लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
अर्थ—सुँ परे होने पर 'दिव्' इस प्रातिपदिक को औकार आदेश हो जाता है। व्याख्या—दिव् ।६।१। औत् ।१।१। सौ ।७।१। (सावनडुहः से) । संस्कृत में दो 'दिव्' शब्द हैं। एक अव्युत्पन्न प्रातिपदिक और दूसरा 'दिवुँ क्रीडा-विजिगीषा०' (दिवा० प०) यह धातु। इस सूत्र में 'दिव्' इस अव्युत्पन्न प्रातिपदिक का ही ग्रहण होता है दिवुँ धातु का नहीं। इस में कारण यह है कि—निरनुबन्धकग्रहणे न सानु- बन्धकस्य (परिभाषा) अर्थात् यदि निरनुबन्ध (अनुबन्धहीन) का ग्रहण सूत्र में हो तो सानुबन्ध (अनुबन्धसहित) का ग्रहण नहीं करना चाहिये। यहां सूत्र में 'दिव्' में उकारानुबन्धसहित 'दिव्' का ग्रहण किया है, अतः 'दिव्' इस प्रातिपदिक निरनु- बन्ध का ही ग्रहण होगा, सानुबन्ध 'दिवुँ' का नहीं। 'औत्' में तकार उच्चारणार्थ है, आदेश 'औ' ही होता है। यदि तकार भी साथ आदेश होता तो अनेकाल् होने से सर्वादेश हो जाता। अर्थ—(दिव्) दिव् इस प्रातिपदिक के स्थान पर (औत्) 'औ' आदेश हो (सौ) सुँ परे होने पर। यह सूत्र अङ्गाधिकार में पढ़ा गया है अतः दिव् और दिव्शब्दान्त दोनों को औकार आदेश होगा। ध्यान रहे कि अलोऽन्त्यपरिभाषा से दिव् के वकार को ही औकार आदेश होगा। 'सुदिव् + सुँ' यहां 'सुँ' परे है अतः प्रकृत-सूत्र से वकार को औकार करने पर इको यणचि (१५) से इकार को यकार हो कर रुत्व विसर्ग करने से 'सुद्यौः' प्रयोग सिद्ध होता है¹। सुदिव् + औ = सुदिवौ। सुदिव् + अस् (जस्) = सुदिवः। सुदिवम्। सुदिवौ। सुदिव् + अस् (शस्) = सुदिवः। 'सुदिव् + भ्याम्' में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि सूत्रम्—(२६५) दिव उत् ।६।१।१२७॥ दिवोऽन्तादेश उकारः स्यात्पदान्ते। सुद्युभ्याम्। इत्यादि॥ अर्थ—पद के अन्त में दिव् को उकार अन्तादेश हो। व्याख्या—दिवः ।६।१। उत् ।१।१। पदान्ते ।७।१। (एङ् पदान्तादति से वि- भक्तिविपरिणाम द्वारा)। अर्थ—(पदान्ते) पदान्त में (दिव्) दिव् शब्द के स्थान पर (उत्) ह्रस्व उकार आदेश हो। अलोऽन्त्यपरिभाषा से दिव् के अन्त्य अल् वकार को
१ 'सुदिव् + सुँ' में औकारादेश तथा सुँलोप युगपत् प्राप्त होते हैं। परन्तु औकारा- देश नित्य और सुँलोप अनित्य होने से प्रथम औकारादेश हो जाता है। जो विधि दूसरे के प्रवृत्त होने या न होने पर भी समानरूप से प्रवृत्त हो वह दूसरे की अपेक्षा नित्य होती है। जैसा कि कहा है—कृताकृतप्रसङ्गी यो विधिः स नित्यः (परि०)। यहां सुँलोप कर देने पर भी प्रत्ययलक्षण द्वारा सुँ को मान कर औकारादेश हो सकता है अतः औकारादेश नित्य है। परन्तु औकारादेश कर देने पर हल् न होने से सुँलोप नहीं हो सकता अतः सुँलोप अनित्य है। नित्य और अनित्य में नित्य ही बलवान् होता है।