भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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३१६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् रणार्थ । 'ऋन्नेभ्य' स तदन्तविधि हो जाने से 'ऋदन्तनान्तेभ्य' बन जाता है। अर्थ — (ऋन्नेभ्य ) ऋदन्त और नकारान्त (प्रातिपदिकेभ्य ) प्रातिपदिकों से परे (स्त्रियाम्) स्त्रीत्व की विवक्षा मे (ङीप्) ङीप् प्रत्यय हो जाता है। ऋदन्त प्रातिपदिकों से यथा—कर्तृ + ङीप् = कर्तृ + ई = कर्त्री । हर्तृ + ङीप् = हर्तृ + ई = हर्त्री । नकारान्त प्रातिपदिकों से यथा—दण्डिन् + ङीप् = दण्डिन् + ई = दण्डिनी । योगिन् + ङीप् = योगिन् + ई = योगिनी । 'क्रोष्टु' शब्द ऋदन्त है, अत ङीप् प्रत्यय हो गया । 'ङीप्' का 'ई' शेष रहता है। ङकार की लशक्यतद्धिते (१३६) से और पकार की हलन्त्यम् (१) से इत्सञ्ज्ञा हो जाती है। तब 'क्रोष्ट् + ई' इस स्थिति मे यण् आदेश हो कर 'क्रोष्ट्री' यह ईका- रान्त शब्द बन जाता है। ङीन्त होने से क्रोष्ट्री शब्द के रूप गौरीशब्दवत् होते हैं। रूपमाला यथा— प्र० क्रोष्ट्री क्रोष्ट्र्यौ क्रोष्ट्र्यः | प० क्रोष्ट्या क्रोष्ट्रीभ्याम् क्रोष्ट्रीभ्यः द्वि० क्रोष्ट्रीम् " क्रोष्ट्रीः | प० " क्रोष्ट्र्योः क्रोष्ट्रीणाम् तृ० क्रोष्ट्या क्रोष्ट्रीभ्याम् क्रोष्ट्रीभिः | स० क्रोष्ट्याम् " क्रोष्ट्रीषु च० क्रोष्ट्र्यै " क्रोष्ट्रीभ्यः | स० हे क्रोष्ट्रि! हे क्रोष्ट्र्यौ! हे क्रोष्ट्र्यः! इसी प्रकार—कर्त्री (करने वाली), धात्री (धारण करने वाली), पात्री (पालन करने वाली) प्रभृति शब्दों के रूप होते हैं। (यहाँ उकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।) ---------------- ० ---------------- [लघु०] भ्रूः श्रीवत् ॥ व्याख्या—भ्रमुँ अनवस्थाने (दिवा० प०) धातु से भ्रमेरून् डूः (उणा० २२६) सूत्र द्वारा डू प्रत्यय कर टिलोप करने से 'भ्रू' (भौँ) शब्द निष्पन्न होता है। भ्रूशब्द के रूप श्रीशब्द के समान बनेंगे। अचि श्नुधातुभ्रुवाम्० (१६६) सूत्र मे विशेष उल्लेख के कारण इस म उवङ् आदेश होगा। इस मे उवङ् की स्थिति होने से प्रथम नेयङु- र्वस्थान्० (२२६) द्वारा नदीसञ्ज्ञा का निषेध हो कर तदनन्तर ङित् वचनों मे ङिति ह्रस्वश्च (२२) तथा आम् मे वाऽऽमि (२३०) मे नदीत्व का विकल्प हो जाने से 'श्री' शब्द के समान प्रक्रिया होगी। रूपमाला यथा— प्रथमा भ्रूः भ्रुवौ भ्रुवः द्वितीया भ्रुवम् " " तृतीया भ्रुवा भ्रूभ्याम् भ्रूभिः चतुर्थी भ्रुवै, भ्रुवे " भ्रूभ्यः पञ्चमी भ्रुवाः, भ्रुवः " " षष्ठी " " भ्रुवोः भ्रूणाम्, भ्रुवाम्