लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४२७ अर्थः— (अनादेशे) अनादेश (अचि) अजादि (विभक्तौ) विभक्ति परे हो तो (युष्मद- स्मदोः) युष्मद् और अस्मद् शब्दों के स्थान पर (यः) य् आदेश हो जाता है। जिन विभक्तियों के स्थान पर कोई आदेश नही होता वे अनादेश विभक्तियां कहाती हैं। अनादेश अजादि विभक्ति परे होने पर युष्मद् और अस्मद् को य् आदेश हो जाता है। अलोऽन्त्यविधि से यह आदेश अन्त्य अल् दकार के स्थान पर होता है। 'त्वद्+आ, मद्+आ' यहां 'आ' यह अनादेश अजादि विभक्ति परे है अतः प्रकृतसूत्र से दकार को यकार आदेश हो कर—त्वय्+आ='त्वया', मय्+आ= 'मया' प्रयोग सिद्ध होते हैं। 'अनादेश' कथन के कारण पञ्चमीबहुवचनान्त 'युष्मत्, अस्मत्' में यकारादेश नहीं होत। क्योंकि यहां पञ्चमी के बहुवचन 'भ्यस्' के स्थान पर पञ्चम्या अत् (३२५) द्वारा 'अत्' यह अजादि आदेश हुआ है। 'युष्मद्+भ्याम्, अस्मद्+भ्याम्' यहां युवावौ द्विवचने (३१४) से क्रमशः म्पर्यन्त युव और आव आदेश हो कर 'युव अद्+भ्याम्, आव अद्+भ्याम्'। अतो गुणे (२७४) से पररूप करने पर—'युवद्+भ्याम्, आवद्+भ्याम्'। अब अग्रिम- सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३२१) युष्मदस्मदोरनादेशे ७।२।८६॥ अनयोरात् स्याद् अनादेशे हलादौ विभक्तौ। युवाभ्याम्। आवाभ्याम्। युष्माभिः। अस्माभिः॥ अर्थः—अनादेश हलादि विभक्तियों के परे होने पर युष्मद् और अस्मद् शब्दों के स्थान पर आकार आदेश हो। व्याख्या—युष्मदस्मदोः ।६।२। अनादेशे ।७।१। हलि ।७।१। (रायो हलि से)। विभक्तौ ।७।१। आ ।१।१। (अष्टन आ विभक्तौ से)। अर्थः—(अनादेशे) अनादेश (हलि =हलादौ) हलादि (विभक्तौ) विभक्ति परे होने पर (युष्मदस्मदोः) युष्मद् और अस्मद् शब्दों के स्थान पर (आ) 'आ' यह आदेश हो जाता है। यह आकार आदेश अलोऽन्त्यविधि से अन्त्य अल् दकार के स्थान पर होता है। 'युवद्+भ्याम्, आवद्+भ्याम्' यहां 'भ्याम्' यह अनादेश हलादि विभक्ति परे है अतः दकार को आकार हो कर सवर्णदीर्घ करने से—'युवाभ्याम्, आवाभ्याम्' प्रयोग सिद्ध होते हैं। अनादेश के फलस्वरूप 'युष्मभ्यम्' आदि में भ्यम्-पक्ष में 'आ' आदेश न होगा। 'युष्मद्+भिस्, अस्मद्+भिस्' यहां युष्मदस्मदोरनादेशे (३२१) सूत्र से दकार को आकार तथा सवर्णदीर्घ हो कर 'युष्माभिः, अस्माभिः' प्रयोग सिद्ध होते हैं। 'युष्मद्+ङे, अस्मद्+ङे' यहां ङे प्रथमयोरम् (३११) से ङे को अम् आदेश हो कर 'युष्मद्+अम्, अस्मद्+अम्'। अब अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है—