लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
DevanagariHindipublished633 पृष्ठ
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हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४११ (झलि) झल् परे होने पर या (पदस्य) पद के (अन्ते) अन्त में (चोः) चवर्ग के स्थान पर (कुः) कवर्ग आदेश हो जाता है। 'सुयुज्' यहां पद के अन्त में चवर्ग-जकार को कवर्ग-गकार हो कर वाऽवसाने (१४६) सूत्र से वैकल्पिक चर्त्व-ककार करने पर—'सुयुक्, सुयुग्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। रूपमाला यथा— प्र० सुयुक्-ग् सुयुजौ सुयुजः | प० सुयुजः सुयुग्भ्याम्* सुयुग्भ्यः* द्वि० सुयुजम् ,, ,, | प० ,, सुयुजोः सुयुजाम् तृ० सुयुजा सुयुग्भ्याम्* सुयुग्भिः* | स० सुयुजि ,, सुयुक्षु‡ च० सुयुजे ,,* सुयुग्भ्यः* | सं० हे सुयुक्-ग् ! हे सुयुजौ ! हे सुयुजः!
- चोः कुः (३०६) से कुंत्व हो जाता है। ‡ चोः कुः (३०६) से जकार को गकार, आदेशप्रत्यययोः(१५०) से सकार को षकार तथा खरि च (७४) से गकार को ककार हो कर क्+ष् के योग से 'क्ष्' आकृति बन जाती है। खञ्ज् (लङ्गड़ा)। खजिँ गतिवैकलव्ये (भ्वा० प०) इत्यस्माद्धातोः क्विपि, इदित्त्वान्नुमि, नश्चापदान्तस्य झलि (७८) इत्यनुस्वारे, अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः (७६) इति परसवर्णे ञकारे च कृते 'खञ्ज्' इति शब्दो निष्पद्यते। कृदन्त होने से 'खञ्ज्' शब्द की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो कर स्वादि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं। खञ्ज् + स् (सुँ) । हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६) से सुँलोप, संयोगान्तस्य लोपः (२०) से जकारलोप, निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः इस न्यायानुसार ञकार को पुनः नकार हो कर 'खन्' प्रयोग सिद्ध होता है। यहां संयोगान्तलोप के असिद्ध होने से न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य(१८०)द्वारा नकार का लोप नहीं होता। किञ्च—क्विन्- प्रत्ययान्त न होने से क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) द्वारा नकार को ङकार आदेश भी नहीं होता। रूपमाला यथा— प्र० खन् खञ्जौ खञ्जः | प० खञ्जः खन्भ्याम्† खन्भ्यः† द्वि० खञ्जम् ,, ,, | प० ,, खञ्जोः खञ्जाम् तृ० खञ्जा खन्भ्याम्† खन्भिः† | स० खञ्जि ,, खन्त्सु, खन्सु* च० खञ्जे ,,† खन्भ्यः† | सं० हे खन् ! हे खञ्जौ ! हे खञ्जः ! † संयोगान्तस्य लोपः (२०) से जकार का लोप हो जाता है।
- संयोगान्तलोप हो कर नश्च (८७) से वैकल्पिक 'धुट्' पुनः चर्त्व। राज् (दीप्तिमान्, राजा)। राजूँ दीप्तौ (भ्वा० उ०) इत्यस्मात्क्विपि तस्य च सर्वापहारलोपे 'राज्' इति शब्दो निष्पद्यते। कृदन्त होने से स्वादिप्रत्यय उत्पन्न होते हैं। राज् + स् (सुँ)। यहां हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६) से सुँलोप हो कर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—