भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 378

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३६३ [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२६३) सहेः साडः सः ।८।३।५६॥ साड्रूपस्य सहेः सस्य मूर्धन्यादेशः स्यात् । तुराषाट्, तुराषाड् । तुरासाहौ । तुरासाहः । तुराषाड्भ्याम् इत्यादि ॥ अर्थः—सह् धातु से बने 'साड्' शब्द के सकार को मूर्धन्य आदेश हो । व्याख्या—सहेः ।६।१। साडः ।६।१। सः ।६।१। मूर्धन्यः ।१।१। (अपदान्तस्य मूर्धन्यः से) । मूर्ध्नि भवः=मूर्धन्यः । शरीरावयवाच्च (१०६१) इति यत् । अर्थः— (सहेः) सह् धातु का जो (साडः) साड् उस के (सः) सकार के स्थान पर (मूर्धन्यः) मूर्धा स्थान वाला वर्ण हो जाता है । सकार के स्थान पर आन्तर्य से ईषद्विवृत प्रयत्न वाला षकार ही मूर्धन्य होता है । सह् का साड् रूप पदान्त में ही बनता है अतः पदान्त में सह् के सकार को मूर्धन्य आदेश हो—यह फलितार्थ हुआ । 'तुरासाड्' यहां 'साड्' यह सह् धातु से बना है । अतः इस के सकार को मूर्धन्य षकार हो कर वाऽवसाने (१४६) से वैकल्पिक चत्त्वं करने पर 'तुराषाट्, तुराषाड्' दो रूप बनते हैं । तमभ्यनन्दत्प्रणतं लवणान्तकमग्रजः । कालनेमिवधात्प्रीत- स्तुराषाडिव शार्ङ्गिणम् (रघु० १५.४०) । रूपमाला यथा— प्र० तुराषाट्-ड् तुरासाहौ तुरासाहः | प० तुरासाहः तुराषाड्भ्याम् तुराषाड्भ्यः द्वि० तुरासाहम् ,, ,, | प० ,, तुरासाहोः तुरासाहाम् तृ० तुरासाहा तुराषाड्भ्याम् तुराषाड्भिः | स० तुरासाहि ,, तुराषाट्सु, ड्सु च० तुरासाहे ,, तुराषाड्भ्यः | सं० हे तुराषाट्-ड् ! तुरासाहौ ! तुरासाहः ! इसी प्रकार—पृतनासाह्, प्रभृति शब्दों के रूप जानने चाहियें । (यहां हकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।) —:: o ::— यद्यपि हकारान्त शब्दों के अनन्तर प्रत्याहारक्रम से यकारान्त शब्द आने चाहियें थे तथापि उन का विरलप्रयोग¹ तथा उन में किसी प्रकार का विशेषकार्य होता न देख कर ग्रन्थकार उन्हें छोड़ कर वकारान्त शब्दों का निरूपण करते हैं । सुदिव् =अच्छे अर्थात् निर्मल आकाश वाला दिवस (दिन) आदि या अच्छे स्वर्ग वाला पुरुष आदि । 'दिव्' शब्द नित्यस्त्रीलिङ्ग है । इस का अर्थ आकाश वा स्वर्ग है । द्यो-दिवौ द्वे स्त्रियाम् इत्यमरः । सु=शोभना द्योः=आकाशो नाको वा यस्य स सुद्यौः । इस प्रकार बहुव्रीहि-समास में 'सुदिव्' शब्द पुंल्लिङ्ग हो जाता है । प्रातिपदिक सञ्ज्ञा हो कर इस से स्वादि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं— सुदिव् + स् (सुँ) में हल्ङ्याब्भ्योः० (१७६) से सकारलोप प्राप्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२६४) दिव औत् ।७।१।८४॥ दिव् इति प्रातिपदिकस्य औत् स्यात् सौ । सुद्यौः । सुदिवौ ॥ १. यथा व्याकरण में अय्, आय्, मय्, चय्, यय् आदि ।