लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६८ भामीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां 'चतुर्+सु' यहां 'रु' का रेफ नहीं अतः विसर्ग आदेश न हुआ । आदेश- प्रत्यययो (१५०) द्वारा सकार को षकार कर—'चतुर्षु' । अब यहां अचो रहाभ्यां द्वे (६०) द्वारा षकार को वैकल्पिक द्वित्व प्राप्त होने पर निषेध करते हैं— [लघु०] निषेध-सूत्रम् -- (२६६) शरोऽचि ॥८।४।४६॥ अचि परे शरो न द्वे स्त । चतुर्षु ॥ अर्थ - अच् परे हो तो शर् को द्वित्व नहीं होता । व्याख्या - अचि ।७।१। शर् ।६।१। न इत्यव्ययपदम् । (नादिन्याक्रोशे पुत्रस्य मे) । द्वे ।१।२। (अचो रहाभ्यां द्वे स) । अर्थ - (अचि) अच् परे होने पर (शर् ) शर् के स्थान पर (द्वे) दो शब्दस्वरूप (न) न हों । 'चतुर्षु' यहां उकार अच् परे है अतः षकार शर् को द्वित्व नहीं होता । इस सूत्र के कुछ अन्य उदाहरण यथा— १ दर्शनम् । २ स्पर्शनम् । ३ आर्षम् । ४ वर्षणम् । ५ चिकीर्षा । ६ जिहीर्षा । ७ मुमूर्षा । ८ पर्शु । ९ अर्श । १० घर्षणम् । ११ वर्षक । १२ वर्षुक । १३ कार्षापणम् । १४ वर्षा । १५ हर्ष । इत्यादि ।१ निम्नलिखित स्थलों में अच् परे न होने से निषेध नहीं होता । अनचि च (१८) अथवा अचो रहाभ्यां द्वे (६०) से द्वित्व हो जाता है— १ ष्प्फन । २ वाष्प्पिन । ३ दश्य॑न्ते । ४ भीष्ष्म । ५ यष्टि । ६ अररव । ७ अररमरी । ८ अरदनानि । ६ दमशू । १० अशिश्रवी । ११ अप्टो । १२ विश्रान्त । १३. ईप्स्यति । १४ अस्स्यम् । १५ नास्स्ति । इत्यादि । अच् परे होने पर भी शर् से अतिरिक्त वर्ण (यर्) को द्वित्व हो ही जायेगा— १ अर्कै । २ अर्थ्य । ३ निर्झर ४ दुर्ग । ५ द्ववर्ग । ६ मूवर्ख । ७ निर्भर । ८ मूर्च्छना । ६ ऊर्म्मि । १० विमार्ग । ११ अर्जुन । १२ उर्वी । १३ आर्य्य । १४ अर्घ्यं । १५ ऊर्द्धवम् । इत्यादि । 'चतुर' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० ० ० चत्वार | प० ० ० चतुर्भ्य द्वि० ० ० चतुर | ष० ० ० चतुर्णाम्, चतॄणाम् तृ० ० ० चतुर्भिः | स० ० ० चतुर्षु च० ० ० चतुर्भ्य संख्यावाचकों का सम्बोधन नहीं होता । इसी प्रकार 'परमचतुर्' आदि शब्दों के रूप होते हैं । (यहां रेफान्त पुँल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।) अब मकारान्त पुल्लिंग शब्दा का वर्णन किया जाता है । १ इस सूत्र का निषेध शकार और षकार तक ही सीमित रहता है । सकार के द्वित्व का प्रसङ्ग कहीं नहीं प्राप्त होता [विशेष स्वयं विचार करें] ।