भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 427

४१२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३०७) व्रश्च-भ्रस्ज-सृज-मृज-यज-राज-भ्राजच्छशां षः ।८।२।३६॥ व्रश्चादीनां सप्तानां छशान्तयोश्च षकारोऽन्तादेशः स्याज् झलि पदान्ते च । जश्त्व-चर्वे । राट्, राड् । राजौ । राजः । राड्भ्याम् । एवं विभ्राट् । देवेद् । विश्वसृट् ॥ अर्थ—झल् परे होने पर या पदान्त में व्रश्च्, भ्रस्ज्, सृज्, मृज्, यज्, राज्, भ्राज् इन सात धातुओं को तथा छकारान्त और शकारान्तों को षकार अन्तादेश हो जाता है। व्याख्या—व्रश्च-भ्रस्ज—छशाम् ।८।२। षः ।१।१। झलि ।८।२। (झलो झलि से) । पदस्य ।८।१। (यह अधिकृत है) । अन्ते ।८।२। (स्कोः संयोगाद्योरन्ते च से)। समास—व्रश्चश्च भ्रस्जश्च सृजश्च मृजश्च यजश्च राजश्च भ्राजश्च छश्च शश्च— व्रश्च-भ्रस्ज—भ्राजच्छशः, तेषाम् = व्रश्च-भ्रस्ज—भ्राजच्छशाम्, इतरेतरद्वन्द्वः । व्रश्चा- दिष्वकार उच्चारणार्थः । यहां 'व्रश्च्' आदि सात धातु हैं तथा छ्, श् ये दो वर्ण हैं। ये दोनों वर्ण 'शब्दस्वरूपम्' विशेष्य के विशेषण हैं। शब्दानुशासन का सम्पूर्ण अष्टा- ध्यायी में अधिकार होने से 'शब्दस्वरूपम्' यह उपलब्ध हो जाता है। तब तदन्तविधि हो कर शकारान्त छकारान्त शब्दस्वरूप ऐसा अर्थ हो जाता है। अर्थः—(व्रश्च-भ्रस्ज —छशाम्) व्रश्च्, भ्रस्ज्, सृज्, मृज्, यज्, राज्, भ्राज् तथा छकारान्त और शकारान्त शब्दों के स्थान पर (ष) 'ष्' आदेश हो जाता है (झलि) झल् परे होने पर या (पदस्य) पद के (अन्ते) अन्त में। अलोऽन्त्यविधि से यह आदेश अन्त्य अल् के स्थान पर होता है। 'राज्' यहां पदान्त में प्रकृत-सूत्र से जकार को षकार हो कर झलां जशोऽन्ते (६७) से षकार को डकार तथा वाऽवसाने (१४६) सूत्र से वैकल्पिक चर्व-टकार करने पर 'राट्, राड्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। सम्पूर्ण रूपमाला यथा— प्र० राट्-ड् राजौ राजः प० राजः राड्भ्याम्† राड्भ्यः† द्वि० राजम् ,, ,, ष० ,, राज्ञो राजाम् तृ० राज्ञा राड्भ्याम्† राड्भिः† स० राज्ञि ,, राट्सु-ट्त्सु* च० राज्ञे ,,† राड्भ्यः† स० हे राट्-ड् ! हे राजौ ! हे राजः ! † व्रश्च-भ्रस्ज० (३०७) इति षत्वे, झलां जशोऽन्ते (६७) इति डकारः ।

  • षत्वे जश्त्वे च कृते ङः सि धुँट् (८४) इति वा धुँडागमे खरि च (७४) इति चर्वम् । विभ्राज् (विशेष शोभायुक्त) । 'वि' पूर्वक भ्राजृ दीप्तौ (भ्वा० आ०) धातु से कर्त्ता में क्विप् प्रत्यय करने पर 'विभ्राज्' शब्द सिद्ध होता है। कृदन्त होने से इस की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो कर सुं आदि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं— विभ्राज्+स् (सुँ) । हल्ङ्याब्भ्यो ० (१७६) से सकारलोप, व्रश्च-भ्रस्ज०