भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 433

४१८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां अर्थ —'सुं' परे होने पर त्यदादियो के अनन्त्य (अन्त मे न रहने वाले) तकार दकार को सकार आदेश हो जाता है । व्याख्या—त्यदादीनाम् ।६।३। (त्यदादीनाम से)। तदो ।६।२। स ।१।१। सौ ।७।१। अनन्त्ययो ।६।२। समास —न अन्त्ययो =अनन्त्ययो, नञ्समास । अर्थ — (सौ) सुं परे होने पर (त्यदादीनाम्) त्यदादियो के (अनन्त्ययो ) अनन्त्य (तदो ) तकार दकार को (स ) सकार आदेश हो जाता है ! त्य + स् । यहा प्रकृतसूत्र स त्यद् शब्द के अनन्त्य तकार को सकार हो कर— स्य् + स् । प्रत्यय के सकार को रुत्व और रेफ को विसर्ग करने पर—'स्य ' प्रयोग सिद्ध हुआ । इस की रूपमाला यथा— प्र० स्य त्यौ त्ये | प० त्यस्मात् त्याभ्याम् त्येभ्य द्वि० त्यम् ,, त्यान् | ष० त्यस्य त्ययो त्येषाम् तृ० त्येन त्याभ्याम् त्यै | स० त्यस्मिन् ,, त्येषु च० त्यस्मै ,, त्येभ्य | सम्बोधन प्राय नही होता । यहा सर्वत्र त्यदाद्यत्व और पररूप कर प्रथम 'त्य' इस प्रकार अदन्त सर्वनाम बना लेना चाहिये । तब इस की प्रक्रिया 'सर्व'शब्दवत् चलती है । केवल 'स्य ' मे कुछ विशेष है जो बताया जा चुका है । तद् (वह) । यह शब्द भी तनुं विस्तारे (तना० उभ०) धातु से त्यजि-तनि० (उणा० १२६) सूत्र द्वारा डित् 'अदि' प्रत्यय करने मे निष्पन्न होता है । तद् + स्(सुँ)। यहा भी त्यदाद्यत्व तथा पररूप होकर—'त + स' । पुन तदो' स ० (३१०) सूत्र से अनन्त्य तकार को सकार आदेश कर रुँत्व विसर्ग करने मे-- 'स ' प्रयोग सिद्ध होता है । इस की रूपमाला यथा— प्र० सः तौ ते | प० तस्मात् ताभ्याम् तेभ्य द्वि० तम् ,, तान् | ष० तस्य तयो तेषाम् तृ० तेन ताभ्याम् तै | स० तस्मिन् ,, तेषु च० तस्मै ,, तेभ्य | ———०——— यहा भी पूर्ववत् त्यदादीनाम (१६३) से दकार को अकार तथा अतो गुणे (२७४) से पररूप होकर 'त' इस प्रकार अदन्त सर्वनाम बन जाता है । तब इस की प्रक्रिया 'सर्व'शब्दवत् होती है । सुँ विभक्ति मे ही विशेष है । यद् (जो)। यह शब्द भी यजं देवपूजासगतिकरणदानेषु (भ्वा० उभ०) धातु से त्यजि-तनि-यजिभ्यो डित् (उणा० १२६) सूत्र द्वारा 'अदि' प्रत्यय करने से सिद्ध होता है । इस की रूपमाला यथा— प्र० य यौ ये | प० यस्मात् याभ्याम् येभ्य द्वि० यम् ,, यान् | ष० यस्य ययो येषाम् तृ० येन याभ्याम् यै | स० यस्मिन् ,, येषु च० यस्मै ,, येभ्य | ———०———