भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 449, कुल 633 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 449

४३४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां

यहां 'युवयो' और 'आवयो' के पद से परे होने पर भी पाद के आदि में वर्त्तमान होने के कारण 'वाम्, नौ' आदेश नहीं होते ।¹ युष्मदस्मदोः षष्ठीचतुर्थीद्वितीयास्थयोः० में 'स्थ' ग्रहण का यह प्रयोजन है कि षष्ठ्यादि विभक्तियों के साथ रहने पर ही 'युष्मद्, अस्मद्' शब्दों को 'वाम्, नौ' आदेश हो, समास में विभक्ति के लुप्त हो जाने पर न ही । यथा--'इमौ युष्मत्पुत्रौ गच्छतः । इमावस्मत्पुत्रौ वदतः' यहां 'युवयोः पुत्रौ = युष्मत्पुत्रौ, आवयोः पुत्रौ = अस्मत्पुत्रौ' इस प्रकार षष्ठीतत्पुरुष-समास है। समास में विभक्ति का लुक् हो जाने से 'वाम्, नौ' आदेश नहीं होते । अब इस सूत्र के अपवाद आरम्भ किये जाते हैं-- [लघु०] विधि-सूत्रम्-- (३३०) बहुवचनस्य वस्नसौ ।८।१।२१॥ उक्तविधयोरनयोः षष्ठ्यादिबहुवचनान्तयोर्वस्नसौ स्तः ॥ अर्थ--पद से परे, पाद के आदि में न ठहरे हुए, षष्ठी, चतुर्थी तथा द्वितीया के बहुवचनों से युक्त युष्मद्, अस्मद् शब्दों को क्रमशः वस्, नस् आदेश हो जाते हैं । व्याख्या--पदात् ।८।१। (अधिकृत है) । षष्ठीचतुर्थीद्वितीयास्थयोः ।८।१। युष्मदस्मदोः ।८।१।२। (पूर्वसूत्र से) । बहुवचनस्य ।८।१। (यह 'युष्मदस्मदोः' का विशे- षण है, अतः वचनविपरिणाम तथा तदन्तविधि से 'बहुवचनान्तयोः' बन जाता है) । वस्नसौ ।१।२। अपादादौ ।७।१। (यह भी अधिकृत है) । अर्थ--(पदात्) पद से परे (षष्ठीचतुर्थीद्वितीयास्थयोः) षष्ठी, चतुर्थी तथा द्वितीया सहित वर्त्तमान (बहुवचनस्य = बहुवचनान्तयोः) बहुवचनान्त (युष्मदस्मदोः) युष्मद्, अस्मद् शब्दों के स्थान पर क्रमशः (वस्नसौ) वस्, नस् आदेश हो जाते हैं । परन्तु (अपादादौ) पाद के आदि में नहीं होते । यह सूत्र पूर्वसूत्र का अपवाद है । उदाहरण यथा-- षष्ठी--गावो वः (युष्माकम्) सन्ति । अजा नः (अस्माकम्) सन्ति । चतुर्थी--गावो वो (युष्मभ्यम्) दीयन्ते । अजा नो (अस्मभ्यम्) दीयन्ते । द्वितीया--गावो वः (युष्मान्) पश्यन्ति । अजा नः (अस्मान्) पश्यन्ति । 'पद से परे' इसलिये कहा है कि--१. युष्माकं धनमस्ति । २. अस्माकं बल- मस्ति । ३. युष्मभ्यं दीयते । ४. अस्मभ्यं दीयते । ५. युष्मान् पश्यन्ति । ६. अस्मान् पश्यन्ति । इत्यादियों में वस्, नस् आदेश न हों । 'अपादादौ' इसलिये कहा गया है कि--रुद्रः शिवकरो देयो युष्माकं पापहारकः --इत्यादियों में 'युष्माकम्' के स्थान पर 'वस्' आदेश न हो । 'स्थ' ग्रहण से पूर्ववत्--'अयं युष्मद्दासौ (युष्माकं दासः) याति, अयम् अस्म- द्दासो (अस्माकं दासः) याति' इत्यादियों में वस्, नस् आदेश नहीं होते । १. यह निषेध श्लोक के द्वितीय तृतीयादि पादों के लिये किया गया है, प्रथम पाद के लिये नहीं । क्योंकि प्रथम पाद में तो 'पदात्' इस अधिकार से ही व्यभिचार- निवृत्ति हो सकती थी ।