भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 384

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३६६ प्रपूर्वक शमुँ उपशमे (दिवा० प०) धातु से क्विँप्, अनुनासिकस्य क्विझलोः० (७२७) से उपधा-दीर्घ करने कर 'प्रशाम्' (शान्त) शब्द निष्पन्न होता है । प्रशाम् + स् (सुँ) । यहां सकारलोप हो कर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२७०) मो नो धातोः ॥८।२।६४॥ धातोर्मस्य नः पदान्ते । प्रशान् । प्रशान्भ्याम् इत्यादि ॥ अर्थः—पदान्त में धातु के मकार को नकार आदेश हो । व्याख्या—धातोः ।६।१। मः ।६।१। नः ।१।१। पदस्य ।६।१। (यह अविकृत है) । अन्ते ।७।१। (स्कोः संयोगाद्योरन्ते च से) । अर्थः—(पदस्य) पद के (अन्ते) अन्त में (धातोः) धातु के (मः) मकार के स्थान पर (नः) न् आदेश होता है¹ । 'प्रशाम्' यहां एकदेशविकृतमनन्यवत् के अनुसार 'शम्' धातु का मकार है अतः प्रकृत-सूत्र से इसे नकार आदेश हो कर—'प्रशान्' प्रयोग सिद्ध होता है । ध्यान रहे कि यह नकारादेश (८.२.६४) न लोपः० (८.२.७) की दृष्टि में असिद्ध है अतः उसे यहां मकार ही दिखाई देता है इस से नकार का लोप नहीं होता । 'प्रशाम्' (शान्त) शब्द की रूपमाला यथा— प्र० प्रशान् प्रशामौ प्रशामः | प० प्रशामः प्रशान्भ्याम् प्रशान्भ्यः द्वि० प्रशामम् ,, ,, | ष० ,, प्रशामोः प्रशामाम् तृ० प्रशामा प्रशान्भ्याम् प्रशान्भिः | स० प्रशामि ,, प्रशान्त्सु, -न्सु† च० प्रशामे ,, प्रशान्भ्यः | सं० हे प्रशान्! हे प्रशामौ! हे प्रशामः! † यहां मो नो धातोः सूत्र द्वारा नकार आदेश हो कर नश्च (८७) सूत्र से वैकल्पिक धुट् का आगम हो जाता है । धुट्पक्ष में खरि च (७४) से चर्व्व हो कर 'प्रशान्त्सु' और धुट् के अभाव में 'प्रशान्सु' बन जाता है । इसी प्रकार—प्रदाम्, प्रताम्, प्रकामृ प्रभृति शब्दों के रूप बनते हैं । किम् [कौन । कायतेर्डिमः (५६७) इत्युणादिसूत्रेण साधुः] । 'किम्' शब्द सर्वादिगणपठित है, अतः सर्वादीनि सर्वनामानि (१५१) सूत्र से इस की सर्वनामसञ्ज्ञा हो जाती है । यह शब्द त्रिलिङ्गी है यहां पुंल्लिङ्ग का प्रकरण होने से पुंल्लिङ्ग में रूप दिखाए जायेंगे । 'किम् + स्' (सुँ) यहां हल्ङ्याब्भ्योः० (१७६) से सकार का लोप प्राप्त होने पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२७१) किमः कः ॥७।२।१०३॥ किमः कः स्याद्विभक्तौ । कः । कौ । के । इत्यादि । शेषं सर्ववत् ॥ १. 'मः' इति 'धातोः' इत्यस्य विशेषणत्वे तदन्तविधिना 'मकारान्तस्य धातोर्नकारा- देशः स्यात्पदान्ते' इत्यर्थो निष्पद्यते । तदाऽलोऽन्त्यविधिनेऽन्त्यमकारस्य नकारा- देश उन्नेतव्यः । ल० प्र० (२४)