लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
पृष्ठ 368, कुल 633 में से
संदर्भ में पढ़ेंचाहिये। ऐसा करने से—'गर्दभ्' इस धातु का अवयव एकाच् झषन्त 'दभ्' हो जाता है। इस से उस के दकार को धकार सिद्ध हो जाता है। इस सूत्र का स्थूल तात्पर्य यह है कि स् या ध्व परे होने पर या पदान्त में यदि किसी धातु के एकाच् अंश के अन्त में झष् अर्थात् वर्गचतुर्थ वर्ण होगा तो धातु के उसी अंश के अन्तर्गत ब्, ग्, ड्, द् को क्रमशः भ्, घ्, ढ्, ध् वर्ण हो जायेंगे। यथा —बुध् का भुध्, गुह् का घुह्, दुह् का धुह्, गर्दभ् का गधर्भ् हो जायेगा। सकार या ध्व परे होने पर उदाहरण आगे तिङन्तप्रकरण में—भोत्स्यते, घोक्ष्यते, अभुद्ध्वम्, अगुध्वम् आदि आयेंगे। यहां प्रकृत में पदान्त के उदाहरण प्रस्तुत हैं। 'दुह्' यह व्यपदेशिवद्भाव¹ से धातु का अवयव है और एकाच् झषन्त भी है, अतः यहां पदान्त में इस के बश्—दकार को स्थानकृत आन्तर्य से धकार हो कर 'धुह्' हुआ। अब जश्त्व (६७) और वैकल्पिक चर्त्व (१४६) करने से—'धुक्, धुग्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। भ्याम् में—'दुह् + भ्याम्' इस स्थिति में पदान्त में हकार को घकार एकाचः० (२५३) से दकार को धकार तथा जश्त्व—गकार हो कर 'धुग्भ्याम्' रूप सिद्ध होता है। इसी प्रकार भिस् में 'धुग्भिः' और भ्यस् में 'धुग्भ्यः' सिद्ध होते हैं। दुह् + सु (सुप्)। यहां भी पदान्त में घकारादेश, भष्त्व से दकार को धकार तथा झलां जशोऽन्ते (६७) से जश्त्व—गकार और खरि च (७४) से चर्त्व-ककार कर षत्व करने से 'धुक्षु' सिद्ध होता है। रूपमाला यथा— प्र० धुक्,ग् दुहौ दुहः | प० दुहः धुग्भ्याम् धुग्भ्यः द्वि० दुहम् ,, ,, | प० ,, दुहोः दुहाम् तृ० दुहा धुग्भ्याम् धुग्भिः | स० दुहि ,, धुक्षु च० दुहे ,, धुग्भ्यः | सं० हे धुक्,ग्! हे दुहौ! हे दुहः! इसी प्रकार—गोदुह (गौ दोहने वाला =ग्वाला), अजादुह् (बकरी दोहने वाला), दह (जलाने वाली =अग्नि), आश्रयदह (अग्नि), काष्ठदह् (अग्नि) प्रभृति शब्दों के रूप होते हैं। [लघु०] विधि-सूत्रम् (२५४) वा द्रुह-मुह-ष्णुह-ष्णिहाम् ।८।२।३३॥ एषां हस्य वा घो झलि पदान्ते च। ध्रुक्, ध्रुग्, ध्रुट्, ध्रुड्। द्रुहौ। द्रुहः। ध्रुग्भ्याम्, ध्रुड्भ्याम्। ध्रुक्षु, ध्रुट्सु, ध्रुट्सु। एवम्—मुक्, मुग्, मुट्, मुड् इत्यादि ॥ अर्थः—द्रुह्, मुह्, ष्णुह्, ष्णिह्—इन धातुओं के हकार को झल् परे होने पर या पदान्त में विकल्प कर के घकार हो जाता है। व्याख्या—वा इत्यव्ययपदम्। द्रुह-मुह-ष्णुह-ष्णिहाम् ।६।३। हः ।६।१। (हो ढः से)। घः ।१।१। (दादेर्धातोर्घः से)। झलि ।७।१। (झलो झलि से)। पदस्य १. इस का विवेचन आद्यन्तवदेकस्मिन् (२७८) सूत्र पर देखें। ल० प्र० (२३)