लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
पृष्ठ 414, कुल 633 में से
संदर्भ में पढ़ेंहलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३६६ अर्थः— (भस्य = भानाम्) भसञ्ज्ञक (पथिन्मथ्यृभुक्षाम्) पथिन्, मथिन् तथा ऋभुक्षिन् शब्दों की (टेः) टि का (लोपः) लोप हो जाता है। इस सूत्र से टि (इन्) का लोप हो कर— पथ् + अस् = पथः, मथ् + अस् == मथः, ऋभुक्ष् + अस् = ऋभुक्षः—रूप सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार आगे भी भसञ्ज्ञकों में जान लेना चाहिये। अन्यत्र—पदसञ्ज्ञकों में न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य (१८०) सूत्र से नकार का लोप हो जाता है। रूपमाला यथा— पथिन् (मार्ग) | मथिन् (मथनी) प्र० पन्थाः पन्थानौ पन्थानः | प्र० मन्थाः मन्थानौ मन्थानः द्वि० पन्थानम् ,, पथः | द्वि० मन्थानम् ,, मथः तृ० पथा पथिभ्याम् पथिभिः | तृ० मथा मथिभ्याम् मथिभिः च० पथे ,, पथिभ्यः | च० मथे ,, मथिभ्यः प० पथः ,, ,, | प० मथः ,, ,, ष० ,, पथोः पथाम् | ष० ,, मथोः मथाम् स० पथि ,, पथिषु | स० मथि ,, मथिषु सं० हे पन्थाः! हे पन्थानौ! हे पन्थानः! | सं० हे मन्थाः! हे मन्थानौ! हे मन्थानः! ऋभुक्षिन् (इन्द्र) प्र० ऋभुक्षाः ऋभुक्षाणौ ऋभुक्षाणः | प० ऋभुक्षः ऋभुक्षिभ्याम् ऋभुक्षिभ्यः द्वि० ऋभुक्षाणम् ,, ऋभुक्षः | ष० ,, ऋभुक्षोः ऋभुक्षाम् तृ० ऋभुक्षा ऋभुक्षिभ्याम् ऋभुक्षिभिः | स० ऋभुक्षि ,, ऋभुक्षिषु च० ऋभुक्षे ,, ऋभुक्षिभ्यः | सं० हे ऋभुक्षाः! ऋभुक्षाणौ! ऋभुक्षाणः! इस में णत्व अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि (१३८) सूत्र से होता है। पञ्चन् (पांच)। 'पञ्चन्' शब्द सिद्धान्तकौमुदीपठित उणादिसूत्रों में सिद्ध नहीं किया गया। उणादिसूत्रों के वृत्तिकार उज्ज्वलदत्त कनिँन् युवृषि० (उणा० १५४) सूत्र पर बहुल द्वारा पचिँ (भ्वा० प०, चुरा० उभ०) धातु से कनिँन् प्रत्यय कर के इसे सिद्ध करते हैं। प्रक्रियासर्वस्वकार नारायणभट्ट उणादिसूत्रों में पञ्चेश्च सूत्र पढ़ कर इस की सिद्धि करते हैं। सरस्वतीकण्ठाभरणकार भोजदेव—द्वि-यु-वृषि-तक्षि- राजि-ध्वनि-पचि-द्यु-प्रतिदिवश्यः कनिँन् इस प्रकार सूत्र बना कर इस की सिद्धि करते हैं। श्रीदुर्गसिंह अपनी वृत्ति में पचिँ विस्तारे (चुरा० उ०) धातु से पञ्चेरनिः सूत्र द्वारा 'अनि' प्रत्यय ला कर इस की निष्पत्ति मानते हैं। 'पञ्चन्' शब्द तीनों लिङ्गों में एक समान रहने वाला तथा नित्यबहुवचनान्त है। अतः इस से 'जस्' आदि बहुवचन प्रत्यय ही होते हैं। 'पञ्चन् + जस्' यहां अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—