भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 434, कुल 633 में से

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हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४१६ यहाँ भी पूर्ववत् त्यदाद्यत्व और पररूप कर सर्वनामकार्य हो जाते हैं । अनन्त्य तकार दकार न होने से सुँ में तदोः सः० (३१०) प्रवृत्त नहीं होता । एतद् (यह) । इण् गतौ (अदा० प०) धातु से एतेस्तुट् च (उणा० १३०) सूत्र द्वारा अदि प्रत्यय तथा 'तुट्' का आगम करने पर 'एतद्' शब्द निष्पन्न होता है । एतद् + स् (सु) । यहां त्यदादीनामः (१६३) से दकार को अकार, अतो गुणे (२७४) से पररूप, तदोः सः० (३१०) से अनन्त्य तकार को सकार तथा आदेश- प्रत्यययोः (१५०) से उस सकार को षकार करने पर—एषस् = 'एषः' प्रयोग सिद्ध होता है । रूपमाला यथा— प्र० एषः एतौ एते | प० एतस्मात् एताभ्याम् एतेभ्यः द्वि० एतम् ” एतान् | प० एतस्य एतयोः एतेषाम् तृ० एतेन एताभ्याम् एतैः | स० एतस्मिन् ” एतेषु च० एतस्मै ” एतेभ्यः | ——————०—————— यहाँ भी सर्वत्र त्यदाद्यत्व और पररूप होकर 'एत' शब्द बन जाने पर सर्व- शब्द की तरह सर्वनामकार्य होते हैं । सुँ विभक्ति का विशेष बता चुके हैं । अन्वादेश में द्वितीयाटौस्स्वेनः (२८०) सूत्र द्वारा द्वितीया, टा और ओस् विभक्तियों में 'एतद्' शब्द के स्थान पर 'एन' आदेश हो जाता है । शेष विभक्तियों में कुछ अन्तर नहीं पड़ता । अन्वादेश में रूपमाला यथा— प्र० एषः एतौ एते | प० एतस्मात् एताभ्याम् एतेभ्यः द्वि० एनम्* एनौ* एनान्* | ष० एतस्य एनयोः* एतेषाम् तृ० एनेन* एताभ्याम् एतैः | स० एतस्मिन् ” * एतेषु च० एतस्मै ” एतेभ्यः | *द्वितीयाटौस्स्वेनः (२८०) नोट—त्यदादियों का प्रायः सम्बोधन नहीं हुआ करता—यह हम पीछे लिख चुके हैं । यदि बनेगा भी तो प्रथमावत् बनेगा । सम्बुद्धि में एड्ह्रस्वात्० (१३४) का ध्यान रख लेना चाहिये । सूचना—ऊपर त्यदादियों के पुंल्लिङ्ग के रूप दिये गये हैं । स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग के रूप आगे तत्तत्प्रकरणों में देखें । अब दकारान्तों में युष्मद् और अस्मद् शब्दों का प्रकरण आरम्भ किया जाता है । युष्मद् और अस्मद् शब्द तीनों लिङ्गों में एक समान होते हैं—यह हम पीछे अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरण में 'कति' शब्द पर लिख चुके हैं । युष्मद् और अस्मद् शब्दों की सिद्धि में अनेक सूत्र प्रयुक्त होते हैं, अतः यह बालकों को कठिन प्रतीत होती है । हम इसे यथाशक्ति सरल तथा सुबोध बनाने का प्रयास करेंगे । बालकों को इन की सिद्धि से पूर्व इन के उच्चारण भली-भांति कण्ठस्थ कर लेने चाहियें । ऐसा करने से एक तो ये शब्द सरल दूसरे झटिति समझ में आ जाते हैं । इन दोनों की रूपमाला यथा—

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