लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३२ | भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
अथ युष्मद्-अस्मद्-विषयक कुछ उपयोगी नोट लिखते हैं । इन से सब सूत्रों का अवगाहन हो कर निश्चय ही बालकों को अपूर्व लाभ होगा । ध्यान देकर पढ़ें— [१] (मपर्यन्त आदेशों के विषय मे) — (क) एकवचन में—सुं, ङे, ङस् को छोड़ कर अन्य सब स्थानों में त्वमावेक- वचने (३१३) प्रवृत्त हो जाता है । सुं में त्वाहावमौ (३१२), ङे में तुभ्यमह्यौ ङयि (३२२) और ङस् में तवममौ ङसि (३२६) अपवाद हैं । तथाहि— ङस् सु ङेविभक्तिञ्च विनैकवचने सदा । एकोक्तौ तु त्वमादेशौ मपर्यन्ताविदीरितौ ॥१॥ तुभ्यमह्यौ ङयि स्याता त्वाहौ सौ मुनिचोदितौ । ङस्यादेशौ तथा स्यात्तौ तवेति च ममेत्यपि ॥२॥ (ख) द्विवचनों मे सदा म्पर्यन्त ‘युव, आव’ आदेश होते हैं । इन का कोई अपवाद नहीं । तथाहि— विना बाधं तु द्वित्वोक्तौ युवावौ भवतः सदा । (ग) बहुवचन में जस् को छोड़कर अन्य कहीं भी म्पर्यन्त आदेश नहीं होता । जस् में यूयवयौ जसि (३१६) में ‘यूय, वय’ आदेश होते हैं । तथाहि— बहुत्वोक्तौ जसोऽन्यत्र नैवादेशौ क्वचिन्मतौ । जसि यूयवयादेशौ मपर्यन्ताविदीरितौ ॥ [२] (विभक्तिस्थानिक आदेशों के विषय में)— शस् त्यक्त्वा द्वितीयायाः प्रथमायास्तथैव ङेः । अमादेशो बुधैः प्रोक्तः शसोऽकारस्य नः स्मृतः ॥१॥ साम आक ङसोऽत्प्रोक्तोऽत् पञ्चम्येकबहुत्वयोः । ऋत एन्यो न चादेशो विभक्तीना क्वचिद्भवेत् ॥२॥ अर्थ —शस् को छोड़ कर द्वितीया के तथा प्रथमा और ङे के स्थान पर अम् आदेश हो जाता है । शस् के अकार को नकार आदेश होता है ॥१॥ साम् (आम्) को आकम्, ङस् को अत्, पञ्चमी के एकवचन और बहुवचन को अत् आदेश होता है । इन के बिना अन्य किसी विभक्ति के स्थान पर कोई आदेश नहीं होता ॥२॥ [३] (आत्व और यत्व के विषय में)— (क) सुपि चौङि भिसि भ्यामि द्वितीयायां तथैव च । आत्वमेषु दकारस्य त्रिभिः सूत्रैर्मुनीरते ॥ अर्थ —प्रथमा के द्विवचन (औ), द्वितीया, भ्याम्, भिस् तथा सुप् में युष्मद् अस्मद् के दकार को आकार हो जाता है । दकार को आकार तीन सूत्रों से होता है , —१. प्रथमायाश्च द्विवचने भाषायाम् (३१५), २ द्वितीयायां च (३१८), ३. युष्मदस्मदोरनादौ (३२१) । (ख) योऽचि सूत्रेण यादेश आङि ओसि तथैव ङौ ।