लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४२६ 'युष्मद् + ङसिँ, अस्मद् + ङसिँ' यहां अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३२४) एकवचनस्य च ।७।१।३२॥ आभ्यां ङसेरत् । त्वत् । मत् ॥ अर्थः—युष्मद् और अस्मद् शब्दों से परे ङसिँ को 'अत्' आदेश हो । व्याख्या—युष्मदस्मद्भ्याम् ।५।२। (युष्मदस्मद्भ्याम् ङसोऽश् से) । पञ्चम्याः ।६।१। (पञ्चम्या अत् से) । एकवचनस्य ।६।१। च इत्यव्ययपदम् । अत् ।१।१। (पञ्चम्या अत् से) । अर्थः—(युष्मदस्मद्भ्याम्) युष्मद् और अस्मद् शब्दों से परे (पञ्चम्याः) पञ्चमी के (एकवचनस्य) एकवचन के स्थान पर (च) भी (अत्) 'अत्' यह आदेश हो जाता है । 'युष्मद् + ङसिँ, अस्मद् + ङसिँ' यहां प्रकृतसूत्र से ङसिँ के स्थान पर अत् आदेश (ध्यान रहे कि अत् आदेश अनेकाल् होने से सर्वादेश होता है) होकर— 'युष्मद् + अत्, अस्मद् + अत्' । त्वमावेकवचने (३१७) से मपर्यन्त 'त्व, म' होकर — 'त्व अद् + अत्, म अद् + अत्' । अतो गुणे (२७४) से पररूप हो—'त्वद् + अत्, मद् + अत्' । अथ शेषे लोपः (३१३) से टि = अद् भाग का लोप करने पर—'त्व् + अत् = त्वत्, म् + अत् = मत्' प्रयोग सिद्ध होते हैं । अन्त्यलोपपक्ष में केवल दकार का लोप हो कर पररूप (२७४) करने से यही रूप सिद्ध होते हैं । नोट—'अत्' आदेश में हलन्त्यम् (१) द्वारा तकार की इत्सञ्ज्ञा नहीं होती, न विभक्तौ तुस्माः (१३१) सूत्र निषेध करता है। अवसान में जश्त्व-चर्त्व तो होंगे ही । पञ्चमी के बहुवचन में 'युष्मद् + भ्यस्, अस्मद् + भ्यस्' यहां भ्यसोऽभ्यम् (३२३) के प्राप्त होने पर उस का अपवाद अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३२५) पञ्चम्या अत् ।७।१।३१॥ आभ्यां पञ्चम्या भ्यसोऽत् स्यात् । युष्मत् । अस्मत् ॥ अर्थः—युष्मद् अस्मद् शब्दों से परे पञ्चमी के भ्यस् को 'अत्' आदेश हो । व्याख्या—युष्मदस्मद्भ्याम् ।५।२। (युष्मदस्मद्भ्यां ङसोऽश् से) । पञ्चम्याः ।६।१। भ्यसः ।६।१। (भ्यसोऽभ्यम् से) । अत् ।१।१। अर्थः —(युष्मदस्मद्भ्याम्) युष्मद् और अस्मद् शब्दों से परे (पञ्चम्याः) पञ्चमी के (भ्यसः) भ्यस् के स्थान पर (अत्) 'अत्' आदेश हो जाता है । अनेकाल् होने से 'अत्' सर्वादेश होता है । 'युष्मद् + भ्यस्, अस्मद् + भ्यस्' यहां प्रकृतसूत्र से पञ्चमी के भ्यस् को अत् आदेश होकर — 'युष्मद् + अत्, अस्मद् + अत्' । अथ शेषे लोपः (३१३) से टिलोप कारीय विधि के प्रवृत्त होने पर यदि परिनिष्ठित (व्यवहार्य) प्रयोग बन जाये तो पुनः दूसरे अङ्गाधिकारीय कार्य की प्रवृत्ति नहीं करनी चाहिये । यहां शेषे लोपः (३१३) इस अङ्गकार्य के प्रवृत्त होने पर लोकप्रसिद्ध 'युष्मभ्यम्, अस्म- भ्यम्' प्रयोग बन चुके हैं अतः अब इन का रूप बिगाड़ने के लिये दूसरा अङ्ग- कार्य बहुवचने झल्येत् (१४५) प्रवृत्त न होगा ।