भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 446

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४३१ [लघु०] विधि-सूत्रम्— (३२८) साम आकम् ।७।१।३३॥ आभ्यां परस्य साम आकम् स्यात् । युष्माकम् । अस्माकम् । त्वयि । मयि । युवयोः । आवयोः । युष्मासु अस्मासु ॥ अर्थः—युष्मद् और अस्मद् शब्दों से परे साम् को आकम् आदेश हो । व्याख्या—युष्मदस्मद्भ्याम् ।५।२। (युष्मदस्मद्भ्यां ङसोऽश् से) । सामः ।६।१। आकम् ।१।१। अर्थः —(युष्मदस्मद्भ्याम्) युष्मद् और अस्मद् शब्दों से परे (सामः) साम् के स्थान पर (आकम्) आकम् आदेश हो । युष्मद् और अस्मद् शब्दों के अदन्त न होने से इन से परे आम् को आमि सर्व- नाम्नः सुट् (१५५) से सुट् न हो सकने के कारण जब साम् ही नहीं होता तो पुनः उस के स्थान पर 'आकम्' आदेश कैसे सम्भव हो सकता है ? यह प्रश्न यहां उपस्थित होता है । इस का उत्तर यह है कि यहां 'साम्' निर्देश भावी (आगामी = आगे होने वाले) 'सुट्' की निवृत्ति के लिये है । अर्थात् 'आकम्' आदेश करने पर अन्त्यलोपपक्ष में शेषे लोपः (३१३) सूत्र से जब अन्त्य दकार का लोप हो जाता है तब युष्मद् अस्मद् के अदन्त हो जाने से आमि सर्वनाम्नः सुट् (१५५) सूत्र से जो 'सुट्' का आगम प्राप्त होता है, उसकी निवृत्ति के लिये यहां 'साम्' के स्थान पर 'आकम्' आदेश कर रहे हैं। इस से 'आकम्' आदेश करने पर अन्त्यलोपपक्ष में अवर्णान्त हो जाने पर भी सुट् का आगम नहीं होता । बालोपयोगी सार यह है कि यह सूत्र दो कार्य करता है । एक तो यह आम् के स्थान पर आकम् आदेश करता है। दूसरा यह शेषे लोपः (३१३) से अन्त्यलोपपक्ष में दकारलोप हो जाने पर प्राप्त सुट् आगम का भी निषेध करता है। 'युष्मद् + आम्, अस्मद् + आम्' यहां साम आकम् (३२८) सूत्र से आम् को आकम् करने पर—युष्मद् + आकम्, अस्मद् + आकम् । अब अन्त्यलोपपक्ष में शेषे लोपः (३१३) से दकार का लोप होकर सवर्णदीर्घ करने पर 'युष्माकम्, अस्माकम्' ये रूप सिद्ध होते हैं । टिलोपपक्ष में भी शेषे लोपः (३१३) से टि = अद् का लोप हो कर—'युष्म् + आकम् = युष्माकम्, अस्मू + आकम् = अस्माकम्' सिद्ध हो जाते हैं। विशेष—यदि 'आकम्' की बजाय 'अकम्' कहा होता तो अन्त्यलोपपक्ष में शेषे लोपः (३१३) से दकार का लोप हो कर पररूप एकादेश करने पर 'युष्मकम्' 'अस्मकम्' इस प्रकार अनिष्ट रूप बन जाते । अतः 'आकम्' आदेश कहा है। 'युष्मद् + ङि, अस्मद् + ङि' यहां ङकार अनुबन्ध का लोप हो कर त्वमावेक- वचने (३१७) से क्रमशः मपर्यन्त त्व और म आदेश करने से—'त्व अद् + इ, म अद्

  • इ' । अतो गुणे (२७४) से पररूप एकादेश कर—'त्वद् + इ, मद् + इ' । अब अनादेश अजादि विभक्ति परे रहने के कारण योऽचि (३२०) से दकार को यकार करने से—'त्वय् + इ = त्वयि, मय् + इ = मयि' प्रयोग सिद्ध होते हैं । युष्मद् + सु(सुप्), अस्मद् + सु(सुप्) । यहां युष्मदस्मदोरनादेशे (३२१) से दकार को आकार हो सवर्णदीर्घ करने से 'युष्मासु, अस्मासु' प्रयोग सिद्ध होते हैं।