भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 425, कुल 633 में से

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पृष्ठ 425

४१० भैमीव्याख्ययोपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां इक्श्तिपौ धातुनिर्देशे इस इक् प्रत्यय द्वारा नही समझना चाहिये, किन्तु इस मे युजिँर् योगे (रुधा० उभ०) धातु का अनुकरण किया गया है। अत इन सूत्रो मे युज समाधौ (दिवा०) धातु का ग्रहण नही होता । विस्तार के लिये सिद्धान्तकौमुदी देखें। 'युज् + स्' यहा सर्वनामस्थान परे है, अत युजेरसमासे सूत्र से नुँम् का आगम हो—यु नुँम् ज् + स् । मकार और उकार अनुबन्धो का लोप हो कर—युन्ज् + स् । हल्ङ्याब्भ्यो ० (१७६) से सकार का लोप—युन्ज् । सयोगान्तस्य लोप (२०) से जकार का लोप कर क्विन्प्रत्ययस्य कु. (३०४) से नकार को ङकार करने से—'युङ्' प्रयोग सिद्ध होता है । युज् + औ' यहा भी सर्वनामस्थान परे होने के कारण युजेरसमासे (३०५) सूत्र द्वारा नुँम् का आगम—यु नुँम् ज्+औ । मश्चापदान्तस्य झलि (७८) सूत्र से नकार को अनुस्वार तथा अनुस्वारस्य ययि परसवर्ण (७६) सूत्र द्वारा अनुस्वार को परसवर्ण- ञकार हो कर 'युञ्जौ' सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि परसवर्ण—के असिद्ध होन स चो कु (३०६) द्वारा ञकार को ङकार नही होता । रूपमाला यथा— प्र० युङ् युञ्जौ युञ्ज | प० युज युग्भ्याम्* युग्भ्य * द्वि० युञ्जम् " युज | प० " युजो युजाम् तृ० युजा युग्भ्याम्* युग्भि * | स० युजि " युक्षु‡ च० युजे ,"* युग्म्य * | स० हे युङ् ! हे युञ्जौ ! हे युञ्ज !

  • इन स्थानो पर चो कु (३०६) द्वारा कुत्व हो जाता है। क्विन्प्रत्ययस्य कु (३०४) सूत्र उस की दृष्टि मे असिद्ध है । ‡ चो. कु (३०६), आदेशप्रत्ययो (१५०), खरि च (७४) । सुयुज् (उत्तम योगी) । सुपूर्वक युजिँर् योगे (रुधा० उभ०) धातु से क्विप् प्रत्यय करने पर 'सुयुज्' शब्द निष्पन्न होता है। ध्यान रहे कि यहा ऋत्विग्दधृक्० (३०१) सूत्र द्वारा क्विन् प्रत्यय नही होता, क्योकि वहा निरुपपद युज् मे क्विन् विधान किया गया है, यहा 'सु' यह उपपद विद्यमान है । सुयुज् + स् (सू) । यहा समास मे निषेध होने से युजेरसमासे (३०५) द्वारा नुँम् का आगम नही होता । हल्ङ्याब्भ्य ० (१७६) से सकार का लोप हो कर अग्रिम- सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्— (३०६) चोः कुः ।८।२।३०॥ चवर्गस्य कवर्ग स्याज्झलि पदान्ते च । सुयुक्, सुयुग् । सुयुजौ । सुयुग्भ्याम् । खन् । खञ्जौ । खन्भ्याम् ॥ अर्थ—झल् परे होने पर या पदान्त मे चवर्ग को कवर्ग हो । व्याख्या—चो ।६।१। कु ।१।१। झलि ।७।१। (झलो झलि से) । पदस्य ।६।१। (यह अधिकृत है) । अन्ते ।७।१। (स्को. संयोगाद्योरन्ते च से) । अर्थ —