लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां लोकस्त्वा (त्वाम्) पश्यति । लोको मा (माम्) पश्यति । 'पद से परे' इसलिये कहा है कि-त्वा लोकाः पश्यन्ति । मा लोकाः पश्यन्ति । इत्यादियो में 'त्वा, मा' आदेश न हो । 'अपादादौ' इसलिये कहा है कि-स जगद्रक्षको देवो मा सदा पालयिष्यति इत्यादियो में आदेश न हो । अब ग्रन्थकार इन सब सूत्रों के उदाहरणों को रामचन्द्राचार्यनिर्मित दो श्लोकों में दर्शाते हैं- [लघु०] श्रीशस्त्वाऽवतु माऽपीह, दत्तात् ते मेऽपि शर्म सः । स्वामी ते मेऽपि स हरिः, पातु वाम् अपि नौ विभुः ॥१॥ सुखं वां नौ ददात्वीशः, पतिर्वाम् अपि नौ हरिः । सोऽव्याद् वो नः, शिवं वो नो दद्यात्, सेव्योऽत्र वः स नः ॥२॥ अर्थः- (इह) इस लोक में (श्रीशः) श्रीपति विष्णु (त्वा=त्वाम्) तुझे (अपि) तथा (मा=माम्) मुझे (अवतु) बचावे । (सः) वह भगवान् विष्णु (ते=तुभ्यम्) तेरे लिये (अपि) तथा (मे=मह्यम्) मेरे लिये (शर्म) कल्याण (दत्तात्) प्रदान करे । (सः) वह (हरिः) भगवान् विष्णु (ते=तव) तेरा (अपि) तथा (मे=मम) मेरा (स्वामी) स्वामी है । (विभुः) सर्वव्यापक हरि (वाम् = युवाम्) तुम दोनों को (अपि), तथा (नौ=आवाम्) हम दोनों को (पातु) बचावे ॥१॥ (ईशः) भगवान् (वाम् = युष्मभ्यम्) तुम दोनों के लिये तथा (नौ = आवाभ्याम्) हम दोनों के लिये (सुखम्) सुख (ददातु) प्रदान करे । (हरिः) श्री विष्णु (वाम् = युवयोः) तुम दोनों का (अपि) तथा (नौ = आवयोः) हम दोनों का (पतिः) पति है । (सः) वह भगवान् विष्णु (वः=युष्मान्) तुम सब को तथा (नः = अस्मान्) हम सबको (अव्यात्) बचावे । (सः) वह जगत्प्रसिद्ध विष्णु (वः=युष्म- भ्यम्) तुम सबके लिये तथा (नः=अस्मभ्यम्) हम सब के लिये (शिवम्) कल्याण (दद्यात्) प्रदान करे । (सः) वह विष्णु (वः=युष्माकम्) तुम सब का तथा (न = अस्माकम्) हम सब का (सेव्यः) सेवनीय=आराध्य है । व्याख्या - यहां पहले द्वितीया, चतुर्थी तथा षष्ठी के एकवचन का, पीछे द्वि- वचन का और तदनन्तर बहुवचन का उदाहरण दिया गया है । हम ने अर्थ करते समय कोष्ठक में इसे स्पष्ट कर दिया है । ये श्लोक प्रक्रियाकौमुदी से उद्धृत किये गये हैं । [लघु०] वा०-(२६) समानवाक्ये युष्मदस्मदादेशा वक्तव्याः ॥ एकतिङ् वाक्यम् । तेनेह न - ओदनं पच तव भविष्यति । इह तु स्या- देव-शालीनान्ते ओदनं दास्यामि ॥ अर्थ - युष्मद् अस्मद् शब्दों के स्थान पर होने वाले 'वाम्, नौ' आदि आदेश समानवाक्य अर्थात् एक वाक्य में होते हैं । एकतिङ् इति - एक तिङन्त वाला वाक्य कहाता है ।