भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 436, कुल 633 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 436

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४२१ व्याख्या—युष्मदस्मदोः ।६।२। (युष्मदस्मदोरनादेशे से) । मपर्यन्तस्य ।६।१। (यह अधिकृत है) । त्वाहौ ।१।२। सौ ।७।१। समासः—त्वश्च अहश्च = त्वाहौ, इतरे- तरद्वन्द्वः । अर्थः—(सौ) सुँ परे होने पर (मपर्यन्तस्य = मपर्यन्तयोः) 'म्' तक (युष्मद- स्मदोः) युष्मद् और अस्मद् के स्थान पर (त्वाहौ) क्रमशः त्व और अह आदेश हो जाते हैं । युष्मद् में युष्म् और अस्मद् में अस्म् ये म्पर्यन्त भाग हैं । सुँ परे होने पर इन के स्थान पर क्रमशः 'त्व' और 'अह' आदेश होते हैं । युष्मद् + अम्, अस्मद् + अम्—यहां सुं के स्थान पर हुए अम् आदेश को स्थानिवद्भाव से सुँ मान कर प्रकृतसूत्र से क्रमशः म्पर्यन्त त्व और अह आदेश करने से—'त्व अद् + अम्, अह अद् + अम्' । अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३१३) शेषे लोपः ।७।२।९०॥ एतयोष्टिलोपः । त्वम् । अहम् ॥ अर्थः—युष्मद् और अस्मद् की टि अर्थात् 'अद्' भाग का लोप हो जाता है । व्याख्या—युष्मदस्मदोः ।६।२। (युष्मदस्मदोरनादेशे से) । मपर्यन्तात् ।५।१। (मपर्यन्तस्य इस अधिकृत का अपकर्ष कर विभक्तिविपरिणाम हो जाता है) । शेषे ।७।१। (स्थानषष्ठी के अर्थ में अधिकरणत्व की विवक्षा से सप्तमी हुई है) । लोपः ।१।१। अर्थः—(युष्मदस्मदोः) युष्मद् और अस्मद् शब्दों के (मपर्यन्तात्) म्पर्यन्त भाग से आगे (शेषे) शेष भाग में (लोपः) लोप प्रवृत्त होता है । म्पर्यन्त भाग से आगे शेष भाग 'अद्' होता है। इस के लोप का इस सूत्र से विधान किया गया है। यह 'अद्' भाग युष्मद् और अस्मद् का 'टि' भाग ही होता है, अतः वृत्ति में टि के लोप का कथन किया गया है। सावधानता—यहां यह नहीं समझना चाहिये कि युष्मद् और अस्मद् शब्द में म्पर्यन्त आदेशों से अवशिष्ट शेष भाग का लोप होता है, यथा यहां त्व और अह आदेश हो चुकने पर 'अद्' भाग शेष रहता है। यदि ऐसा मानेंगे तो यहां तो कार्य्य चल जायेगा, परन्तु 'युष्मभ्यम्, अस्मभ्यम्' आदियों में न हो सकेगा । क्योंकि वहां 'युष्मद्, अस्मद्' शब्दों के स्थान पर कुछ आदेश नहीं होता । अतः यहां 'मपर्यन्तस्य' का अपकर्षण कर म् से आगे के भाग अर्थात् 'अद्' को शेष समझना चाहिये । इस सूत्र का दूसरा अर्थ भी होता है और कही २ लघुकौमुदी में वह उपलब्ध भी होता है । वह यह है— आत्व-यत्वनिमित्तेतरविभक्तौ परतो युष्मदस्मदोरन्त्यस्य लोपः स्यात् । अर्थः—जिस विभक्ति के परे होने पर आत्व और यत्व विधान नहीं होते, उस विभक्ति के परे होने पर युष्मद् और अस्मद् शब्दों के अन्त्य अर्थात् दकार का लोप हो जाता है । व्याख्या—अष्टन आ विभक्तौ से 'विभक्तौ' पद की अनुवृत्ति आ जाने से इस