भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 421

४०६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां भी क्विबन्त समझना चाहिये। दूसरे वाक्य में तीन धातुओं से 'क्विँन्' प्रत्यय का विधान किया गया है। अर्थ - (ऋत्विग्दधृक्स्रग्दिश्युष्णिञ्च्) ऋत्विज्, दधृष्, स्रज्, दिश् और उष्णिह्, ये पांच क्विबन्त शब्द निपातित किये जाते हैं। (च) तथा (अञ्चुयुजि- क्रुञ्चाम्) अञ्चु, युजि तथा क्रुञ्च् धातुओ से (क्विँन्) क्विँन् प्रत्यय हो जाता है। निपातनों के साथ २ अञ्चु आदि तीन धातुओ से 'क्विँन्' प्रत्यय विधान करने से यह विदित होता है कि इन धातुओं में भी कुछ २ निपातन कार्य होते हैं। वे निपातन-कार्य शिष्टग्रन्थों के अनुसार निम्नलिखित हैं— (१) सुबन्त उपपद होने पर ही 'अञ्चु' धातु से क्विन् होता है। (२) उपपदरहित 'युजि' और 'क्रुञ्च्' धातु से क्विन् होता है। (३) 'क्विन्' परे होने पर 'क्रुञ्च्' के उपधाभूत नकार का अनिदितां हल उपधायाः क्ङिति (३३४) द्वारा लोप नहीं होता। ऋत्विज् आदि पांच शब्दों में महामुनि ने निम्नलिखित कार्य किये हैं— (१) ऋत्विज्—में 'ऋतु' उपपद वाली यज्' (भ्वा० उ०) धातु से क्विन्, उस का सर्वापहार लोप, वचि-स्वपि० (५४७) से सम्प्रसारण, सम्प्रसारणाच्च (२५८) से पूर्वरूप तथा इको यणचि (१५) से यण् किया गया है। (२) दधृष्—में धृष्' (स्वा० प०) धातु से क्विन्, उस का सर्वापहारलोप, द्वित्वादिक कार्य तथा अन्तोदात्तत्व किया गया है। यह शब्द पुँल्लिङ्ग है। आगे षका- रान्तो में इस का विवेचन किया जायेगा। (३) स्रज्—में 'सृज्' (तुदा० प०) धातु से क्विन्, उस का सर्वापहारलोप, ऋकार से परे अम् का आगम तथा यणादेश किया गया है। यह शब्द जकारान्त स्त्री- लिङ्गप्रकरण में आगे कहा जायेगा। (४) दिश्—में 'दिश' (तुदा० प०) धातु से कर्मकारक में क्विन् प्रत्यय कर उस का सर्वापहारलोप किया गया है। यह शब्द शकारान्त स्त्रीलिङ्गप्रकरण में आगे कहा जायेगा। (५) उष्णिह्—में 'उत्' पूर्वक 'स्निह्' (दिवा० प०) धातु से क्विन्, उस का सर्वापहारलोप, उद् के दकार का भी लोप तथा सकार को षकार किया गया है। यह शब्द भी आगे हकारान्तस्त्रीलिङ्गप्रकरण में कहा जायेगा। अब क्रमप्राप्त जकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों में प्रथम 'ऋत्विज्' शब्द का विवेचन किया जाना है। यह शब्द क्विबन्त निपातन किया गया है। 'क्विँन्' प्रत्यय आ जाने से क्या क्या लाभ होते हैं तथा उस का किस प्रकार सर्वापहारलोप किया जाता है— यह बतलाने के लिये अब अग्रिमसूत्रों का विवेचन किया जाता है— 'ऋत्विज् + क्विँन्' यहां हलन्त्यम् (१) से नकार तथा लशक्वतद्धिते (१३६) १ वस्तुत क्विबन्त 'ऋत्विज्' शब्द बना बनाया निपातन किया गया है, इस की सिद्धि करने की आवश्यकता नहीं। और यदि सिद्धि करनी भी हो तो 'ऋत्विज् +