ ! हे सुदिवः ! इसी प्रकार प्रियदिव्, अतिदिव् आदि शब्दों के रूप होते हैं। (यहां वकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) ———:: o ::——— अभ्यास (३८) (१) अनडुह् और विश्ववाह् शब्दों के जस् और शस् में रूप सिद्ध करें। (२) अनड्वान् और अनड्वन् में, सुदिवोः और सुद्योः में, लिट् और स्निट् में, मुद्युभ्याम् और धुग्भ्याम् में प्रक्रियासम्बन्धी अन्तर ससूत्र दर्शाएं। (३) 'सूत्रशाटकन्याय' किसे कहते हैं ? व्याकरण में इस का कहां और कैसे उपयोग होता है ? (४) निम्नलिखित वचनों का जहां तक हो सके सोदाहरण विवेचन करें— १. निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः। २. प्रकल्प्य चापवादविषयं ततः० ३. निरनुबन्धकग्रहणे न० । ४. अपवादो वचनप्रामाण्यात् । ५. इतरे- तराश्रयाणि कार्याणि न० । ६. कृताकृतप्रसङ्गी यो विधिः स नित्यः । ७. क्विब्वन्ता विडन्ता विंजन्ता शब्दों धातुत्वं न जहति । (५) तुराषाट्, सुद्युभ्याम्, ध्रुक्षु, विश्वौहि, उखास्रद्भ्याम्, स्निक्—इन रूपों की सूत्रनिर्देशपूर्वक सिद्धि करें। (६) (क) चतुरनडुहोः० और सावनडुहः सूत्रों में क्या उत्सर्ग-अपवादभाव है ? (ख) 'लिट्सु' में तकार को थकार क्यों नही होता ? (ग) 'सुद्यौः' में औकारादेश करने से पूर्व सुँलोप क्यों नही हो जाता ? (घ) दिव औत् में 'दिवुँ' धातु का ग्रहण क्यों नहीं रेफ को ही विसर्ग (ङ) 'मूर्धन्यः' शब्द का क्या विग्रह और क्या अ (७) १. एकाचो वशो भष्० । २. दादेर्धातोर्घः । ३. इति प्रत्याहारस्येष्ट- वसुस्रंसुध्वंस्वनडुहां दः । अभिषेति बोध्यम्।

३६६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां [लघु०] चत्वारः । चतुरः । चतुर्भिः । चतुर्भ्यः २ ॥ व्याख्या—अब रेफान्त पुंल्लिङ्ग 'चतुर्' (चार, सङ्ख्येयवाची) शब्द का वर्णन करते हैं। चतेरुरन् (उणा० ७३६) सूत्र से चतुर् शब्द की निष्पत्ति होती है। 'चतुर्' शब्द नित्यबहुवचनान्त होता है। 'चतुर् + अस्' (जस्) यहां 'जस्' यह सर्वनामस्थान परे है, अतः चतुरनडुहो- रामुदात्तः (२५६) सूत्र से आम् का आगम हो कर इको यणचि (१४) से यण् तथा सकार को रुत्व-विसर्ग करने पर 'चत्वारः' प्रयोग सिद्ध होता है। चतुर् + शस् (शस्) = चतुरः । सर्वनामस्थान न होने से आम् न होगा। चतुर् + भिस् – चतुर्भिः । चतुर् + भ्यस् = चतुर्भ्यः । चतुर् + आम्। यहां ह्रस्वादि के न होने से ह्रस्वनद्यापो नुट् (१४८) द्वारा नुट् प्राप्त नहीं हो सकता, अतः इस की सिद्धि के लिये अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२६६) षट्चतुर्भ्यश्च ।७।१।५५॥ एभ्य आमो नुडागमः ॥ अर्थ —षट्सञ्ज्ञको तथा चतुर् शब्द से परे आम् को नुट् का आगम हो। व्याख्या —षट्चतुर्भ्यः ।५।३। च इत्यव्ययपदम्। आम् ।६।१। (आमि सर्व- नाम्नः सुट् से । यहां उभयनिर्देशे पञ्चमीनिर्देशो बलीयान् द्वारा षष्ठ्यन्ततया विपरि- णाम हो जाता है)। नुट् ।१।१। (ह्रस्वनद्यापो नुट् से)। अर्थ —(षट्चतुर्भ्यः) षट्- सञ्ज्ञकों से तथा चतुर् शब्द से परे (च) भी (आम् ) आम् का अवयव (नुट्) नुट् हो जाता है। नुट् टित् है अतः आम् का आद्यवयव होगा। इसी प्रकरण में आगे (२६७) सूत्र से षट्सञ्ज्ञा की जायेगी, यहां उसी का ग्रहण है। चतुर् शब्द की षट्सञ्ज्ञा नहीं होती अतः इस का पृथक् ग्रहण किया है। चतुर् + आम् । यहां प्रकृत-सूत्र से नुट् का आगम हो कर 'चतुर् + नाम्' हुआ। अब अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि सूत्रम्—(२६७) रषाभ्यां नो णः समानपदे ।८।४।१॥ (एकपदस्थाभ्यां रेफषकाराभ्यां परस्य नस्य णः स्यात्) । अचो रहा- भ्यां द्वे (६०) – चतुर्ण्णाम्, चतुर्णाम् ॥ अर्थ —एक पद में स्थित रेफ वा षकार से परे नकार को णकार आदेश हो। व्याख्या—रषाभ्याम् ।५।२। नः ।६।१। णः ।१।१। समानपदे ।७।१। समान- ञ्चात् पदम् = समानं पदम् । कर्मधारयसमास । रश्च षश्च = रषौ, ताभ्याम् = रषा- भ्याम् । अपेक्षा नित्य होता रेफादकारः षकाराच्चाकारश्चोच्चारणार्थः । 'ण' इत्यत्राप्य- (परि०) । यहां कार उच्चारणार्थः । रेफ वा धेय । अर्थ—(समानपदे) एक पद में (रषाभ्याम्) रेफ वा षकारादेश हो सन् स्थान पर (ण ) ण् आदेश हो । [र् + न = र्ण, ष् + न = ष्ण] पर हल् न होने से पूर्वोक्त नहीं हो सकता का ही ग्रहण होता है। अतः 'अग्नि- अनित्य से नित्य ही बलवान् होता है। [arrow] न' में णकारादेश न होगा।

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३६७

इस सूत्र के उदाहरण—आस्तीर्णम्, अवगीर्णम्, कृष्णाति, पुष्णाति आदि हैं । अप्तृन्---प्रशास्तॄणाम् (२०६) आदि प्रयोगों¹ तथा क्षुम्नादिगण (८.४.३६) में 'नृनमन, तृन्' को णत्व-निषेध करने से यहां रेफ और षकार की तरह ऋवर्ण को भी णत्व का निमित्त मानना चाहिये । इस के उदाहरण—'मातॄणाम्, पितॄणाम्' आदि हैं । ऋवर्णान्नस्य णत्वं वाच्यम् (वा० २१) इसी का अनुवाद है । 'चतुर् + नाम्' यहां प्रकृतसूत्र से नकार को णकारादेश हो कर 'चतुर्णाम्' हुआ । अब अचो रहाभ्यां द्वे (६०) सूत्र से णकार को वैकल्पिक द्वित्व करने मे— 'चतुर्ण्णाम्, चतुर्णाम्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। नोट—यहां णत्व करते समय प्रायः सुबोध विद्यार्थियों को सन्देह हुआ करता है कि 'चतुर्णाम्' में तो अट्कुप्वाङ्० (१३८) से ही णत्व हो सकता है, क्योंकि वहां 'व्यवाधानेऽपि णत्वं स्यात्' कहा है । अर्थात् व्यवधान होने पर भी णत्व हो जाता है । इस से यह विदित होता है कि यदि व्यवधान न होगा तब तो अवश्य ही हो जायेगा । 'पुष्णाति, मुष्णाति' आदियों में ष्टुत्व से भी णत्व सिद्ध हो सकता है । अतः यह सूत्र निरर्थक है । परन्तु तनिक ध्यान देने पर इस की उपयोगिता स्पष्ट समझ में आ जाती है । अष्टाध्यायी में प्रथम यह सूत्र और तदनन्तर अट्कुप्वाङ्० (१३८) सूत्र पढ़ा गया है । अट्कुप्वाङ्० (१३८) सूत्र में पूर्णरूपेण यह सूत्र अनुवर्त्तित होता है। यदि यह सूत्र न बनाते तो उस में अनुवृत्ति कहां से आती ? 'पुष्णाति, मुष्णाति' आदियों में यद्यपि ष्टुत्व से सिद्धि हो सकती है; तथापि अट् आदि के व्यवधान में णत्वसिद्धि के लिये उस का ग्रहण अवश्य प्रयोजनीय है । अन्यथा 'पुरुषेण, पुरुषाणाम्' आदि सिद्ध न हो सकेंगे । सप्तमी के बहुवचन 'चतुर् + सु' में खर् परे होने से खरवसानयोः० (६३) द्वारा रेफ को विसर्ग आदेश प्राप्त है । इस पर अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] नियम-सूत्रम्—(२६८) रोः सुपि ।८।३।१६॥ रोरेव विसर्गः सुपि । षत्वम् । षस्य द्वित्वे प्राप्ते— अर्थः—सप्तमी के बहुवचन 'सुप्' के परे होने पर रुँ के स्थान पर ही विसर्ग आदेश हो (अन्य रेफ के स्थान पर न हो) । व्याख्या—रोः ।६।१। सुपि ।७।१। विसर्जनीयः ।१।१। (खरवसानयोर्विसर्जनीयः से) । अर्थः—(सुपि) सप्तमी का बहुवचन 'सुप्' प्रत्यय परे होने पर (रोः) रुँ के स्थान पर (विसर्जनीयः) विसर्जनीय आदेश हो । सुप् परे होने पर रुँ (र्) के स्थान पर विसर्गादेश खरवसानयोः० (६३) सूत्र से ही सिद्ध है, पुनः इस का आरम्भ नियमार्थ ही है—सिद्धे सत्यारम्भो नियमार्थः । अर्थात् सुप् परे होने पर रुँ के रेफ को ही विसर्ग आदेश हो अन्य रेफ को न हो । १. न लोकाव्ययनिष्ठाखलर्थतृनाम् (२.३.६९) इत्यादिषु तु तृन् इति प्रत्याहारस्येष्ट- त्वाद् णत्वाभावो जिघृक्षितरूपविनाशभियेति बोध्यम् ।

३६८ भामीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां 'चतुर्+सु' यहां 'रु' का रेफ नहीं अतः विसर्ग आदेश न हुआ । आदेश- प्रत्यययो (१५०) द्वारा सकार को षकार कर—'चतुर्षु' । अब यहां अचो रहाभ्यां द्वे (६०) द्वारा षकार को वैकल्पिक द्वित्व प्राप्त होने पर निषेध करते हैं— [लघु०] निषेध-सूत्रम् -- (२६६) शरोऽचि ॥८।४।४६॥ अचि परे शरो न द्वे स्त । चतुर्षु ॥ अर्थ - अच् परे हो तो शर् को द्वित्व नहीं होता । व्याख्या - अचि ।७।१। शर् ।६।१। न इत्यव्ययपदम् । (नादिन्याक्रोशे पुत्रस्य मे) । द्वे ।१।२। (अचो रहाभ्यां द्वे स) । अर्थ - (अचि) अच् परे होने पर (शर् ) शर् के स्थान पर (द्वे) दो शब्दस्वरूप (न) न हों । 'चतुर्षु' यहां उकार अच् परे है अतः षकार शर् को द्वित्व नहीं होता । इस सूत्र के कुछ अन्य उदाहरण यथा— १ दर्शनम् । २ स्पर्शनम् । ३ आर्षम् । ४ वर्षणम् । ५ चिकीर्षा । ६ जिहीर्षा । ७ मुमूर्षा । ८ पर्शु । ९ अर्श । १० घर्षणम् । ११ वर्षक । १२ वर्षुक । १३ कार्षापणम् । १४ वर्षा । १५ हर्ष । इत्यादि ।१ निम्नलिखित स्थलों में अच् परे न होने से निषेध नहीं होता । अनचि च (१८) अथवा अचो रहाभ्यां द्वे (६०) से द्वित्व हो जाता है— १ ष्प्फन । २ वाष्प्पिन । ३ दश्य॑न्ते । ४ भीष्ष्म । ५ यष्टि । ६ अररव । ७ अररमरी । ८ अरदनानि । ६ दमशू । १० अशिश्रवी । ११ अप्टो । १२ विश्रान्त । १३. ईप्स्यति । १४ अस्स्यम् । १५ नास्स्ति । इत्यादि । अच् परे होने पर भी शर् से अतिरिक्त वर्ण (यर्) को द्वित्व हो ही जायेगा— १ अर्कै । २ अर्थ्य । ३ निर्झर ४ दुर्ग । ५ द्ववर्ग । ६ मूवर्ख । ७ निर्भर । ८ मूर्च्छना । ६ ऊर्म्मि । १० विमार्ग । ११ अर्जुन । १२ उर्वी । १३ आर्य्य । १४ अर्घ्यं । १५ ऊर्द्धवम् । इत्यादि । 'चतुर' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० ० ० चत्वार | प० ० ० चतुर्भ्य द्वि० ० ० चतुर | ष० ० ० चतुर्णाम्, चतॄणाम् तृ० ० ० चतुर्भिः | स० ० ० चतुर्षु च० ० ० चतुर्भ्य संख्यावाचकों का सम्बोधन नहीं होता । इसी प्रकार 'परमचतुर्' आदि शब्दों के रूप होते हैं । (यहां रेफान्त पुँल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।) अब मकारान्त पुल्लिंग शब्दा का वर्णन किया जाता है । १ इस सूत्र का निषेध शकार और षकार तक ही सीमित रहता है । सकार के द्वित्व का प्रसङ्ग कहीं नहीं प्राप्त होता [विशेष स्वयं विचार करें] ।

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३६६ प्रपूर्वक शमुँ उपशमे (दिवा० प०) धातु से क्विँप्, अनुनासिकस्य क्विझलोः० (७२७) से उपधा-दीर्घ करने कर 'प्रशाम्' (शान्त) शब्द निष्पन्न होता है । प्रशाम् + स् (सुँ) । यहां सकारलोप हो कर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२७०) मो नो धातोः ॥८।२।६४॥ धातोर्मस्य नः पदान्ते । प्रशान् । प्रशान्भ्याम् इत्यादि ॥ अर्थः—पदान्त में धातु के मकार को नकार आदेश हो । व्याख्या—धातोः ।६।१। मः ।६।१। नः ।१।१। पदस्य ।६।१। (यह अविकृत है) । अन्ते ।७।१। (स्कोः संयोगाद्योरन्ते च से) । अर्थः—(पदस्य) पद के (अन्ते) अन्त में (धातोः) धातु के (मः) मकार के स्थान पर (नः) न् आदेश होता है¹ । 'प्रशाम्' यहां एकदेशविकृतमनन्यवत् के अनुसार 'शम्' धातु का मकार है अतः प्रकृत-सूत्र से इसे नकार आदेश हो कर—'प्रशान्' प्रयोग सिद्ध होता है । ध्यान रहे कि यह नकारादेश (८.२.६४) न लोपः० (८.२.७) की दृष्टि में असिद्ध है अतः उसे यहां मकार ही दिखाई देता है इस से नकार का लोप नहीं होता । 'प्रशाम्' (शान्त) शब्द की रूपमाला यथा— प्र० प्रशान् प्रशामौ प्रशामः | प० प्रशामः प्रशान्भ्याम् प्रशान्भ्यः द्वि० प्रशामम् ,, ,, | ष० ,, प्रशामोः प्रशामाम् तृ० प्रशामा प्रशान्भ्याम् प्रशान्भिः | स० प्रशामि ,, प्रशान्त्सु, -न्सु† च० प्रशामे ,, प्रशान्भ्यः | सं० हे प्रशान्! हे प्रशामौ! हे प्रशामः! † यहां मो नो धातोः सूत्र द्वारा नकार आदेश हो कर नश्च (८७) सूत्र से वैकल्पिक धुट् का आगम हो जाता है । धुट्पक्ष में खरि च (७४) से चर्व्व हो कर 'प्रशान्त्सु' और धुट् के अभाव में 'प्रशान्सु' बन जाता है । इसी प्रकार—प्रदाम्, प्रताम्, प्रकामृ प्रभृति शब्दों के रूप बनते हैं । किम् [कौन । कायतेर्डिमः (५६७) इत्युणादिसूत्रेण साधुः] । 'किम्' शब्द सर्वादिगणपठित है, अतः सर्वादीनि सर्वनामानि (१५१) सूत्र से इस की सर्वनामसञ्ज्ञा हो जाती है । यह शब्द त्रिलिङ्गी है यहां पुंल्लिङ्ग का प्रकरण होने से पुंल्लिङ्ग में रूप दिखाए जायेंगे । 'किम् + स्' (सुँ) यहां हल्ङ्याब्भ्योः० (१७६) से सकार का लोप प्राप्त होने पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२७१) किमः कः ॥७।२।१०३॥ किमः कः स्याद्विभक्तौ । कः । कौ । के । इत्यादि । शेषं सर्ववत् ॥ १. 'मः' इति 'धातोः' इत्यस्य विशेषणत्वे तदन्तविधिना 'मकारान्तस्य धातोर्नकारा- देशः स्यात्पदान्ते' इत्यर्थो निष्पद्यते । तदाऽलोऽन्त्यविधिनेऽन्त्यमकारस्य नकारा- देश उन्नेतव्यः । ल० प्र० (२४)

३७० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां अर्थः—विभक्ति परे होने पर किम् के स्थान पर 'क' आदेश हो । व्याख्या—किम ।६।१। क ।१।१। विभक्तौ ।७।१। (अष्टन आ विभक्तौ से) । अर्थ —(विभक्तौ) विभक्ति परे होने पर (किम ) 'किम्' शब्द के स्थान पर (क ) 'क' आदेश हो । 'क' आदेश सस्वर होने से अनेकाल् है अत अनेकाल्परिभाषा (४५) से सम्पूर्ण 'किम्' के स्थान पर होगा । इस से सर्वत्र स्वादियो में किम् को 'क' आदेश हो सर्वशब्दवत् प्रक्रिया होती है । ध्यान रहे कि 'क' आदेश स्थानिवद्भाव से सर्वनामसञ्ज्ञक है । रूपमाला यथा— प्र० क कौ के† प० कस्मात्* काभ्याम् केभ्य द्वि० कम् ,, कान् ष० कस्य कयो केषाम् × तृ० केन काभ्याम् कैः स० कस्मिन्* ,, केषु च० कस्मै† ,, केभ्य सम्बोधन नही होता । † जस शी (१५२) । † सर्वनाम्न स्मै (१५३) । *ङसिंङ्यो स्मात्स्मिनौ (१५४) । ×आमि सर्वनाम्नः सुँट् (१५५) । इदम् = यह (निकटतम)¹ । इन्देः कमिर्नलोपश्च (उणा० ५६६) इति सिद्ध्यति । 'इदम्' शब्द भी सर्वादिगण में पठित होने से सर्वनामसञ्ज्ञक है । यह त्रिलिङ्गी है । यहा पुल्लिङ्ग का प्रकरण होने से पुल्लिङ्ग में रूप दर्शाए जाते हैं— इदम् + सु (सुँ) । यहा त्यदादीनामः (१६३) सूत्र से 'इदम्' के मकार को अकार प्राप्त होता है । इस पर अग्रिमसूत्र निषेध करता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्— (२७२) इदमो मः ।७।२।१०८॥ इदमो मस्य म स्यात्सी परे । त्यदाद्यत्वापवाद ॥ अर्थः—सुँ परे होने पर इदम् शब्द के मकार को मकार आदेश हो । त्यदाद्य- त्वापवाद —यह सूत्र त्यदादियो के स्थान पर होने वाले अत्व का अपवाद है । व्याख्या—इदम ।६।१। म ।१।१। (मकारादकार उच्चारणार्थ ) । सौ ।७।१। (तदोः स सावनन्त्ययो से) । अर्थ —(इदम ) इदम् शब्द के स्थान पर (मः) म् आदेश हो (सौ) सुँ परे होने पर । यह मकारादेश अलोऽन्त्यपरिभाषा से इदम् शब्द के अन्त्य अल् = मकार के स्थान पर ही होता है । मकार को पुनः मकार आदेश करने का तात्पर्य त्यदादीनाम (१६३) सूत्र द्वारा प्राप्त अकारादेश का निषेध करना है, अर्थात् इदम् का मकार मकाररूपेण ही स्थित रहता है, सुं परे होने पर उसके स्थान पर अन्य कुछ आदेश नही होता । १ इदमस्तु सन्निकृष्टे, समीपतरवत्ति चैतदो रूपम् । अदसस्तु विप्रकृष्टे, तदिति परोक्षे विजानीयात् ॥ इदम् शब्द का प्रयोग निकटतम—जिसे अङ्गुली से बताया जा सके—के लिए एतद् का निकटतर के लिये, अदस् का दूरस्थ के लिये और तद् का परोक्ष—जो दिखाई न दे—के लिये होता है ।

५. तिङन्त प्रकरण (दश लकार, भ्वादि-प्रभृति दश गण रूप-साधन)

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३७१ इस सूत्र से 'इदम् + स्' यहां अत्व नहीं होता । अब अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम् — (२७३) इदोऽय् पुंसि ।७।२।१११॥ इदम इदोऽय् स्यात्सौ पुंसि । सोर्लोपः । अयम् । त्यदाद्यत्वे— अर्थः — सुं परे हो तो पुंल्लिङ्ग में 'इदम्' के 'इद्' को 'अय्' आदेश हो । व्याख्या—इदमः ।६।१। (इदमो मः से) । इदः ।६।१। अय् ।१।१। पुंसि ।७।१। सौ ।७।१। (यः सौ से) । अर्थः—(सौ) सुं परे होने पर (पुंसि) पुंल्लिङ्ग में (इदमः) इदम् शब्द के अवयव (इदः) इद् के स्थान पर (अय्) अय् आदेश हो । अनेकाल्परि- भाषा द्वारा अय् आदेश सम्पूर्ण इद् के स्थान पर होगा । ग्रहणसामर्थ्य से यकार का लोप न होगा, किञ्च प्रयोजनाभाव से इत्सञ्ज्ञा भी न होगी¹ । 'इदम् + स्' यहां पुंल्लिङ्ग में प्रकृतसूत्र से इद् को अय् आदेश हो कर 'अय् अम् + स्' हुआ । अब हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६) से सकार का लोप करने पर 'अयम्' प्रयोग सिद्ध होता है । 'इदम् + औ' यहां सुं परे नहीं है अतः इदमो मः (२७२) प्रवृत्त न होगा, त्यदादीनामः (१६३) सूत्र से मकार को अकार आदेश हो कर 'इद अ + औ' हुआ । अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्— (२७४) अतो गुणे ।६।१।९७॥ अपदान्तादतो गुणे पररूपमेकादेशः ॥ अर्थः—अपदान्त अत् से गुण परे हो तो पूर्वपर के स्थान पर पररूप एकादेश हो। व्याख्या—अपदान्तात् ।५।१। (उस्यपदान्तात् से) । अतः ।५।१। गुणे ।७।१। पूर्वपरयोः ।६।२। एकम् ।१।१। (एकः पूर्व-परयोः यह अधिकृत है) । पररूपम् ।१।१। (एङि पररूपम् मे) । अर्थः—(अपदान्तात्) अपदान्त (अतः) अत् से परे (गुणे) गुणसञ्ज्ञक वर्ण हो तो (पूर्व-परयोः) पूर्व + पर के स्थान पर (एकम्) एक (पर- रूपम्) पररूप आदेश हो । अदेङ् गुणः (२५) के अनुसार 'अ, ए, ओ' ये तीन वर्ण गुणसञ्ज्ञक हैं । यह सूत्र सवर्णदीर्घ तथा वृद्धि आदि का अपवाद है । उदाहरण यथा — पच् + अन्ति = पच् 'अ' न्ति = पचन्ति । यज् + अन्ति = यज् 'अ' न्ति = यजन्ति । एध + ए = एध् 'ए' = एधे । यदि अत् पदान्त होगा तो पररूप न होगा । यथा—दैत्य + अरि = दैत्यारिः, दीर्घ + एकार = दीर्घेकारः । दीर्घ + ओकार = दीर्घौकारः । इन में समास के कारण विभक्ति का लुक् होने से प्रत्ययलक्षण के कारण अत् पदान्त है । अतः पररूप नहीं होता । 'इद अ + औ' यहां दकारोत्तर अपदान्त अत् से परे 'अ' यह गुण विद्यमान है; अतः पूर्व (अ) और पर (अ) दोनों के स्थान पर एक पररूप 'अ' हो कर 'इद + औ' हुआ । अब अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— १. पुंसीति किम् ? इयं ब्राह्मणी । साविति किम् ? इमौ पुत्रौ ।

३७२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२७५) दश्च ।७।२।१०६॥ इदमो दस्य मः स्याद्विभक्तौ । इमौ । इमे । त्यदादेः सम्बोधनं नास्ती- त्युत्सर्गः ॥ अर्थः—विभक्ति परे होने पर इदम् शब्द के दकार को मकार आदेश हो । त्यदादेरिति—सामान्यतया त्यद् आदि शब्दों का सम्बोधन नहीं होता । व्याख्या—विभक्तौ ।७।१। (अष्टन आ विभक्तौ से) । इदम् ।६।१। म ।१।१। (इदमो मः से । मकारादकार उच्चारणार्थः) । दः ।६।१। च इत्यव्ययपदम् । अर्थ— (विभक्तौ) विभक्ति परे होने पर (इदमः) इदम् शब्द के (दः) द् के स्थान पर (मः) म् आदेश हो । 'इद + औ' यहां विभक्ति 'औ' परे है अतः प्रकृतसूत्र से दकार को मकार हो कर 'इम+औ' हुआ । अब रामशब्दवत् पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होने पर नादिचि (१२७) सूत्र से उस का निषेध हो जाता है । पुनः वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि एकादेश करने पर 'इमौ' प्रयोग सिद्ध होता है । 'इदम् + अस्' (जस्) । यहां त्यदाद्यत्व, पररूप तथा दश्च (२७५) सूत्र से दकार को मकार आदेश हो कर 'इम + अस्' हुआ । अब एकदेशविकृतन्याय से 'इम' शब्द की भी सर्वादीनि सर्वनामानि (१५१) से सर्वनामसञ्ज्ञा हो जाती है । तब जसः शी (१५२) से जस् को शी आदेश हो कर अनुबन्धलोप तथा गुण एकादेश करने पर—'इमे' प्रयोग सिद्ध होता है । त्यदादियों [त्यद्, तद्, यद्, एतद्, इदम्, अदम्, एक, द्वि, युष्मद्, अस्मद्, भवतु, किम्] का सम्बोधन प्रायः नहीं हुआ करता । 'प्रायः' इसलिये कहा है कि भाष्य में कहीं २ 'हे स' आदि प्रयोग भी प्राप्त होते हैं । मूल का अक्षरार्थ यह है—(त्य- दादेः) त्यदादिगण का (सम्बोधनम्) सम्बोधन (नास्ति) नहीं होता (इति) यह (उत्सर्गः) सामान्य नियम है । 'इदम्' शब्द के सम्बोधन में भी वही रूप बनेंगे जो उस के प्रथमा में बनते हैं । परन्तु लोक में इन का प्रयोग कहीं नहीं देखा जाता । 'इदम् + अम्' यहां त्यदाद्यत्व, पररूप, दश्च (२७५) से दकार को मकारादेश तथा अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप करने पर 'इमम्' प्रयोग सिद्ध होता है । 'इदम् + अस् (शस्) । त्यदाद्यत्व, पररूप, दकार को मकारादेश तथा पूर्वसवर्ण- दीर्घ कर सकार को नकारादेश करने से 'इमान्' प्रयोग सिद्ध होता है । 'इदम् + आ' (टा) । यहां त्यदाद्यत्व तथा पररूप हो कर 'इद + आ' इस स्थिति में अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२७६) अनाप्यकः ।७।२।११२॥ अककारस्येदम इदोऽन् आपि विभक्तौ । आप् इति प्रत्याहारः । अनेन ॥ अर्थ —ककाररहित इदम् शब्द के 'इद्' भाग को 'अन्' आदेश हो तृतीयादि विभक्ति परे हो तो ।

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३७३ व्याख्या—अकः ।६।१। इदमः ।६।१। (इदमो मः से) । इदः ।६।१। (इदोऽय् पुंसि से) । अन् ।१।१। आपि ।७।१। विभक्तौ ।७।१। (अष्टन आ विभक्तौ से) । यहां 'आप्' यह 'टा' के आकार से 'सुप्' के पकार तक प्रत्याहार समझना चाहिये । इस प्रकार तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी, षष्ठी, और सप्तमी—इन पञ्च विभक्तियों में स्थित सब प्रत्ययों का 'आप्' शब्द से ग्रहण होता है । नास्ति क् (ककारः) यस्मिन् सः= अकू, तस्य = अकः, बहुव्रीहिसमासः । अर्थः— (अकः) ककार-रहित (इदमः) इदम् शब्द के (इदः) इद भाग के स्थान पर (अन्) अन् आदेश हो (आपि) तृतीयादि (विभक्तौ) विभक्ति परे हो तो । 'इदम्' शब्द में जब अव्ययसर्वनाम्नाकच्प्राक्टेः (१२२६) सूत्र से अकच् प्रत्यय किया जाता है तब वह 'इदकम्' इस प्रकार ककार- सहित हो जाता है। तब 'अन्' आदेश के निषेध के लिये सूत्र में 'अकः' (ककाररहित) कहा है । ध्यान रहे कि 'अन्' आदेश अनेकाल् होने से सम्पूर्ण 'इद' भाग के स्थान पर आदिष्ट होता है । 'इद + आ' यहां प्रकृत-सूत्र से इद भाग को अन् आदेश हो कर--अन् अ + आ = अन + आ हुआ । पुनः टा-ङसिँ-ङसामिनात्स्याः (१४०) सूत्र से आ को इन आदेश तथा आद् गुणः (२७) द्वारा गुण एकादेश करने पर 'अनेन' प्रयोग सिद्ध होता है । 'इदम् + भ्याम्' यहां त्यदाद्यत्व तथा पररूप हो कर 'इद + भ्याम्' इस स्थिति में अनाप्यकः (२७६) सूत्र से अन् आदेश प्राप्त होता है । इस पर अग्रिम अपवादसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्— (२७७) हलि लोपः ।७।२।११३॥ अककारस्येदम इदो लोपः स्यादापि हलादौ । नानर्थकेऽलोऽन्त्यविधिर- नभ्यासविकारे (प०) ॥ अर्थः—तृतीयादि हलादि विभक्ति परे हो तो ककाररहित इदम् शब्द के इद भाग का लोप हो जाता है । नानर्थक इति—अभ्यासविकार को छोड़ कर अन्यत्र अन- र्थकों में अलोऽन्त्यस्य (२६) सूत्र प्रवृत्त नहीं होता । व्याख्या—अकः ।६।१। (अनाप्यकः से) । इदमः ।६।१। (इदमो मः से) । इदः ।६।१। (इदोऽय् पुंसि से) । लोपः ।१।१। आपि ।७।१। (अनाप्यकः से) । हलि ।७।१। विभक्तौ ।७।१। (अष्टन आ विभक्तौ से) । 'हलि' यह 'विभक्तौ' पद का विशेषण है और साथ ही सप्तम्यन्त अल् भी है अतः यस्मिन्विधिस्तदादावल्० से तदादिविधि हो जाती है । अर्थः—(अकः) ककाररहित (इदमः) इदम् शब्द के अवयवं (इदः) इद का (लोपः) लोप हो जाता है (हलि = हलादौ) हलादि (आपि) तृतीयादि विभक्ति परे हो तो । यह सूत्र पिछले अनाप्यकः (२७६) सूत्र का अपवाद है । 'इद + भ्याम्' यहां 'भ्याम्' यह तृतीयादि हलादि विभक्ति परे है अतः यहां अनाप्यकः (२७६) सूत्र का बाध कर हलि लोपः (२७७) सूत्र से 'इद' का लोप प्राप्त होता है । परन्तु अलोऽन्त्यस्य (२१) सूत्र से इद के अन्त्य दकार का लोप होना

३७४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां

चाहिये। इस पर— नानर्थकेऽलोऽन्त्यविधिरनभ्यासविकारे यह परिभाषा प्रवृत्त हो कर कहती है कि अनर्थक में अलोऽन्त्यस्य (२१) सूत्र प्रवृत्त नहीं हुआ करता, हां १ यदि अभ्यास का विकार अनर्थक हो तो यह (अलोऽन्त्यस्य) प्रवृत्त हो जाता है' । कौन अनर्थक और कौन सार्थक होता है ? इस का निर्णय इस परिभाषा से होता है— समुदायो ह्यर्थवान् तस्यैकदेशोऽनर्थकः । अर्थात् समुदाय ही सार्थक और उस का एक भाग निरर्थक हुआ करता है। तो इस प्रकार 'इदम्' यह सम्पूर्ण समुदाय सार्थक और इस का 'इद्' यह अवयव निरर्थक है। अनर्थक में अलोऽन्त्यविधि नहीं हुआ करती अतः यहां भी दकार का लोप न हो कर सम्पूर्ण इद् भाग का ही लोप हो जायेगा—'अ + भ्याम्' । अब यहां सुपि च (१४१) सूत्र से हम दीर्घ करना अभीष्ट है परन्तु उस से वह हो नहीं सकता, क्योंकि उस के अर्थ में 'अदन्त अङ्ग को दीर्घ हो' ऐसा लिखा है। यहां अत् अङ्ग तो है पर अदन्त (अत् है अन्त में जिसके ऐसा) अङ्ग नहीं है। अतः इस की सिद्धि के लिय अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] परिभाषा सूत्रम्—(२७८) आद्यन्तवदेकस्मिन् ।१।१।२१॥ एकस्मिन् क्रियमाणं कार्यमादाविव अन्त इव च स्यात्। सुपि च (१४१) इति दीर्घः । आभ्याम् ॥ अर्थ —जैसे आदि और अन्त में कार्य होते हैं वैसे एक वर्ण में भी कार्य हों। व्याख्या—आद्यन्तवत् इत्यव्ययपदम् । एकस्मिन् ।७।१। समास —आदिश्च अन्तश्च = आद्यन्तौ, इतरेतरद्वन्द्वः । तयोरिव = आद्यन्तवत् । तत्र तस्येव (११७६) इति वतिप्रत्ययः । अर्थ — (आद्यन्तवत्) आदि और अन्त में जैसे कार्य होते हैं वैसे (एकस्मिन्) एक वर्ण में भी हों । आदि और अन्त शब्द सापेक्ष अर्थात् दूसरे की अपेक्षा या आश्रय करने वाले हैं। जब तक अन्य वर्ण न हों, आदि और अन्त नहीं बन सकते । जैसा कि भाष्य में कहा है—यस्मात्पूर्वं नास्ति परम्‌अस्ति स आदिरित्युच्यते । यस्मात्पूर्वमस्ति परञ्च नास्ति सोऽन्त इत्युच्यते । अर्थात् जिस से पूर्व कोई नहीं, परे है वह—'आदि' तथा जिस के पूर्व तो है, परे नहीं वह—'अन्त' कहलाता है । इस प्रकार आदि और अन्त में विधान किये गये कार्य केवल एक वर्ण में प्राप्त नहीं हो सकते । अतः उन की एक-असहाय वर्ण में भी प्रवृत्ति कराने के लिय यह सूत्र आरम्भ किया गया है। उदाहरण यथा— जैसे 'रामाभ्याम्, पुरुषाभ्याम्' यहां अदन्त अङ्ग को सुपि च (१४१) से दीर्घ होता है वैसे—'अ + भ्याम्' यहां केवल अत् को भी दीर्घ हो कर 'आभ्याम्' बनेगा । आदि का उदाहरण—जैसे 'भविष्यति' यहां वलादि स्य को आर्धधातुकस्येड् वलादे (४०१) से इट् का आगम होता है वैसे 'आतिष्ठाम्, आतिष्ठु' इत्यादियों में केवल 'स्' को भी होगा। १ यथा—बिभर्ति, पिपर्ति आदियों में अभ्यास के अन्त्य ऋकार को इकार आदेश हो जाता है। अन्यथा यहां भी सम्पूर्ण अभ्यास के स्थान पर आदेश होना (देखें भैमीव्याख्या द्वितीय भाग सूत्र ६१०) ।

हलन्त-पुलिंङ्ग-प्रकरणम् ३७५ नोट—भाष्यकार ने इस सूत्र को और अधिक विस्तृत करने के लिये व्यप- देशिवदेकस्मिन् ऐसा लिखा है। मुख्यव्यवहार को 'व्यपदेश' कहते हैं। व्यपदेशोऽस्या- स्तीति व्यपदेशी, व्यपदेश वाले का नाम 'व्यपदेशी' हुआ। अर्थात् मुख्य का नाम 'व्यप- देशी' है। उस मुख्य के समान एक में भी कार्य हो जाते हैं। यथा—एकाचो वशो भष्० (२५३) का मुख्य उदाहरण 'गर्दभ्' है। यहां गर्दभ् धातु का अवयव एकाच् भषन्त 'दभ्' है। परन्तु 'धुक्' यहां ऐसा नहीं। यहां धातु भी वही है और एकाच् भषन्त भी वही है, अर्थात् दोनों अभिन्न हैं, इस में भी मुख्य के समान कार्य हो जाएंगे। ये उदाहरण पाणिनि के आद्यन्तवदेकस्मिन् सूत्र से सिद्ध नहीं हो सकते थे अतः भाष्य- कार को व्यपदेशिवदेकस्मिन् इस प्रकार रचना पड़ा। शास्त्र में इसे ही व्यपदेशिवद्भाव कहा गया है। व्यपदेशिवद्भाव का अर्थ गौण को भी मुख्य के समान मानना है। 'इदम् + भिस्' यहां त्यदाद्यत्व, पररूप, हलि लोपः (२७७) से इद का लोप हो 'अ+भिस्' इस स्थिति में व्यपदेशिवद्भाव से अतो भिस ऐस् (१४२) द्वारा भिस् को ऐस् प्राप्त होता है। इस पर अग्रिमसूत्र निषेध करता है— [लघु०] निषेध-सूत्रम्—(२७६) नेदमदसोरकोः ।७।१।११॥ अककारयोरिदमदसोर्भिस ऐस् न । एभिः । अस्मै । एभ्यः । अस्मात् । अस्य । अनयोः २ । एषाम् । अस्मिन् । एषु ॥ अर्थः—ककाररहित इदम् और अदस् शब्द के भिस् को ऐस् नहीं होता । व्याख्या—अकोः ।६।२। इदमदसोः ।६।२। भिसः ।६।१। ऐस् ।१।१। (अतो भिस ऐस् से) । न इत्यव्ययपदम् । नास्ति क् ययोस्तौ = अको, तयोः = अकोः, बहुव्रीहि- समासः । अर्थः—(अकः) ककाररहित (इदमदसोः) इदम् और अदस् शब्द के (भिसः) भिस् के स्थान पर (ऐस्) ऐस् (न) न हो । 'अ+भिस्' यहां प्रकृतसूत्र से भिस् को ऐस् न हुआ । तब बहुवचने झल्येत् (१४५) से एत्व हो सकार को रुत्व विसर्ग करने से 'एभिः' प्रयोग बना । चतुर्थी के एकवचन में 'इदम् + ए' (ङे) = इद + ए । इस अवस्था में सर्वनाम्नः स्मै (१५३) सूत्र से एकार को स्मै आदेश तथा अनाप्यकः (२७६) से इद् को अन् आदेश युगपत् प्राप्त होते हैं । विप्रतिषेधपरिभाषा से परकार्य अन् आदेश होने योग्य है । परन्तु वह अनिष्ट है । इस के लिये परिभाषा प्रवृत्त होती है—पूर्व-पर- नित्याऽन्तरङ्गाऽपवादानामुत्तरोत्तरं बलीयः (प०) । अर्थात् पूर्व से पर, पर से नित्य, नित्य से अन्तरङ्ग और अन्तरङ्ग से अपवाद बलवान् होता है। नित्य उसे कहते हैं कि जो अपने विरोधी के प्रवृत्त होने पर भी प्रवृत्त हो सके । यथा—यहां 'स्मै' आदेश नित्य है क्योंकि यह अपने विरोधी अन् आदेश के प्रवृत्त हो जाने पर भी प्रवृत्त हो सकता है । पर से नित्य बलवान् होता है अतः अनाप्यकः (७.२.११२) के परे होने पर भी सर्वनाम्नः स्मै (७.१.१४) सूत्र के नित्य होने से स्मै आदेश हो जाता है । तब 'इद + स्मै' इस स्थिति में हलि लोपः (२७७) से इद् भाग का लोप हो कर 'अस्मै' प्रयोग सिद्ध होता है ।

३७६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां इदम् + अस् (ङसिँ) = इद + अस्। यहां भी पूर्ववत् नित्य होने से अन् आदेश का बाध कर ङसिँङ्योः स्मात्स्मिनौ (१५४) सूत्र से स्मात् आदेश हो जाता है। तब हलि लोपः (२७७) से इद् का लोप करने से अस्मात्' रूप बनता है। इदम् + अस् (ङस्) = इद + अस्। नित्य होने से ङसिँङ्योस्मा० (१४०) से स्य आदेश हो जाता है। तब इद् का लोप हो अस्य प्रयोग सिद्ध होता है। इदम् + ओस् = इद + ओस्। यहां अनाप्यकः (२७६) सूत्र से अन् आदेश, ओसि च (१४७) से एत्व तथा एचोऽयवायावः (२२) से अय् आदेश करने पर 'अनयोः' रूप बनता है। इदम् + आम्। त्यदाद्यत्व, पररूप, नित्य होने से आमि सर्वनाम्नः सुट् (१५५) से सुँट् इद् भाग का लोप और बहुवचने झल्येत् (१४५) से एत्व करने पर—एषाम्। अब आदेशप्रत्यययोः (१५०) से षत्व कर 'एषाम्' प्रयोग सिद्ध होता है। इदम् + इ (ङि) = इद + इ। यहां ङसिँङ्योः स्मात्स्मिनौ (१५४) से प्रथम स्मिन् आदेश हो कर तदनन्तर इद् भाग का लोप हो जाता है—अस्मिन् । इदम् + सु (सुप्) । त्यदाद्यत्व, पररूप, इद् का लोप, एत्व और षत्व करने पर एषु प्रयोग सिद्ध होता है। 'इदम्' शब्द की पुल्लिङ्ग में रूपमाला यथा— प्र० अयम् इमौ इमे प० अस्मात् आभ्याम् एभ्यः द्वि० इमम् " इमान् ष० अस्य अनयोः एषाम् तृ० अनेन आभ्याम् एभिः स० अस्मिन् , एषु च० अस्मै " एभ्यः सम्बोधनं नास्तीति प्रायोवादः । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२८०) द्वितीयाटौस्स्वेनः ।२।४।३४॥ इदमेतदोरन्वादेशे। किञ्चित्कार्यं विधातुमुपात्तस्य कार्यान्तरं विधातुं पुनरुपादानमन्वादेशः। यथा—अनेन व्याकरणमधीतमेनं छन्दोऽध्यापयेति । अनया पवित्रं कुलम् एनयोः प्रभूतं स्वम् इति। एनम्। एनौ। एनान्। एनेन। एनयोः २॥ अर्थ—द्वितीया, टा और ओस् विभक्तियों के परे होने पर अन्वादेश में इदम् और एतद् शब्द को 'एन' आदेश हो। किञ्चिद इति—किसी कार्य को बोधन कराने के लिये ग्रहण किये हुए का पुनः दूसरे कार्य को बोधन कराने के लिये ग्रहण करना 'अन्वादेश' कहलाता है। व्याख्या—इदमः ।६।१। (इदमोऽन्वादेशे० ग०)। एतदः ।६।१। (एतदस्त्रतसो ० से)। अन्वादेशे ।७।१। (इदमोऽन्वादेशे० सू०)। द्वितीयाटोरसु ।७।३। एन् ।१।१। समास—द्वितीया च टाश्च ओस् च=द्वितीयाटौसः तासु—द्वितीयाटौस्सु इतरतर- द्वन्द्वः। अर्थ—(अन्वादेशे) अन्वादेश में (इदमः) इदम् तथा (एतदः) एतद् शब्द के स्थान पर (एन) 'एन' आदेश हो (द्वितीयाटौस्सु) द्वितीया, टा और ओस् विभक्ति

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३७७ परे होने पर। अनेकाल् होने से 'एन' आदेश सम्पूर्ण इदम् और एतद् के स्थान पर होगा। अन्वादेश किसे कहते हैं? किसी अज्ञात कार्य को जनाने या विधान करने के लिये जिस का प्रथम एक बार ग्रहण हो चुका हो; यदि पुनः दूसरे अज्ञात कार्य को जनाने या विधान करने के लिये उस का ग्रहण किया जावे तो वह पुनर्ग्रहण 'अन्वादेश' कहाता है। यथा — (१) अनेन व्याकरणम् अधीतम् एनं छन्दोऽध्यापय (इस ने व्या- करण पढ़ लिया है अब इसे छन्दश्शास्त्र पढ़ाओ)। यहां 'व्याकरण पढ़ लिया है' इस कार्य के लिये 'अनेन' का ग्रहण किया गया है। पुनः छन्दोऽध्ययन के लिये भी उस का ग्रहण किया गया है अतः दूसरी वार उस का ग्रहण 'अन्वादेश' हुआ। (२) अनयोः पवित्रं कुलम्, एनयोः प्रभूतं स्वम् (इन दोनों का कुल पवित्र है तथा इन का धन भी बहुत है)। यहां प्रथम पवित्र कुल कहने के लिये ग्रहण किये हुए 'इन दोनों' का पुनः बहुत धन कहने के लिये दोबारा ग्रहण किया गया है अतः यह दूसरी वार वाला ग्रहण 'अन्वादेश' है। इसी प्रकार — इमं बालकं शिक्षामपीपठः, अथो एनं वेदमध्यापय (इस बालक को तुम शिक्षा पढ़ा चुके हो अब इसे वेद पढ़ाओ)। यहां वेद पढ़ाने के लिये पुनः उस का ग्रहण 'अन्वादेश' है। अनेनच्छात्रेण रात्रिरधीता, अथो एनेनाहरप्यधीतम् (इस छात्र ने रात भर पढ़ा और इस ने दिन भर भी पढ़ा)। यहां 'दिन भर भी पढ़ा' यह जनाने के लिये पुनः उस का ग्रहण अन्वादेश है। अनयोश्छात्रयोः शोभनं शीलम्, अथो एनयोः कुशाग्रा मेधा (ये दोनों छात्र अच्छे आचार वाले हैं और इन की बुद्धि भी तीक्ष्ण है)। यहां 'बुद्धि तीक्ष्ण है' यह जनाने के लिये पुनः उन का ग्रहण 'अन्वादेश' है। अन्वादेश में द्वितीया (अम्, औट्, शस्) तथा टा और ओस् (षष्ठी और सप्तमी दोनों के द्विवचन) इन पञ्च प्रत्ययों के परे होने पर इदम् और एतद् शब्द को 'एन' सर्वादेश हो जाता है। अन्य विभक्तियों में अनन्वादेश की भांति रूप चलते हैं¹। 'एतद्' शब्द का वर्णन आगे आयेगा यहां 'इदम्' शब्द प्रस्तुत है— १. इदम् + अम् = एन + अम् = एनम्। २. इदम् + औट् = एन + औ = एनौ। ३. इदम् + शस् = एन + अस् = एनान्। ४. इदम् + टा = एन + आ = एन + इन = एनेन। ५. इदम् + ओस् = एन + ओस् = एनयोः। 'एन' आदेश होकर यहां पुंल्लिङ्ग में रामवत् प्रक्रिया होती है। इन सब का दो श्लोकों में प्राचीन संग्रह यथा— इमं विद्धि हरेर्भक्तं, विद्धयथैनं शिवार्चकम्। इमाविमान् वित्त शैवान्, एनावेनांस्तु वैष्णवान् ॥ १ ॥ १. यद्यपि अन्य विभक्तियों में रूप अनन्वादेश की भाँति होते हैं तो भी प्रक्रिया में बड़ा अन्तर होता है। अन्वादेश में इदम् शब्द के स्थान पर तृतीयादि विभक्तियों में इदमोऽन्वादेशेऽशनुदात्तस्तृतीयादौ (२.४.३२) सूत्र से 'अश्' आदेश हो कर शकार का लोप करने पर अदन्त सर्वनाम की तरह कार्य होते हैं। यह सब सप्रयोजन विस्तारपूर्वक सिद्धान्तकौमुदी में देखें।

३७८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां

अनेन पूजितः कृष्णोऽथैनेन गिरिशोऽर्चितः । अनयोः केशवः स्वामी, शिवः स्वामी ह्यथैनयोः ॥ २ ॥ विशेष—किञ्चित्कार्यं विधातुम्० यहां 'विधातुम्' से केवल विधान का अभि- प्राय नहीं है । किसी अज्ञात बात को बतलाना या जनाना ही यहां अभिप्रेत है । अत एव —अप्येतमद्रेस्तनया शुशोच (रघु० २/३७) यहां विधानाभाव में भी अन्वादेश के स्वीकृत होने से 'एन' आदेश सिद्ध हो जाता है । ईषदर्थे क्रियायोगे मर्यादाऽभिविधौ च यः । एतम् आतं ङितं विद्याद् वाक्यस्मरणयोरङित् (देखें पृष्ठ ६०) इस पद्य के पूर्वार्ध में ईषद आदि लोकप्रसिद्ध अर्थों का अनुवाद ही प्रस्तुत किया गया है अत अज्ञातज्ञापन न होने से अन्वादेश के अभाव के कारण 'एन' आदेश नहीं हुआ । इसी प्रकार 'गीतगोविन्द' के — नक्तं भीरुरयं त्वमेव तदिमं राधे ! गृहं प्रापय (यह कृष्ण रात्रि में भीरु है अत तू=राधा ही इसे घर पहुंचा दे)—इस आद्य पद्य में ज्ञात- भीरुता का अनुवादमात्र प्रस्तुत होने से अन्वादेश न होने के कारण 'इमम्' का 'एनम्' नहीं हुआ । यहां यह जरूरी नहीं कि इदम् शब्द के द्वारा गृहीत का ही जब उसी इदम् शब्द के द्वारा दोबारा ग्रहण हो तभी अन्वादेश मान कर एन आदेश किया जाये, किन्तु प्रथम ग्रहण में चाहे यद्, तद् आदि किसी अन्य शब्द के द्वारा या किसी अन्य प्रकार से भी ग्रहण हो तो दूसरे ग्रहण में इदम् और एतद् को एन आदेश हो जाता है । यथा— एव तयोक्ते तमवेक्ष्य किञ्चिद्विस्रंसिदुर्वाङ्कमधूकमाला । ऋजुप्रणामक्रिययैव तन्वी प्रत्यादिदेशैनमभाष्यमाणा ॥ (रघु० ६/२५) यहां प्रथम 'तद्' शब्द से गृहीत होने पर भी पुनर्ग्रहण में इदम् या एतद् को एन आदेश हो जाता है । (यहां मकारान्त पुल्लिङ्ग शब्दो का विवेचन समाप्त होता है।)

अभ्यास (३६) (१) 'किम्' शब्द ही सर्वनामों में पढ़ा गया है 'क' शब्द नहीं, पुनः के, कस्मै' आदियों में क्या सर्वनामकार्य हो जाते हैं ? (२) 'इदम्' शब्द में स्वतः ही ककार का श्रवण नहीं होता, पुनः उस के वारण के लिये अनाप्यकः में यत्न क्यों किया गया है ? (३) 'अयम्' में त्यदाद्यत्व क्यों नहीं होता ? यदि उस के प्रवृत्त्यभाव का कोई कारण है तो वह 'इमौ, इमे' आदि में क्यों नहीं ? (४) 'पुष्+नाति = पुष्णाति' यहां ष्टुत्व होता है या णत्व ? विवेचन करें । (५) आदि और अन्त का लक्षण लिख कर व्यपदेशिवद्भाव को स्पष्ट करें । (६) अन्वादेश का सोदाहरण स्पष्टीकरण करें । (७) 'नानर्थके० परिभाषा की आवश्यकता पर सोदाहरण एक टिप्पण लिखें । (८) (क) 'प्रशान्' यहां नकार का लोप क्यों नहीं होता ?