भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 422

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४०७ से ककार की इत्सञ्ज्ञा हो लोप हो जाता है¹। इकार उच्चारणार्थ है। तो इस प्रकार —‘ऋत्विज्+व्’ हुआ। अब अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(३०२) कृदतिङ्।३।१।९३॥ अत्र धात्वधिकारे तिङ्भिन्नः प्रत्ययः कृत्सञ्ज्ञः स्यात् ॥ अर्थः—धातोः (३.१.६१) इस अधिकार में पठित प्रत्यय कृत्सञ्ज्ञक हो। व्याख्या—तत्र इत्यव्ययपदम्। (तत्रोपपदं सप्तमीस्थम् से)। अतिङ् १।१। (यह अधिकृत है)। कृत् १।१। अर्थः—(तत्र) उस धातोः के अधिकार में (अतिङ्) तिङ्भिन्न (प्रत्ययः) प्रत्यय (कृत्) कृत्सञ्ज्ञक हो। इस सूत्र से एक सूत्र पीछे अष्टाध्यायी में धातोः (७६६) इस प्रकार का एक अधिकार चलाया गया है। इस अधिकार का तात्पर्य यह है कि तृतीय अध्याय की समाप्ति तक जितने प्रत्यय विधान किये जायें वे सब धातु से परे हों। इस अधिकार को चला कर अब ‘तत्र अतिङ् प्रत्ययः कृत्’ ऐसा कथन किया गया है। अर्थात् उस धात्वधिकार में तिङ्भिन्न प्रत्यय कृत्सञ्ज्ञक होता है। यह सूत्र अष्टाध्यायी के तृतीय अध्याय के प्रथम पाद में स्थित है। इस पाद में दो धात्वधिकार हैं। एक—धातो- रेकाचो हलादेः क्रियासमभिहारे यङ् (३.१.२२) सूत्र में और दूसरा धातोः (३.१.६१) यह उपर्युक्त। यहां ‘तत्र’ शब्द द्वितीय धात्वधिकार को लक्ष्य कर के प्रयुक्त किया गया है। इसलिये वृत्ति में ‘अत्र’ कहा गया है। अतः प्रथम धात्वधिकार में धातु से परे विहित प्रत्यय की कृत्सञ्ज्ञा नहीं होती। ‘अतिङ्’ कहने से इस धात्वधिकार में पठित होने पर भी तिङ्प्रत्यय कृत्सञ्ज्ञक न होंगे। यथा—भवति, पठति, पठन्तु आदि। यदि यहां भी कृत्सञ्ज्ञा हो जाती तो कृत्तद्धितसमासाश्च (११७) सूत्र से प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो कर स्वादिप्रत्यय उत्पन्न हो जाने से—‘भवतिः, पठतिः, पठन्तुः’ इस प्रकार अनिष्ट रूप हो जाते। ऋत्विज्+व् (क्विन्न्)। यहां क्विन्न् की कृत्सञ्ज्ञा हो जाती है, क्योंकि यह द्वितीय धात्वधिकार में पठित तथा तिङ्भिन्न प्रत्यय है। अब यहां अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३०३) वेरपृक्तस्य ।६।१।६५॥ अपृक्तस्य वस्य लोपः ॥ अर्थः—अपृक्तसञ्ज्ञक वकार का लोप हो जाता है। व्याख्या—वेः ।६।१। अपृक्तस्य ।६।१। लोपः ।१।१। (लोपो व्योर्वलि से)। ‘क्विन्न्’ ऐसा नहीं लिखा जा सकता, क्योंकि तब प्रथम ऋतूपपद ‘यज्’ धातु से क्विन्न् कर उसका सर्वापहारलोप कर बाद में उसको मान सम्प्रसारण आदि होने चाहियें, लोप से पूर्व नहीं। अतः बालकों के ज्ञान वा सौकर्य के लिये ही यह अलीक मार्ग अवलम्बन किया गया समझना चाहिये। १. ‘क्विन्न्’ प्रत्यय में नकार का ग्रहण क्विन्न् और क्विँप् में भेद कराने के लिये तथा ककार का ग्रहण कित् कार्यों के लिये है।