लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
पृष्ठ 450, कुल 633 में से
संदर्भ में पढ़ेंहलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४३५ अब 'वाम्, नौ' आदेशों का दूसरा अपवाद लिखते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३३१) तेमयावेकवचनस्य ।८।१।२२॥ उक्तविधयोरनयोः षष्ठीचतुर्थ्येकवचनान्तयोस्ते मे एतौ स्तः ॥ अर्थः—पद से परे पाद के आदि में न ठहरे हुए, षष्ठी तथा चतुर्थी के एक- वचनों से युक्त, युष्मद् अस्मद् शब्दों को क्रमशः 'ते, मे' आदेश हो जाते हैं। व्याख्या—पदात् ।५।१। (अधिकृत है)। षष्ठीचतुर्थीद्वितीयास्थयोः ।६।२। युष्मदस्मदोः ।६।२। (युष्मदस्मदोः षष्ठी० से)। एकवचनस्य ।६।१। (युष्मदस्मदोः का विशेषण होने से पूर्ववत् 'एकवचनान्तयोः' बन जाता है)। तेमयौ ।१।२। अपादादौ ।७।१। (अधिकृत है)। अर्थः—(पदात्) पद से परे, (षष्ठीचतुर्थीद्वितीयास्थयोः) षष्ठी चतुर्थी तथा द्वितीया के सहित वर्त्तमान (एकवचनस्य = एकवचनान्तयोः) एक- वचनान्त (युष्मदस्मदोः) युष्मद्, अस्मद् शब्दों के स्थान पर क्रमशः (तेमयौ) 'ते, मे' आदेश होते हैं। परन्तु (अपादादौ) पाद के आदि में नहीं होते। यह सूत्र युष्मदस्मदोः षष्ठी० (३२६) सूत्र का अपवाद है। इस का भी त्वामौ द्वितीयायाः (३३२) यह अग्रिमसूत्र अपवाद है। अतः यह सूत्र केवल षष्ठी तथा चतुर्थी के एकवचनान्तों में ही प्रवृत्त होता है। ग्रन्थकार ने भी वृत्ति में इसीलिये द्वितीया का ग्रहण नहीं किया। इस के उदाहरण यथा— षष्ठी—ईश ! अहं ते (तव) दासोऽस्मि । त्वं मे (मम) पालकोऽसि । चतुर्थी—नमस्ते (तुभ्यम्) ऽस्तु । भोजनं मे (मह्यम्) प्रयच्छ । 'पद से परे' इसलिये कहा है कि—तव दास एष जनः। ममास्ति प्रयोजनम्। तुभ्यं धनं दास्यामि। मह्यम् मोदकम् रोचते। इत्यादियों में 'ते, मे' आदेश न हो जाएं। 'अपादादौ' इसलिये कहा है कि—आगमिष्यति यन्मित्रं, तव कार्यं करिष्यति इत्यादि में आदेश न हो जाये। अब इस सूत्र का अपवाद कहते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३३२) त्वामौ द्वितीयायाः ।८।१।२३॥ द्वितीयैकवचनान्तयोस्त्वा मा इत्यादेशौ स्तः ॥ अर्थः—पद से परे, पाद के आदि में न ठहरे हुए, द्वितीया के एकवचन से युक्त युष्मद्, अस्मद् शब्दों को क्रमशः 'त्वा, मा' आदेश हो जाते हैं। व्याख्या—पदात् ।५।१। (अधिकृत है)। द्वितीयायाः ।६।१। एकवचनस्य ।६।१। (तेमयावेकवचनस्य से। 'युष्मदस्मदोः' का विशेषण है, अतः वचनविपरिणाम तथा तदन्तविधि हो कर 'एकवचनान्तयोः' बन जाता है)। युष्मदस्मदोः ।६।२। (युष्मद- स्मदोः षष्ठी० से)। त्वामौ ।१।२। अपादादौ ।७।१। (यह भी अधिकृत है)। अर्थः —(पदात्) पद से परे (द्वितीयायाः) द्वितीया के (एकवचनस्य = एकवचनान्तयोः) एक- वचनान्त (युष्मदस्मदोः) युष्मद्, अस्मद् शब्दों के स्थान पर क्रमशः (त्वामौ) त्वा, मा आदेश हो जाते हैं (अपादादौ) परन्तु पाद के आदि में नहीं होते। यह सूत्र तेमयावेकवचनस्य (३३१) सूत्र का अपवाद है। इस के उदाहरण यथा—