भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 452

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४३७ व्याख्या—पूर्वोक्त 'वाम्, नौ' आदि आदेश समान वाक्य में प्रवृत्त होते हैं। अर्थात् इन सूत्रों के विषय में निमित्त और निमित्ती का एक ही वाक्य में वर्त्तमान होना आवश्यक है। पद से परे 'वाम्, नौ' आदि आदेशों का विधान है। यहां पद निमित्त तथा 'वाम्, नौ' आदि आदेश निमित्ती हैं। यदि निमित्त अन्य वाक्य में स्थित होगा तो ये आदेश न होंगे। इस वार्त्तिक के उदाहरण देने से पूर्व वाक्य क्या होता है ? इस जिज्ञासा की निवृत्ति के लिये वाक्य का लक्षण करते हैं—एकतिङ् वाक्यम्। एकः=मुख्यः, तिङ् =तिङन्तो यस्य यस्मिन् वा तद् एकतिङ्। जिस में तिङन्त मुख्य वा विशेष्य हो— उसे 'वाक्य' कहते हैं।¹ अब वार्त्तिक का प्रयोजन दिखाते हुए प्रत्युदाहरण देते हैं— 'ओदनं पच तव भविष्यति'। यहां एक वाक्य नहीं, दो वाक्य हैं। 'ओदनं पच' यह पहला वाक्य तथा 'तव भविष्यति' यह दूसरा वाक्य है। यहां दूसरे वाक्य में स्थित 'तव' के स्थान पर 'ते' आदेश नहीं होता, क्योंकि उस का निमित्त पद (पच) उस वाक्य में स्थित नहीं। 'शालीनां ते ओदनं दास्यामि' (मैं तुझे साठी चावलों का भात दूंगा)। यहां 'शालीनाम्' यह निमित्त एक वाक्य में स्थित है अतः इस से परे 'तुभ्यम्' के स्थान पर 'ते' आदेश हो जाता है। [लघु०] वा०—(२७) एते वांनावादयोऽनन्वादेशे वा वक्तव्याः ॥ धाता ते भक्तोऽस्ति, धाता तव भक्तोऽस्तीति वा। अन्वादेशे तु नित्यं स्युः—तस्मै ते नम इत्येव ॥ अर्थः—अन्वादेश न होने पर पूर्वोक्त वाम्, नौ आदि आदेश विकल्प से होते हैं। [तात्पर्य यह है कि अन्वादेश में नित्य होते हैं।] व्याख्या—'किसी कार्य को विधान या बोधन कराने के लिये ग्रहण किये हुए का पुनः दूसरे कार्य को बोधन कराने के लिये ग्रहण करना अन्वादेश कहाता है' यह हम पीछे 'इदम्' शब्द पर स्पष्ट कर चुके हैं। जहां अन्वादेश न होगा वहां पूर्वोक्त 'वाम्, नौ, वस्, नस्, ते, मे, त्वा, मा' आदेश विकल्प से प्रवृत्त होंगे। जहां अन्वादेश होगा वहां नित्य होंगे। यथा— धाता ते भक्तोऽस्ति, धाता तव भक्तोऽस्ति (ब्रह्मा तेरा भक्त है)। यहां अन्वा- देश न होने से 'तव' को 'ते' आदेश विकल्प से प्रवृत्त होता है। योऽग्निर्हव्यवाट् तस्मै ते नमः (जो तूं हव्य को ले जाने वाला अग्निदेव है, १. 'विशेष्य' के कथन से—'पश्य मृगस्ते धावति' (अपने दौड़ते हुए मृग को देखो) इत्यादि दो तिङन्तों वाले भी वाक्य हो सकते हैं। इन में भी 'पश्य' इस एक तिङन्त की ही मुख्यता या विशेष्यता है।