लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४०६
चोः कुः द्वारा ही कुत्व-गकार हो कर—ऋत्विग्। वाऽवसाने (१४६) से विकल्प कर के चर्त्व ककार करने से—'ऋत्विक्, ऋत्विग्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। यद्यपि क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) और चोः कुः (३०६) इन दोनों सूत्रों में से किसी एक के द्वारा यहां कार्य सिद्ध हो सकता है, तथापि अन्यत्र भिन्न २ उदाह- रणों में कार्यसिद्धि के लिये दोनों सूत्रों का होना आवश्यक है। यथा--'युङ्' यहां चवर्ग न होने से चोः कुः (३०६) प्रवृत्त नहीं होता, क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) से ही कार्य होता है। 'सुयुक्, सुयुग्' यहां क्विन्प्रत्यय न होने से क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) सूत्र प्रवृत्त नही होता, चोः कुः (३०६) से ही कुत्व होता है। विशेष—वस्तुतः 'ऋत्विक्-ग्' में क्विन्प्रत्ययस्य कुः द्वारा ही कुत्व होता है चोः कुः द्वारा नहीं। यह सब विस्तारपूर्वक सिद्धान्तकौमुदी की व्याख्याओं में देखें। भ्याम्, भिस्, भ्यस् और सुप् में स्वादिष्वसर्वनामस्थाने (१६४) द्वारा पदसंज्ञा हो कर चोः कुः (३०६) से कुत्व-गकार हो जाता है। सुप् में कुत्व के अनन्तर आदेश- प्रत्यययोः (१५०) से सकार को षकार तथा खरि च (७४) से गकार को चर्त्व- ककार कर क् + ष् के योग से क्ष् आकृति हो जाती है। 'ऋत्विज्' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० ऋत्विक्-ग् ऋत्विजौ ऋत्विजः | प० ऋत्विजः ऋत्विग्भ्याम् ऋत्विग्भ्यः द्वि० ऋत्विजम् ,, ,, | प० ,, ऋत्विजोः ऋत्विजाम् तृ० ऋत्विजा ऋत्विग्भ्याम् ऋत्विग्भिः | स० ऋत्विजि ,, ऋत्विक्षु च० ऋत्विजे ,, ऋत्विग्भ्यः | सं० हे ऋत्विक्-ग् ! ऋत्विजौ ! ऋत्विजः ! युज् (योगी)। युजिर् योगे (रुधा० उभ०) धातु से ऋत्विग्दधृक्० (३०१) सूत्र से क्विन्प्रत्यय होकर उस का सर्वापहार लोप हो जाता है। इस प्रकार 'युज्' शब्द के कृदन्त हो जाने से प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो कर स्वादिप्रत्यय उत्पन्न होते हैं। युज्+स्(सुँ)। यहां अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३०५) युजेरसमासे ।७।१।७१॥ युजेः सर्वनामस्थाने नुँम् स्यादसमासे । सुँलोपः । संयोगान्तलोपः । कुत्वेन नस्य ङः । युङ् । अनुस्वारपरसवर्णौ—युञ्जौ, युञ्जः । युग्भ्याम् ॥ अर्थः—सर्वनामस्थान परे होने पर युज् को नुँम् का आगम होता है, परन्तु समास में नहीं होता। व्याख्या—सर्वनामस्थाने ७।१। (उगिदचां सर्वनामस्थानेऽधातोः से) । युजेः ।६।१। नुँम् ।१।१। (इदितो नुँम् धातोः से)। असमासे ।७।१। अर्थः—(सर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान परे होने पर (युजेः) युज् धातु का अवयव (नुँम्) नुँम् हो जाता है (असमासे) परन्तु समास में नहीं होता। ध्यान रहे कि ऋत्विग्दधृक्० (३०१) सूत्र में तथा युजेरसमासे (३०५) इस सूत्र में 'युजि' इस प्रकार इकार ग्रहण करना 'कार' प्रत्यय की भांति स्वार्थ में