भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 456, कुल 633 में से

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पृष्ठ 456

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४४१ सूत्र से क्विन् प्रत्यय करने पर उस का सर्वापहार लोप हो जाने से—'प्र अञ्च्'। अब यहां प्रत्ययलक्षणद्वारा कित् क्विन् प्रत्यय को मान कर अनिदितां हल उपधायाः क्ङिति (३३४) सूत्र से नकार १ का लोप हो जाने पर 'प्र अच्' हुआ। अब इस की प्राति- पदिकसञ्ज्ञा २ होकर सुं आदि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं। प्र अच् + स् (सुं)। उगिदचाम्० (२८६) से नुँम् का आगम—'प्र अनुँम् च्

  • स्'। 'उम्' अनुबन्ध का लोप होकर 'प्र अन्च् + स्'। हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६) से सुंलोप, संयोगान्तस्य लोपः (२०) से चकारलोप—'प्र अन्'। अब क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) से नासिकास्थानीय नकार के स्थान पर तादृश ङकार होकर—'प्र अङ्'। अकः सवर्णे दीर्घः (४२) सूत्र से सवर्णदीर्घ एकादेश करने पर 'प्राङ्' प्रयोग सिद्ध होता है। प्र अच् + औ ३। उगिदचाम्० (२८६) से नुँम् आगम, उम् अनुबन्ध का लोप, नश्चापदान्तस्य झलि (७८) से नकार के स्थान पर अनुस्वार ४ तथा अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः (७६) से अनुस्वार को परसवर्ण ञकार करने पर—प्र अञ्च् + औ = प्राञ्चौ। इसी प्रकार सम्पूर्ण सर्वनामस्थान में प्रक्रिया होती है। प्र अच् + अस् (शस्)। सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा न होने से उगिदचाम्० (२८६) से नुँम् आगम नहीं हो सकता। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है – [लघु०] विधि-सूत्रम्— (३३५) अचः ।६।४।१३८॥ लुप्तनकारस्याञ्चतेर्भस्याकारस्य लोपः स्यात् ॥ अर्थः—लुप्त नकार वाली अञ्चु धातु के भसञ्ज्ञक अकार का लोप हो। व्याख्या—अचः ।६।१। (यहां 'अच्' से लुप्तनकार वाली अञ्चु धातु का निर्देश किया गया है)। भस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। अत् ।६।१। (षष्ठी का लुक् हुआ है)। लोपः ।१।१। (अल्लोपोऽनः से)। अर्थः—(अचः) लुप्त नकार वाली अञ्चु धातु के (भस्य) भसञ्ज्ञक (अत् = अतः) अकार का (लोपः) लोप हो जाता है। 'प्र अच् + अस्'। यहां 'अच्' यह लुप्तनकार अञ्चु है, यचि भम् (१६५) से इस की भसञ्ज्ञा भी है अतः प्रकृतसूत्र से इस के अकार का लोप होकर—'प्र च् + अस्'। अब अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— १. अञ्चु धातु में स्तोः श्चुना श्चुः (६२) द्वारा नकार का ञकार बना है। इस का स्पष्टीकरण इस व्याख्या के द्वितीय भाग में संसूं (भ्वा० आ०) धातु पर देखें। २. इस प्रकरण में 'प्र अच्, प्रति अच्, समि अच्' इस प्रकार सन्ध्यभाव में ही प्राति- पदिकसञ्ज्ञा की जाती है। यह सब शसादियों में अचः (३३५) आदि द्वारा अकारलोपादिप्रक्रिया की सुविधा के लिये ही किया जाता है। ३. क्विन्, उसका सर्वापहारलोप, अनिदिताम्० (३३४) द्वारा नकारलोप—इतनी प्रक्रिया स्वयं सब विभक्तियों में जान लें बार-बार नहीं लिखेंगे। ४. नस्य श्चुत्वन्तु न भवति, अनुस्वारं प्रति श्चुत्वस्यासिद्धत्वात्।
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