लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२६ भैमोध्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
'युष्मद् + शस्, अस्मद् + शस्' यहां अनुबन्ध शकार का लोप होकर 'युष्मद् + अस्, अस्मद् + अस्' । अब इस अवस्था में ङे प्रथमयोरम् (३११) द्वारा अम् आदेश प्राप्त होने पर अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है। [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३१६) शसो न ।७।१।२६॥ आभ्यां शसो न स्यात् । अमोऽपवादः । आदेः परस्य (७२) । संयो- गान्तलोपः । युष्मान् । अस्मान् ॥ अर्थः—युष्मद् या अस्मद् शब्दा से परे शस् को नकार आदेश हो । व्याख्या — युष्मदस्मद्भ्याम् ।५।२। (युष्मदस्मद्भ्यां ङसोऽश् से) । शसः ।६।१। न ।१।१। (विभक्ति का लुक्) । अर्थ — (युष्मदस्मद्भ्याम्) युष्मद् और अस्मद् शब्दों से पर (शसः) शस् के स्थान पर (न) न् आदेश हो जाता है । अम् आदेश के प्राप्त होने पर यह आदेश विधान किया गया है अतः यह उस (३११) का अपवाद है । यह नकारादश अलोऽन्त्यपरिभाषा से अन्त्य अल् अर्थात् सकार के स्थान पर प्राप्त था, परन्तु आदेः परस्य (७२) से उस का बाध कर शस् = अस् के आदि अर्थात् अकार के स्थान पर हो जाता है । 'युष्मद् + अस्, अस्मद् + अस्' यहां प्रकृतसूत्र से शस् के अकार को नकार आदेश हो 'युष्मद् + न्स्, अस्मद् + न्स्' । अब द्वितीयायाञ्च (३१८) सूत्र से दकार को आकार तथा अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ हो—'युष्मान्स्, अस्मान्स्' । पुनः संयोगान्तस्य लोपः (२०) से सकार का लोप करने पर—'युष्मान्, अस्मान्' प्रयोग सिद्ध होते हैं । ध्यान रहे कि यहां संयोगान्तलोप के असिद्ध होने से न लोप० (१८०) द्वारा नकार का लोप नहीं होता किञ्च 'युष्मान्' में अट्कु० (१३८) द्वारा प्राप्त णत्व का भी पदान्तस्य (१३६) द्वारा निषेध हो जाता है । युष्मद् + आ (टा), अस्मद् + आ (टा)—यहां एकत्वकथन होने के कारण त्वामावेकवचने (३१७) से म्पर्यन्त त्व और म आदेश हो—'त्व अद् + आ, म अद् + आ' । अतो गुणे (२७४) से पररूप हो—'त्वद् + आ, मद् + आ' । अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३२०) योऽचि ।७।२।८६॥ अनयोर्यकारादेशः स्यादनादेशेऽजादौ परतः । त्वया । मया ॥ अर्थः—अनादेश अजादि विभक्ति परे होने पर युष्मद् और अस्मद् शब्दों को यकार आदेश हो । व्याख्या—युष्मदस्मदोः ।६।२। (युष्मदस्मदोरनादेशे से) । यः ।१।१। (यकारा- दकार उच्चारणार्थः) । अनादेशे ।७।१। (युष्मदस्मदोरनादेशे से) । अचि ।७।१। विभक्तौ ।७।१। (अष्टन आ विभक्तौ से) । 'अचि' यह 'विभक्तौ' का विशेषण है अतः यस्मिन्विधिस्तदादावल्ग्रहणे द्वारा तदादिविधि हो कर 'अजादौ विभक्तौ' बन जाता है ।