भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 443

४२८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां [लघु०] विधि-सूत्रम्— (३२२) तुभ्यमह्यौ ङयि ।७।२।९५॥ अनयोर्मपर्यन्तस्य । टिलोप । तुभ्यम् । मह्यम् ॥ अर्थ —'ङे' परे होने पर युष्मद् और अस्मद् शब्दों को मपर्यन्त क्रमशः तुभ्य और मह्य आदेश हो जाते हैं। व्याख्या—युष्मदस्मदो ।६।२। (युष्मदस्मदोरनादेशे स) । मपर्यन्तस्य ।६।१। (यह अधिकृत है) । तुभ्यमह्यौ ।१।२। ङयि ।७।१। अर्थ —(ङयि) 'ङे' परे होने पर (युष्मदस्मदो ) युष्मद् और अस्मद् शब्दो के (मपर्यन्तस्य) मकारपर्यन्त भाग के स्थान पर क्रमश (तुभ्यमह्यौ) तुभ्य और मह्य आदेश हो जाते हैं । 'युष्मद् + अम्, अस्मद् + अम्' यहा स्थानिवद्भाव से अम् को ङे मान कर प्रकृतसूत्र से तुभ्य और मह्य आदेश हो कर 'तुभ्य अद् + अम्, मह्य अद् + अम्' । अतो गुणे (२७४) से पररूप हो—'तुभ्यद् + अम्, मह्यद् + अम्' । अब टिलोपपक्ष मे शेषे लोप (३१३) से अद् भाग का लोप करने पर 'तुभ्यम्, मह्यम्' प्रयोग सिद्ध होते हैं। अन्त्यलोपपक्ष मे शेषे लोप (३१३) से दकारलोप तथा अमि पूर्व. (१३५) से पूर्वरूप करने पर उक्त रूपो की सिद्धि होती है । 'युष्मद् + भ्यस्, अस्मद् + भ्यस्' यहा अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्— (३२३) भ्यसोऽभ्यम् ।७।२।३०॥ आभ्या परस्य भ्यसोऽभ्यम् इत्यादेश. स्यात् । युष्मभ्यम् । अस्मभ्यम् ॥ अर्थ.—युष्मद् और अस्मद् शब्दो से परे भ्यस् को अभ्यम् आदेश हो । व्याख्या—युष्मदस्मद्भ्याम् ।५।२। (युष्मदस्मद्भ्याम् ङसोऽश् से) । भ्यस ।६।१। अभ्यम् ।१।१। अर्थ —(युष्मदस्मद्भ्याम्) युष्मद् और अस्मद् शब्दो से परे (भ्यस.) भ्यस् के स्थान पर (अभ्यम्) अभ्यम् आदेश हो जाता है । 'युष्मद् + भ्यस्, अस्मद् + भ्यस्' यहा भ्यस् को अभ्यम् आदेश हो कर शेषे लोप• (३१३) से टिलोप' करने से 'युष्मभ्यम्, अस्मभ्यम्' प्रयोग सिद्ध होते हैं। अन्त्यलोप- पक्ष मे केवल दकार का लोप हो कर अतो गुणे (२७४) से पररूप करने पर उक्त रूप सिद्ध होंगे । ध्यान रहे कि शेषे लोपः (३१३) मे अन्त्यलोप मानने वाले कुछ वैयाकरण 'भ्यसो भ्यम्' इस प्रकार सूत्र पढ कर भ्यस् के स्थान पर भ्यम् आदेश करते हैं। अत उन के मत मे पररूप किये बिना ही यथेष्ट रूप सिद्ध हो जाते हैं।२ १. यहा अनादेश अजादि विभक्ति न होने से योऽचि (३२०) सूत्र से यकारादेश नही होता । एवम्—'भ्यम्' पक्ष मे भी युष्मदस्मदोरनादेशे (३२१) से आकारा- देश की अप्रवृत्ति जाननी चाहिये । २ परन्तु इस प्रकार अन्त्यलोप करने पर 'युष्म + भ्यम्, अस्म + भ्यम्' इस अवस्था मे बहुवचने झल्येत् (१४५) द्वारा एत्व प्राप्त होता है। इस का वारण सङ्गवृत्तो पुनर्वृत्तो विधिरनिष्टितस्य इस परिभाषा से किया जाता है। किसी सङ्गाधि-