लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां अर्थ की उत्पत्ति इस प्रकार होती है—(शेषे) शेष (विभक्तौ) विभक्ति परे होने पर (युष्मदस्मदो) युष्मद् और अस्मद् का (लोप) लोप हो जाता है। अलोऽन्त्यविधि से यह लोप अन्त्य अल् दकार के स्थान पर होता है। इस सूत्र से पूर्व अष्टाध्यायी में—युष्मदस्मदोरनादेशे (७।२।८६), द्वितीया- याञ्च (७।२।८७), प्रथमायाश्च द्विवचने भाषायाम् (७।२।८८), योऽचि (७।२।८६) —इन चार सूत्रों के द्वारा कुछ विशिष्ट विभक्तियों के परे होने पर आत्व और यत्व का विधान किया गया है। यदि आत्व और यत्व निमित्तक विभक्तियों से भिन्न अन्य शेष विभक्तियां परे हों तो दकार का लोप हो जाता है। काशिकाकार ने उन सब शेष विभक्तियों की गणना एक श्लोक में कर दी है जिन में आत्व और यत्व प्रवृत्त नहीं हो सकते। तथाहि— पञ्चम्यांश्च चतुर्थ्यांश्च, षष्ठीप्रथमयोरपि। यान्यद्विवचनान्यत्र, 'शेषे लोपो' विधीयते॥ अर्थात् पञ्चमी, चतुर्थी, षष्ठी तथा प्रथमा विभक्तियों के एकवचन और बहु- वचन शेषविभक्तियां हैं। इन के परे होने पर शेषे लोपः (३१३) से युष्मद् और अस्मद् के अन्त्य दकार का लोप हो जाता है। त्व अद्+अम्, अह अद्+अम् –यहां अन्तरङ्ग होने से प्रथम अतो गुणे (२७४) से पररूप एकादेश हो 'त्वद्+अम्, अहद्+अम्'। अब शेषे लोपः (३१३) से अद् भाग का लोप हो कर—'त्व्+अम्=त्वम्, अह्+अम्=अहम्' ये रूप सिद्ध होते हैं।¹ अन्त्यलोप वाले पक्ष में केवल दकार का लोप हो कर अमि पूर्वः (१३५)से पूर्वरूप करने से इन प्रयोगों की निष्पत्ति होती है—यही विशेष है। १. त्व अद्+अम्, अह अद्+अम्—यहां शेषे लोप (३१३) से अद् भाग का लोप और अतो गुणे (२७४) से पररूप दोनों युगपत् प्राप्त होते हैं। शेषे लोप (३१३) सूत्र अष्टाध्यायी में पर होते हुए भी प्रथम प्रवृत्त नहीं होता क्योंकि वह अङ्गाधि- कार में पठित होने से विभक्ति प्रत्यय सापेक्ष होने के कारण बहिरङ्ग है और अतो गुणे (२७४) सूत्र अन्तर्गतवर्णद्वयापेक्ष होने से अन्तरङ्ग है। असिद्धं बहिरङ्ग- मन्तरङ्गे—इस परिभाषा के अनुसार अन्तरङ्गकार्य अतो गुणे प्रथम हो जाता है। शेषे लोपः बहिरङ्ग होने से अन्तरङ्ग के बाद प्रवृत्त होता है। यहां यह भी ध्यातव्य है कि वार्णादाङ्गं बलीयः (वर्णकार्य की अपेक्षा अङ्गकार्य बलवान् होता है) परिभाषा के आश्रय से वर्णकार्य अतो लोप की अपेक्षा अङ्गकार्य शेषे लोपः को बलवान् नहीं माना जा सकता, क्योंकि जहां याङ्ग और वार्ण कार्य समानाश्रय हों वहीं पर यह परिभाषा प्रवृत्त होती है। जैसे धृ+ण्वुल्=धृ+अक यहां 'ऋ' को प्रत्यय के णित् होने से आङ्गकार्य अचो ञ्णिति (१८२) से वृद्धि प्राप्त होती है तथा इसी ऋ को वार्णकार्य यण् (र्) भी प्राप्त होता है। इस परिभाषा से आङ्गकार्य वृद्धि हो जाती है। परन्तु