लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४३३ अर्थः—आङ् (टा), ओस् तथा ङि परे होने पर योऽचि (३२०) सूत्र से दकार को यकारादेश हो जाता है। [४] ('शेषे लोपः' सूत्र के विषय में)-- पञ्चम्याश्च चतुर्थ्याश्च षष्ठीप्रथमयोरपि। यान्यद्विवचनान्यत्र शेषे—लोपो विधीयते॥ अर्थः—पञ्चमी, चतुर्थी, षष्ठी तथा प्रथमा के एकवचन और बहुवचन के परे होने पर शेषे लोपः (३१३) सूत्र प्रवृत्त हुआ करता है। [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३२६) युष्मदस्मदोः षष्ठी-चतुर्थी-द्वितीयास्थयोर्वा- न्नावौ ।८।१।२०॥ पदात्परयोरपादादौ स्थितयोः षष्ठ्यादिविशिष्टयोर्युष्मदस्मदोर्वान्नौ इत्यादेशौ स्तः॥ अर्थः—पद से परे, पाद के आदि में न ठहरे हुए, षष्ठी, चतुर्थी तथा द्वितीया विभक्ति से युक्त युष्मद्, अस्मद् शब्दों के स्थान पर क्रमशः वाम्, नौ आदेश होते हैं। व्याख्या—पदात् ।५।१। (यह अधिकृत है)। षष्ठीचतुर्थीद्वितीयास्थयोः । ।६।२। युष्मदस्मदोः ।६।२। वान्नावौ ।१।२। अपादादौ ।७।१। (यह अधिकृत है)। समासः—न पादादौ = अपादादौ, प्रसज्यप्रतिषेधः। नञ्समासः। अर्थः—(पदात्) पद से परे (षष्ठीचतुर्थीद्वितीयास्थयोः) षष्ठी चतुर्थी तथा द्वितीया विभक्ति के साथ वर्त- मान (युष्मदस्मदोः) युष्मद्, अस्मद् शब्दों के स्थान पर क्रमशः (वान्नावौ) वाम्, नौ आदेश हो जाते हैं। (अपादादौ) परन्तु पाद के आदि में नहीं होते। यह सूत्र केवल षष्ठ्यादि के द्विवचन में ही प्रवृत्त होता है, एकवचन वा बहु- वचन में नहीं। एकवचन और बहुवचन में अग्रिम तीन सूत्र इस के अपवाद हैं। सूत्र के उदाहरण यथा— षष्ठी—धनमिदं वाम् (युवयोः) अस्ति। धनमिदं नौ (आवयोः) अस्ति। चतुर्थी—ईशो वां (युवाभ्याम्) ददाति। ईशो नौ (आवाभ्याम्) ददाति। द्वितीया—ईश्वरो वां (युवाम्) पश्यति। ईश्वरो नौ (आवाम्) पश्यति। यहां कोष्ठक में लिखे शब्दों के स्थान पर वाम्, नौ आदेश हुए हैं। 'पद से परे' इसलिये कहा है कि—(१) युवयोर्धनमस्ति। (२) आवयोर्धन- मस्ति। (३) युवाभ्यां माता ददाति। (४) आवाभ्यां माता ददाति। (५) युवा- मीशो रक्षतु। (६) आवामीशो रक्षतु। इत्यादि स्थानों पर आदेश न हों।.यहां 'युवयोः' आदि पद से परे नहीं हैं। 'अपादादौ' इसलिये कहा है कि श्लोक के पाद के आदि में 'वाम्, नौ' आदेश न हो जाएं। यथा— योऽयम्भूतेश्वरो देवो युवयोः पापनाशनः। असावस्तु विभुर्नाथ आवयोरपि पालकः॥ ल० प्र० (२८)