लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां 'दुह्' यह उपदेश में दादि धातु१ है। अत इस सूत्र से पदान्त में हकार को घकार हो कर—'धुघ्' हुआ। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२५३) एकाचो बशो भष् भषन्तस्य स्ध्वोः।८।२।३७॥ धात्ववयवस्यैकाचो भषन्तस्य बशो भष् स्यात्, से ध्वे पदान्ते च। धुक्, धुग्। दुहौ। दुहः। धुग्भ्याम्। धुक्षु॥ अर्थ.—धातु का अवयव जो भषन्त एकाच्, उस के बश् को भष् हो, सकार अथवा ध्व परे होने पर या पदान्त में। व्याख्या—घातोः।६।१। (वादेर्घार्तोर्घं से)। एकाचः।६।१। बशः।६।१। भष् ।१।१। भषन्तस्य।६।१। स्ध्वोः।७।२। पदस्य।६।१। (अधिकृत है)। अन्ते।७।१। (स्कोः संयोगाद्योरन्ते च से)। अन्वय—धातोर् (अवयवस्य) एकाचो भषन्तस्य बशो भष् (स्यात्) स्ध्वोः पदस्य अन्ते (च)। अर्थ—(घातोः) धातु के अवयव (एकाचः) एक अच् वाले (भषन्तस्य) भषन्त भाग के (बशः) बश् अर्थात् ब्, ग्, ड्, द् वर्णों के स्थान पर (भष्) भष् अर्थात् भ्, घ्, ढ्, ध् वर्ण हो जाते हैं (स्ध्वोः) सकार अथवा ध्व शब्द परे हो या (पदस्य) पद के (अन्ते) अन्त में। इस सूत्र के अर्थ में हम ने अनुवृत्तिलब्ध 'घातोः' पद का 'एकाचः भषन्तस्य' के साथ सामानाधिकरण्य नहीं किया। अर्थात् 'एक अच् वाली भषन्त धातु के बश् को भष् हो' इस प्रकार का अर्थ नहीं किया। ऐसा अर्थ करने से यह दोष प्राप्त होता था कि जहाँ एक अच् वाली धातु न होती वहाँ भष् प्राप्त न होता२। यथा—'गर्दभ' शब्द से तत्करोति तदाचष्टे (चुरा० ग० सू०) द्वारा णिच् प्रत्यय करने पर सनाद्यन्ता धातवः (४६८) से धातुसञ्ज्ञा हो कर कर्त्ता में क्विँप् प्रत्यय करने से 'गर्दभ्' शब्द निष्पन्न होता है। यहां एक अच् वाली धातु न होने से भष्भाव प्राप्त नहीं होता। परन्तु हम भष्भाव कर 'गधैप्' रूप बनाना अभीष्ट है। अत यहां 'घातोः' पद का 'एकाचः भषन्तस्य' इस के साथ अवयव-अवयवी सम्बन्ध करना ही युक्त है। अर्थात् 'धातु का अवयव जो एकाच् भषन्त, उस के बश् को भष् हो' ऐसा अर्थ करना प्रत्यु०—'दामलिह्' शब्द में उपदेश में धातु के दादि न होकर लकारादि होने से घत्व नहीं होता। हो ढः (२५१) से ढत्व हो जश्त्व चत्त्वं करने पर—'दामलिट्- ड्' सिद्ध होते हैं। दाम लेढीति दामलिट्, दामलिहमात्मन इच्छतीति-दामलिट्। इस की विशेष प्रक्रिया सिद्धान्तकौमुदी में देखें। १ क्विबन्ता णिङन्ता णिजन्ता शब्दा धातुत्वं न जहाति (क्विबन्त, णिङन्त और णिजन्त शब्दों की धातुसञ्ज्ञा बनी रहती है) इस परिभाषानुसार यहां 'दुह्' की धातुसञ्ज्ञा पूर्ववद् अक्षुण्ण है। २ यदि एकाच् अनेकाच् सब धातुओं में भष्भाव करना है तो—'एकाचः' की क्या आवश्यकता है ? यहां यह शङ्का नहीं करनी चाहिये, क्योंकि 'एकाचः' ग्रहण न करने से ढत्व कर चुकने पर 'दामलिड्' में भी अनिष्ट भष्भाव प्राप्त होगा।