भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 440

हलन्त-पुँल्लिङ्ग-प्रकरणम् षष्ठीतत्पुरुषसमासः। यहां 'एकवचने' का 'विभक्तौ' के साथ सामानाधिकरण्य करके 'एकवचन विभक्ति परे होने पर' ऐसा अर्थ अभीष्ट नहीं। क्योंकि तब आचार्य 'एक- वचने' न कह कर 'एकत्वे' ऐसा कह देते। अतः यहां 'एकवचने' कहने का यह तात्पर्य है कि चाहे एकवचन, द्विवचन वा बहुवचन जो भी विभक्ति परे हो युष्मद् और अस्मद् को एकत्वकथन में मपर्यन्त त्व और म आदेश हो जाते हैं। यथा—त्वाम् अतिक्रान्तो = अतित्वम्, माम् अतिक्रान्ती = अतिमाम्। यहां द्विवचन परे होने पर भी युष्मद् और अस्मद् के एकार्थवाची होने से 'त्व, म' आदेश हो जाते हैं। विशेष सिद्धान्तकौमुदी में देखें। 'युष्मद् + अम्, अस्मद् + अम्' यहां क्रमशः मपर्यन्त 'त्व, म' आदेश होकर— 'त्व अद् + अम्, म अद् + अम्'। अतो गुणे (२७४) से पररूप करने पर—'त्वद् + अम्, मद् + अम्'। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३१८) द्वितीयायाञ्च ७।२।८७॥ अनयोरात् स्यात्। त्वाम्। माम् ॥ अर्थः—द्वितीया विभक्ति परे होने पर युष्मद् और अस्मद् शब्दों को आकार आदेश हो। व्याख्या—युष्मदस्मदोः ।६।२। (युष्मदस्मदोरनादेशे से)। आ ।१।१। (अष्टन आ विभक्तौ से)। द्वितीयायाम् ।७।१। च इत्यव्ययपदम्। अर्थः—(द्वितीयायाम्) द्वितीया विभक्ति परे होने पर (च) भी (युष्मदस्मदोः) युष्मद् और अस्मद् शब्दों के स्थान पर (आ) आकार आदेश हो जाता है। अलोऽन्त्यविधि द्वारा यह आदेश अन्त्य दकार के स्थान पर होता है। 'त्वद् + अम्, मद् + अम्' यहां द्वितीया परे है अतः प्रकृतसूत्र से दकार को आकार आदेश होकर—'त्व आ + अम्, म आ + अम्' हुआ। अब अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ तथा अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप करने पर 'त्वाम्, माम्' प्रयोग सिद्ध होते हैं। युष्मद् + औट्, अस्मद् + औट्—यहां ङे प्रथमोयोर्‌म् (३११) सूत्र से अम् आदेश होकर—'युष्मद् + अम्, अस्मद् + अम्'। युवावौ द्विवचने (३१४) से मपर्यन्त युव और आव हो—'युव अद् + अम्, आव अद् + अम्'। अतो गुणे (२७४) से पररूप करने से—'युवद् + अम्, आवद् + अम्'। अब द्वितीयायां च (३१८) से दकार को आकार, अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ तथा अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप एकादेश करने से 'युवाम्, आवाम्' प्रयोग सिद्ध होते हैं। विशेष—प्रथमाविभक्ति के 'युवाम्, आवाम्' की प्रक्रिया में तथा द्वितीया विभक्ति के 'युवाम्, आवाम्' की प्रक्रिया में आकारविधायक सूत्र का भेद है। प्रथमा में प्रथमायाश्च द्विवचने भाषायाम् (३१५) द्वारा तथा द्वितीया में द्वितीयायाञ्च (३१८) से आकार आदेश होता है।