भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 445

४३० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां

होकर युष्म्+अत् = युष्मत्, अस्म् + अत् -=अस्मत्' प्रयोग सिद्ध होते हैं। अन्त्य- लोपपक्ष म अन्त्य दकार का लोप होकर अतो गुणे (२७४) द्वारा पररूप करने से— 'युष्मत्, अस्मत्' यही रूप सिद्ध होते हैं। षष्ठी के एकवचन में 'युष्मद्+ङस्, अस्मद्+ङस्' यहा त्वमावेकवचने (३१७) के प्राप्त होने पर उस का अपवाद अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्— (३२६) तवममौ ङसि।७।२।९६॥ अनयोर्मपर्यन्तस्य तवममौ स्तो ङसि ॥ अर्थ —'ङस्' परे होने पर युष्मद् और अस्मद् शब्दो को मपर्यन्त क्रमश 'तव' और 'मम' आदेश होते हैं। व्याख्या—युष्मदस्मदो ।६।२। (युष्मदस्मदोरनादेशे से) । मपर्यन्तस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। तवममौ ।१।२। ङसि ।७।१। अर्थ — (ङसि) ङस् परे होने पर (युष्मदस्मदो ) युष्मद् और अस्मद् शब्दो के (मपर्यन्तस्य) मकारपर्यन्त भाग के स्थान पर क्रमश (तव ममौ) 'तव' और 'मम' आदेश होते हैं। 'युष्मद् + ङस्, अस्मद् + ङस्' यहा प्रवृत्तसूत्र से मपर्यन्त 'तव, मम' आदेश करने पर—'तव अद्+ङस्, मम अद्+ङस्'। अतो गुणे (२७४) से पररूप कर— 'तवद्+ङस्, ममद्+ङस्' । अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३२७) युष्मदस्मद्भ्यां ङसोऽश् ।७।१।२७॥ [युष्मदस्मद्भ्यां परस्य ङसोऽशादेश स्यात्]। तव। मम। युवयोः। आवयोः॥ अर्थ —युष्मद् और अस्मद् शब्दो से परे ङस् के स्थान पर 'अश्' आदेश हो। व्याख्या—युष्मदस्मद्भ्याम् ।५।२। ङस ।६।१। अश् ।१।१। अर्थ —(युष्मद- स्मद्भ्याम्) युष्मद् और अस्मद् शब्दो से परे (ङस ) ङस् के स्थान पर (अश्) अश् आदेश हो जाता है। 'अश्' आदेश शित् होने से आदे. परस्य (७२) का बाघ कर अनेकाल्शित्सर्वस्य (४५) से सर्वादेश होता है। 'तवद+ङस्, ममद्+ङस्' यहा अश् आदेश होकर—'तवद्+अ (अश्), ममद +अ(अश)'। अब शेषे लोप (३१३) से अद् का लोप करने से—'तव, मम' ये प्रयोग सिद्ध होते हैं। अन्त्यलोपपक्ष मे केवल दकार का लोप होकर पररूप एकादेश करन से यही रूप सिद्ध हो जाते हैं। 'युष्मद्+ओस्, अस्मद्+ओम्' यहा युवावौ द्विवचने (३१४) मे मपर्यन्त क्रमश युव, आव आदेश होकर—'युव अद्+ओस्, आव अद्+ओम्'। अतो गुणे (२७४) से पररूप कर—'युवद् + ओम्, आवद् +ओम्'। अब अनादेश अजादि विभक्ति ओम् के परे हान में योऽचि (३२०) मे दकार को यकार आदेश होकर—'युवय् + ओस्=युवयो, आवय् +ओम्=आवयो' प्रयोग सिद्ध होते हैं। 'युष्मद् +आम् अस्मद् + आम्' अब अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है—