लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
। ६।१। (यह अधिकृत है)। अन्ते । ७।१। (स्को ० से)। समास —द्रुहश्च मुहश्च ष्णुह- श्च ष्णिह् च = द्रुह् मुहू ष्णुह्-ष्णिह , तेषाम् =द्रुह मुह ष्णुह ष्णिहाम् । इतरेतरद्वन्द्व । द्रुहादिषु त्रिषु अकार उच्चारणार्थ । अर्थ —(द्रुह मुह ष्णुह् ष्णिहाम्) द्रुह्, मुह, ष्णुह् और ष्णिहू धातुओं के (ह ) हकार के स्थान पर (वा) विकल्प कर के (घ ) घकार आदेश होता है (झलि) झल् परे होने पर या (पदस्य) पद के (अन्ते) अन्त मे । 'द्रुहू' मे दादेर्धातोर्घ (२५२) द्वारा घत्व के नित्य प्राप्त होने पर तथा अन्यो मे दादि न होने मे घत्व के अप्राप्त होने पर इस सूत्र से वैकल्पिक घत्व किया जाता है, अतः यह प्राप्ताऽप्राप्तविभाषा है । द्रुह्= द्रोह करने वाला (द्रुह्यतीति ध्रुक्) । द्रुह जिघांसायाम् (दिवा० प०) धातु मे कर्ता मे क्विप् प्रत्यय कर उस का सर्वापहार लोप करने मे 'द्रुह्' शब्द निष्पन्न होता है । द्रुह् +म् (सुं) । यहा हल्ङ्याब्भ्य ० (१७६) सूत्र से सकारलोप हो कर पदान्त मे हकार को वा द्रुह०(२५४) सूत्र द्वारा वैकल्पिक घकार तथा घत्वाभावपक्ष में हो ढ (२५१) सूत्र से ढकार कर दोनो पक्षो मे एकाच ० (२५३) सूत्र से दकार को धकार हो गया तो—ध्रुघ्, ध्रुढ् । अब झलां जशोऽन्ते (६७) मे जश्त्व तथा वाऽवसाने (१४६) सूत्र से वैकल्पिक चत्त्व करने मे—'१ ध्रुक्, २ ध्रुग्, ३ ध्रुद्, ४ ध्रुड्—ये चार रूप सिद्ध होते हैं । 'द्रुह् +भ्याम्' यहा पदान्त हकार को घकार तथा पक्ष मे ढकार होकर दोनो पक्षो मे एकाच ० (२५३) से दकार को धकार हो जाता है । पुनः झलां जशोऽन्ते (६७) मे दोनो पक्षो मे जश्त्व हो कर—'१ ध्रुग्भ्याम्, २ ध्रुड्भ्याम्' ये दो रूप बनते हैं। इसी प्रकार भिस् और भ्यस् मे भी दो २ रूप होते हैं। द्रुह् +सु (सुप्) । यहा वा द्रुह० (२५४) से पदान्त हकार को वैकल्पिक घकार हो कर एकाचो बशो० (२५३) सूत्र मे दकार को धकार, जश्त्व से घकार को गकार, षत्व भ सु के सकार को षकार तथा चर्व मे गकार को ककार करने मे— ध्रुक् षु = 'ध्रुक्षु' रूप सिद्ध होता है। घत्वाभाव मे—पदान्त हकार को हो ढः (२५१) से ढकार, भष्व से दकार को धकार, जश्त्व से ढकार को डकार, डः सि धुट् (८४) से वैकल्पिक धुट् आगम, अनुबन्धलोप तथा खरि च (७४) मे चत्वं करने पर—'१ ध्रुद्र्सु, २. ध्रुट्सु' ये दो रूप बनते हैं। तो इस प्रकार कुल मिला कर—'१ ध्रुक्षु, २ धृट्सु ३ धृट्सु' ये तीन रूप सिद्ध होते हैं। सम्पूर्ण रूपमाला यथा— प्रथमा ध्रुक्,-ग्, ध्रुट्,-ड् ध्रुहौ द्रुह द्वितीया द्रुहम् " " तृतीया द्रुहा ध्रुग्भ्याम्, ध्रुड्भ्याम् ध्रुग्भि, ध्रुड्भि चतुर्थी द्रुहे " " ध्रुग्भ्य, ध्रुड्भ्यः पञ्चमी द्रुह " " " " षष्ठी " द्रुहो द्रुहाम्